रूही अपने बच्चों की फिक्र में, बौराई सी हो गई थी, वह समझ नहीं पा रही थी कि अपने बच्चों से कैसे मिले ? जबसे आश्रम में वो हादसा हुआ है ,अब बच्चे वाली मांएं अपने बच्चों को अपने साथ ही रखती हैं और रूही को अजीब -अज़ीब नजरों से देखती हैं। यह बात तो आस -पास फैल चुकी है ,'हवेली वालों की बहु ,आश्रम में रहती है ,शायद उसे, उसके पति ने छोड़ दिया है। उसे अपने बच्चों की याद सताती होगी ,इसीलिए दूसरों के बच्चों को अपना समझ उनसे लिपट जाती है।
उधर पार्वती ,गर्वित से कहती है - क्या आपका अहंकार इतना बड़ा है ? आपको अपने बच्चों का, भविष्य नजर नहीं आता। बिन मां के बच्चे, कैसे अपने आप को संभालेंगे ? क्या आपको अपने किए पर तनिक भी पछतावा नहीं है ? आपको यह सच्चाई स्वीकार करनी ही होगी , यदि रूही ने आपके भाइयों की हत्या की है, तो उन्होंने भी तो, उसके साथ अनुचित व्यवहार किया था।
आपसे उसका विवाह हुआ है , आपने, उसकी सुरक्षा का वचन दिया था। वो आपकी पत्नी है ,दूर ही क्यों जाना ? आप भी तो उस अपराध के गवाह हो और अब आप अपने अहंकार को सर्वोपरी माने बैठे हो। यदि आपके भाइयों की जान लेना अपराध है , तो क्या उनका व्यवहार भी अपराध नहीं था ? जिसमें आप भी शामिल थे। क्या आपको तनिक भी पछतावा नहीं है कि हम सबने एक मासूम, लाचार लड़की के साथ क्या किया ? और जब वो आपकी पत्नी बनकर इस हवेली में रह रही थी ,तब भी उन्होंने कोई उचित व्यवहार नहीं किया था।
हमारे यहाँ की प्रथा ही यही थी ,वो तो बस अपना अधिकार चाहते थे।
कैसा अधिकार ? क्या वे उसके पति थे ,क्या उनसे उसका विवाह हुआ था ? उसने, आपके साथ फेरे लिए थे ,पूरे परिवार के साथ नहीं। यदि आपके परिवार की कोई रस्म थी ,तब आप उससे बात करते और यह सब बताया जाता ,उससे ,उसकी स्वीकृति ली जाती। इस रस्म में उसे अपना साथ देना है या नहीं।
हँसते हुए बोली -मुझे तो नहीं लगता वो एक रस्म थी बल्कि अपनी हवस मिटाने एक बहाना था। बलात्कार द्वारा अधिकार नहीं मिलता ,उसका दंड मिलता है ,जो उसने दिया। वो अधिकार मांगने नहीं आया था ,वो उसके शरीर को पाना चाहता था। रस्म तो सिर्फ़ बहाना थी। आप सत्य को स्वीकार क्यों नहीं करते ? आपके जीवन की यही सच्चाई है।
क्या तुम जानती नहीं हो ?मैं रिश्ते में तुम्हारा जेठ हूँ ,क्या तुम हद से ज्यादा नहीं बोल रही हो ?
