Zeenat [part 4]

मौहल्ले में वो लगभग सबके घरों में काम करती थी किन्तु मजबूरी में भूमि को भी, उसे काम के लिए अपने घर बुलाना पड़ गया,जिसके कारण उसके पति सुदीप नाराज़ हो गए ,इतना ही नहीं ,आज पहली बार ही इतनी सुबह आ गयी ,उन्हें ये बात बिल्कुल भी अच्छी नहीं लगी। मन ही मन बड़बड़ाते हुए बोले -आज सुबह -सुबह न जाने किसका मुँह देख लिया ? किन्तु अब तो वो आ चुकी थी ,इसीलिए भूमि से नाराज होते हुए  बोले - माना कि तुमने उसे बुला भी लिया तो उसे, इतनी सुबह बुलाने की क्या आवश्यकता थी ?मैं अपने काम पर चला जाता ,तब बुला लेतीं। 


ये बात भूमि भी, महसूस कर रही थी,उसका इस तरह इतनी सुबह आना कुछ अटपटा सा लग रहा था  किन्तु अभी तो अपनी बात को सही ठहराना चाहती थी ,उसे इस बात का भी डर था ,यदि वो ये कहे ,मैंने इतनी सुबह नहीं बुलाया ,तो शायद सुदीप उससे कुछ कह न बैठें ,तब बोली - सही तो है, हम लोग तो सुबह जल्दी ही उठ जाते हैं , काम जल्दी हो जायेगा , यह तो और भी अच्छा है। 

तुम्हें क्या दफ्तर जाना है ? कहते हुए सुदीप ने उसे घूरा ,जैसी तुम्हारी इच्छा ! कह कर सुदीप बाहर बैठकर अपना समाचार -पत्र पढ़ने लगे।

 मैं भी रसोई में नाश्ता बनाने के लिए तैयारी में जुट गयी किन्तु मन ही मन सोच रही थी -ये आदमी लोग, हमारी परेशानी कभी नहीं समझेंगे ! इन्हें घर भी साफ -सुथरा चाहिए और कामवाली भी सुंदर ,साफ सुथरी होनी चाहिए ,इतने दिनों से कामवाली ढूंढ रही हूँ ,नहीं मिली तो क्या करती ?इस समय भूमि के हाथ और दिमाग़ में विचारों का आवागमन दोनों ही बहुत तेजी से चल रहे थे। 

काम हो जाने के पश्चात ,वो बोली -देख लो ! बाजी !सब ठीक से किया है ? 

काम हो जाने के पश्चात मैं, सारे घर में घूमकर देखती हूं ,कहीं कोई कमी तो नहीं रह गई ताकि मैं कल को उसकी सफाई में कमी निकाल सकूं, ऐसा मैं क्यों कर रही थी ? क्या मैं, उसे काम से निकालना चाह रही थी ? नहीं ,मैं अपनी सोच को, अपने आप को संतुष्ट करना चाहती थी, कि मैंने  उसे काम पर रख कर कोई गलती नहीं की और अपने पति को भी दिखला देना चाहती थी कि मैं गलत नहीं हूं। उसका कार्य देखकर मन खुश हो गया। आज बहुत अच्छा लग रहा था। आज सुबह-सुबह ही साफ -सफाई का काम हो गया किंतु अभी  खिड़की -दरवाजे साफ करने भी जरूरी थे, तब मन ही मन सोचा - आज इसका पहला ही दिन है इससे और काम से लिए बाद में बात करूंगी। 

जब मैं कमरे देखकर बाहर आई ,तो वो अभी भी, ऐसे ही बैठी रही ,मैंने उसकी तरफ देखा ,ये जा क्यों नहीं रही है ?तभी ध्यान आया -अरे !इसने तो मुझे कल ही बताया था -'आंटीजी ! मैं कभी किसी से मांगती नहीं किन्तु जिनके यहाँ मैं काम करती हूँ ,वे अपने आप ही मुझे चाय और खाने के लिए दे देती हैं। तभी मैंने उसके लिए गैस के चूल्हे पर चाय चढ़ाई और थोड़ा नाश्ता भी दिया ,ये सब करते हुए सुदीप ने मुझे देख लिया था।  

उसके जाने के पश्चात ,अब तुम ये काम भी करोगी ,उसके लिए चाय -नाश्ते का भी इंतज़ाम करोगी ,तुमने उससे साफ -साफ क्यों नहीं कहा ?तुम्हें पैसे किसलिए मिल रहे हैं ?

आप थोड़ा शांत रहिये !मैं उससे बात करूंगी। मैं अभी उसे भगाना नहीं चाहती थी,न ही आगे कोई इरादा था।   

 अगले दिन जब वह घर आई, तब मैंने उससे पूछा -सुबह तुम जल्दबाजी में काम करके चली जाती हो , दिवाली की सफाई कौन करवाएगा ?

