अब देखिये, साहब ! भूमि कितने दिनों से घर के कामों के लिए एक लड़की ख़ोज रही थी। जब सबसे पूछ रही थी तो किसी ने नहीं बताया किन्तु जबसे उसके यहाँ कामवाली लगी है ,सबको खबर हो गयी है। एक बार उसने अपनी पड़ोसन मिसेज़ गुप्ता से ही उनकी कामवाली को ही अपने घर बुलाने के लिए कहा था , किन्तु तब उन्होंने जबाब दिया था -'वो तो बड़ी मूढ़ी ,मन होगा तो आएगी ,नहीं होगा तो नहीं आएगी,कैसे -कैसे लोग हैं ?अपनी कामवाली को भी ऐसे रखते हैं ,जैसे मैं ,उनका कुछ छीन लूंगी ,या वो कोई क़ीमती चीज है ,उस समय यही विचार भूमि के मन में आये थे।
बात आई गई हो गयी ,तब उस दिन के बाद से मैंने किसी से कुछ नहीं कहा और आज अचानक ही उनका फोन आया -कपिल की मम्मी ! क्या' ज़ीनत ' तुम्हारे यहां आई है ?
कौन ,'ज़ीनत ?' मैंने अनभिग्यता ज़ाहिर की।
अरे ! वही कामवाली,वो जो' पगली' सी है।
क्या उसका नाम' ज़ीनत' है ?उसका नाम तो सुंदर है, उनके मुख से उसका नाम सुनकर मुझे अपने आप पर भी आश्चर्य हुआ ,इसे काम करते इतने दिन हो गए और मैंने इसका नाम भी जानना नहीं चाहा। उन दिनों मेरे मन में न जाने कितनी बातें चल रहीं थीं ? त्यौहार पर घर की सफाई ,परिवार वालों का रवैया ,इसको रखना है या नहीं, इसके प्रति लोगों की सोच ,इन सबमें ,मुझे उसका नाम जानने में कोई दिलचस्पी ही नहीं रह गयी थी।
हाँ ,आ तो रही है ,मैंने जबाब दिया।
उसको मेरे घर भेज देना ,उनका जबाब आया।
क्यों ?आपकी वाली कहाँ गयी ?मैंने कटाक्ष करना चाहा।
वही तो है ,वो ही तो मेरे यहाँ भी काम कर रही है।
क्या ये, आपके यहाँ भी काम करती है ?
हाँ ,बुला लेती हूँ ,कभी -कभी !उससे कह देना ,गुप्ता आंटी ने बुलाया है।
अब मुझे धीरे -धीरे पता चल रहा था ,यहाँ लगभग सभी इसी से काम करवातीं हैं और इसकी बुराई भी करती हैं।
मेरे घर में वो लगातार आ रही थी ,अब काम भी हल्का हो गया था किन्तु अभी भी वो दोपहर के काम के लिए कहती -आंटी !अब क्या करूंगी ? चार बजे बुला लो ! मैं ठाली [खाली ]रहती हूँ।
इधर मैं महसूस कर रही थी , उसको लेकर मोहल्ले के लोगो में भी, बेचैनी होने लगी थी । आखिर ये , इसके यहां इतने दिनों तक कैसे टिक गयी ? जब मैंने उनसे काम वाली ढूंढ कर लाने के लिए कहा था ,तब किसी ने कुछ नहीं बताया और जब मैंने स्वयं ही अपनी इच्छा से उसे रख लिया तो सब लोगों को बेचैनी होने लगी। अब सुदीप भी उसको देखकर,शांत रहते ,शायद उन्होंने सोच लिया था ,अब तो प्रतिदिन इससे सामना होगा ही।
स्वयं मेरी सास मुझसे पूछ रही थीं -तू ,इसके साथ ऐसे कैसा व्यवहार करती है ? क्या बातें करती है ? इतने दिनों तो ये बिना लड़े किसी के घर नहीं रह पाती है।
मेरे पास कोई मंत्र नहीं है ,बस ,मेरा व्यवहार है।वैसे मेरे अंदर भी उसके विषय में जानने की इच्छा थी ,वो कहाँ से आई है ?क्या इसका घर -परिवार नहीं है ?बहुत सारे प्रश्न थे किन्तु मैंने कोई जल्दबाज़ी नहीं दिखाई।
समय के साथ वह मुझसे खुलने लगी। तब एक दिन खुश होते हुए बोली -आंटी जी क्या मैं शाम को भी ,तुम्हारे घर आऊं ? बस, चाय पिला देना।
मैंने महसूस किया ,इसे चाय की तो जैसे लत लगी हुई है ,अब काम तो ज्यादा नहीं है ,मैं तुमसे और क्या करूंवाउंगी ? मैंने उससे पूछा।
तब वह बोली - घर की कुछ भी सफाई, कहते हुए दीवार पर लगी, टाइल्स को गंदी देखकर बोली -इन्हें ही साफ कर दूंगी।