मैं जानती हूँ ,मेरी क्या हद है ?अब तो वो रस्म नहीं रही ,यदि आज वो रस्म होती ,तो सम्पूर्ण रिश्ते ख़ाक में मिल गए होते। कहीं ऐसा तो नहीं , जब आपको सच्चाई का पता चला ये' रूही' नहीं' शिखा 'है ,जिसके साथ हम सबने ही.... छिः मुझे तो सोचते हुए भी घिन्न आती है। उसने तो ये सब सहा है।
गर्वित की अंतरात्मा ,उससे कहती -अपनी जगह वो सही है किन्तु न जाने क्यों ?गर्वित के क़दम आगे बढ़ने से उसको रोक लेते। अपनी बात पर वह अडा बैठा रहा, बच्चों ने कुछ दिन अपने पिता से, मां के न आने का कारण पूछा-किंतु वह कोई जवाब ना दे सका।
अब तो मयंक दस बरस का हो गया , बातों को समझने लगा है , स्कूल भी जाता है। बच्चे अक्सर उससे ,उसकी मां के विषय में पूछते,वह निराश हो, कोई जबाब नहीं दे पाता।
अब जब भी बच्चे ,गर्वित से कहते -स्कूल में सब बच्चों की मम्मी आती हैं ,हमारी मम्मी क्यों नहीं जाती ? मैडम ,भी पूछ रहीं थीं।
परेशान होकर गर्वित ने ,उसे झड़प दिया और चिल्लाकर बोला - वो स्वयं ही गयी थी ,उसे ,मैंने नहीं भेजा।
झूठ ! पापा आप ही मम्मी को छोड़कर आये थे ,मुझे अभी भी याद है ,कहते हुए वो रोने लगा।
एक दिन गर्वित ने बच्चों से कहा -तुम्हें मम्मी चाहिए , तुम्हारे लिए मैं नई माँ लेकर आऊंगा।
इस बात पर उसके बड़े बेटे ने, उससे कई दिनों तक कोई बात नहीं की। इस बात को लगभग 4 वर्ष हो चुके थे। न ही गर्वित झुका और न ही रूही वापस हवेली में आई ।
एक दिन उसका बड़ा बेटा मयंक कोई कार्य कर रहा था। उसने एक डायरी देखी, जिसमें उसकी मम्मी की तस्वीर थी , उसके पापा भी उसमें, साथ थे और दोनों ही मुस्कुरा रहे थे, दोनों ही खुश थे। मयंक अपने पापा - मम्मी की तस्वीर लेकर, पहले छोटे भाई के पास गया और फिर छोटे भाई से अपने पापा के पास गया और बोला -देखो !हमारी मम्मी कितनी अच्छी लगती है ? और जैसे ही उसने, गर्वित को वह तस्वीर दिखाई गर्वित पुरानी यादों में खो गया और सोचने लगा मेरी जिंदगी कहां से कहां तक आ गई? इस अहंकार ने हमें कहीं का नहीं छोड़ा। इस ठाकुर परिवार का वारिस बनकर मुझे क्या मिला ?
लोग सम्मान से भी मुझे नहीं देखते और अब तो मेरी पत्नी भी आश्रम में ही रहती है। दबे स्वर में सभी इस विषय पर चर्चा करते रहते हैं ,क्या मैं समझता नहीं हूं ? कि गांव में यह चर्चा है कि ठाकुर साहब की पत्नी आश्रम में रह रही है शायद घर वालों ने उसे, घर से बाहर निकाल दिया है उसे भी तो इस बात की चिंता नहीं है वह भी तो अपने अहंकार को लिए बैठी है।
जब वो लोग ,उस तस्वीर को देख रहे थे ,तो दमयंती जी ने उन्हें देख लिया। बाद में मयंक से पूछा -तुम लोग, क्या देखकर प्रसन्न हो रहे थे ?
दादी !आज मुझे मम्मी की एक तस्वीर मिली ,हम उसे ही देख रहे थे ,मयंक का चेहरा फिर से खिल गया।
क्या तुम्हें, अपनी मम्मी की याद आती है ?
बहुत ,कहते हुए उदास होकर बोला -मेरे दोस्त भी कहते हैं -'तेरे पापा ने तेरी मम्मी को छोड़ दिया ,अब वो साधु बन गयी है और भी न जाने क्या -क्या कहते हैं ? मुझे मम्मी की बहुत याद आती है। दादी !आप ही जाकर मम्मी को ले आओ ! वो आपकी बात नहीं टालेंगी, दादी की ख़ुशामद करते हुए मयंक ने कहा।
दमयंती उठकर चुपचाप वहां से चली गयी। अगले दिन बिना किसी से कुछ कहे ,न जाने कहाँ ? हवेली से बाहर चली गयीं। तीन -चार घंटों के पश्चात , आकर अपने कमरे में चली गयीं।
न जाने, आज मम्मी जी कहाँ गयीं थीं ?आई हैं तो तभी से अपने कमरे में ही बंद हैं ,तुम्हें क्या लगता है ?कहाँ गयीं होंगी ? पार्वती ने सुमित से पूछा।
मुझे क्या मालूम ?आज तक वो कहीं भी गयीं हैं ,हमें बताकर कभी नहीं गयीं।
हालाँकि पार्वती हवेली की शानो -शौकत देखकर इस हवेली में आना चाहती थी, इसीलिए उसने सुमित से विवाह किया किन्तु अब उसे एहसास हो रहा था। अमीर लोग ,जैसे खुशदिल नज़र आते हैं ,वैसे होते नहीं। पार्वती तो मन ही मन सोचकर आई थी ,इस सम्पत्ति की अकेली मैं ही मालकिन बनूंगी। वो रूही को भी नहीं चाहती थी कि वो यहाँ रहे। यहाँ आने का, उसका उद्देश्य ही कुछ और था किन्तु धीरे -धीरे उसे लगने लगा। जितना बड़ा परिवार ,पैसा, उतनी ही ज़्यादा परेशानियाँ !