मुझे उससे हमदर्दी हो चली थी। उसे देखकर मैं सोचती -लोग इसे 'पागल' क्यों कहते हैं ? यह अपने आप ही बड़बड़ाती रहती है या फिर कोई और बात है।
तभी मुझे स्मरण हुआ ,उसे तो मिसेज गुप्ता ने भी बुलाया है ,तब मैंने उससे कहा -तुम ,गुप्ता आंटी को जानती हो ,उन्होंने भी बुलाया है,वहाँ भी चली जाना ,तुम उनके यहाँ भी काम करती हो, तुमने बताया नहीं।
मुँह बनाते हुए, वो बोली - वो चश्मेवाली !वो तो कभी -कभी बुलाती है ,जब उसके बेटा -बहु आते हैं ,चिल्लाती बहुत है।
मेरा काम था ,तुम्हें बताने का , जाना या न जाना तुम्हारी इच्छा ! वैसे काम करने में कोई बुराई नहीं है ,दो पैसे ही हाथ में आते हैं।
वो तो बस ,बीस रूपये ही देती है।
क्या ?? मन ही मन मैं सोच रही थी ,मुझसे तो कह रही थी -पचास रूपये ! प्रतिदिन ! कैसे लोग हैं ?इसमें भी झूठ ! तब मुझे अपनी सास की बात स्मरण हो आई ,इसे इतने पैसे कौन देता है ?वो अभी भी बैठी हुई मुझे देख रही थी। मैं जानती थी, कि वह एक कप चाय पीकर ही जाएगी ,इसीलिए उसके लिए चाय बनाने के लिए रख दी,चाय बनाते हुए,मैं सोच रही थी -काम तो ये वैसे ही करती है ,जैसे कोई साधारण कामवाली करती है,तब इसे इतने कम पैसे क्यों ? क्या ये पैसे गिनना नहीं जानती ?
जब मेरे घर में, साफ सफाई हो गई , तब मेरी कामवाली वापस आ गई और ज़ीनत को काम करते हुए देखकर उस पर भड़क उठी और बोली -यह मेरा घर है, तुमने इस घर का काम क्यों पकड़ा ?
वह मेरी तरफ देखते हुए बोली -मुझे तो 'बाजी' ने बुलाया था, कहते हुए जल्दी-जल्दी काम करने लगी।
अब वह मेरे सामने खड़ी थी, और बोली- आपने इसे क्यों बुला लिया ?
ऐसे समय में तुम तो काम छोड़ कर चली गई थीं , तुमसे एक भी काम ज्यादा करने को कहो ! तो तुमसे होता नहीं है और जब ज्यादा काम आता है तो छुट्टी कर लेती हो, दृढ़ता से मैंने जवाब दिया।
अब छुट्टी नहीं होगी, उसे लग रहा था मैं उसके सामने गिड़गिड़ाऊंगी और उसकी खुशामद करूंगी, कि मेरा काम करवा दो! किंतु जब उसने देखा कि उसके बदले में कोई दूसरी आ चुकी है, तब उसके तेवर थोड़े ढीले हो गए और बोली -अब छुट्टी नहीं करूंगी। अब त्यौहार नजदीक है , जब मेरे लेने का समय आया तो इसे लगा लिया।
भूमि समझ गई थी, वह जानती है ,कि दीपावली के त्योहार पर कुछ न कुछ भेंट तो मिलेगी ही.... उसे उस भेंट के जाने का दुख होगा। तब भूमि ने जीनत से कहा - अब तुम चली जाओ ! कल आना।कल बात करेंगे।
भूमि ने उससे दो दिन काम करवाया, उसको दीपावली के उपहार के साथ उसको महीने की पगार देकर उससे कहा -अभी मुझे किसी कामवाली की आवश्यकता नहीं है , जब जरूरत होगी तो तुम्हें बुला लूंगी। वह समझ गई थी, इनके पास अब दूसरा ऑप्शन है किंतु अब कुछ कह भी नहीं सकती थी। सामान और वेतन लेकर, बाहर आ गई। दो दिनों तक ऐसे ही, घर के बाहर चक्कर लगाती रही , ताकि उसे ज़ीनत दिखाई दे और वह उससे लड़ाई आरंभ कर दे ! किंतु ज़ीनत भी जानती थी, कि ऐसे किसी के घर को पकड़ा नहीं जा सकता इसलिए वह कई दिनों तक नहीं आई।
तभी मेरे दिमाग में विचार आया ,यदि वो लड़ना चाहती तो लड़ सकती थी किन्तु उसे स्वयं में गलती का एहसास हुआ कि उसने दूसरी का काम पकड़कर गलती की है इसीलिए वो नहीं आई। इतनी समझ उसमें थी।