कभी वह मुझे 'बाजी' कहती तो कभी 'आंटी' कह देती। धीरे -धीरे मुझे पता चला , बस, उसे तो दो रोटियों की जरूरत थी। चाय के साथ रोटी सब्जी या अचार के साथ रोटी या पराठा कुछ भी दे दो ! बस पेट भर जाए ! उसे कभी भी बुला लो !

 उसकी मेरे मन में एक अलग ही धारणा बनी हुई थी, जो कि मेरे पति द्वारा बताये गए, विचारों के कारण बनी थी और पड़ोसियों की बातचीत के कारण बनी थी। मैंने उसे गरमा-गरम रोटी दी और जो भी बनाया था उसे दिया।

 वह भोजन करके  बड़ी खुश हुई बोली -तूने तो गरम रोटी बनाई हैं -किंतु मुझे तो लोग बासी रोटी भी दे देते हैं , बचा -कुचा भी दे देते हैं , तू भी परेशान मत होना ! मुझे तो आदत है , कह कर चली गई।

उसने दो समय आकर घर की थोड़ी -थोड़ी सफाई की ,साथ में मैं भी लग जाती थी।  उसे मेरे घर काम करते हुए दो ही दिन हुए थे। तभी एक दिन मेरी सास आ गईं, वो उसे पहले से ही जानती थीं और उसे देखते ही भड़क कर बोली -तूने इसे क्यों रख लिया ? यह तो 'पागल' है। 

वो इतनी जोर से बोल रहीं थीं ,मैं घबरा गयी , कहीं वो सुन न ले !

मैंने धीमे स्वर में कहा -क्या करूं ?मेरी मजबूरी थी , त्योहार आ रहे हैं ,ऐसे में कोई काम वाली भी नहीं मिल रही थी, और यह खुशी-खुशी यहां आ गई। 

यह आ तो गई है, किंतु अब तुझे परेशान कर देगी।तूने इसे कितने पैसे बताये हैं ?

जो आजकल चल रहे हैं ,जितने पहली वाली को देती थी ,मैंने उन्हें अपना स्यानापन कहूँ या फिर होशियारी !उन्हें बताया -उससे कम ही बताये हैं !और ये उतने में ही  मान गयी ,मैं खुश हो रही थी कि मेरी इस बात पर वे भी खुश होंगी,यही सोचकर बताया था। 

 किन्तु वे बोलीं -इसे, इतने पैसे कौन देता है ?कहकर मुँह बनाया और चली गयीं। 

 मैंने सोचा -ऐसे मैंने क्या गलत बोल दिया ? मैंने भी मन ही मन निश्चय किया ,यदि इसने मुझे परेशान किया तो मेरी, इसे रखने की कोई मजबूरी भी नहीं है ,मैं इसे भगा दूंगी। मैंने अपने मन का वहम मिटाने के लिए एक -दो से फोन करके भी पूछा - आप उस' पगली' को कितने पैसे देती हो ?किन्तु किसी ने भी कोई स्पष्ट जबाब नहीं दिया।

 वो प्रतिदिन मेरे घर आती और झाड़ू पोछा करती, मैं चाय के साथ उसे कुछ ना कुछ दे ही देती थी और जब कुछ सामान नहीं होता, तो रोटी सेक देती थी।

 जब वो आई थी, परेशान लग रही थी , किंतु मैंने उसकी बातें सुनी हुई थीं  ,इस कारण उससे कभी कुछ नहीं पूछा - उसके साथ काम से काम तक ही अपने को सीमित रहने दिया।

 एक दिन मैंने देखा, वह काम करते हुए मन ही मन बड़बड़ाती रहती है, जैसे किसी पर अपनी भड़ास निकाल रही हो। एक दिन मैंने दीवार के पीछे खड़े होकर सुनना चाहा कि वह किसको, क्या कह रही है  और क्यों कह रही है ? किंतु उसके शब्द तो मुझे पहले ही कम समझ में आते थे इस तरह छुपकर बात सुनना मुझे गलत तो लगा किन्तु साथ ही कुछ भी स्पष्ट समझ नहीं आया क्योंकि वह जब भी सामने से बोलती थी -थोड़े शब्द मैं जब भी समझ नहीं पाती थी, कुछ समझ में आते थे,उन्हीं से अंदाजा लगाकर समझने का प्रयास करती ,वो क्या कह रही है ? वह मेरे व्यवहार से, अत्यंत प्रसन्न थी क्योकि मैं उसके साथ ज्यादा टोका -टाकी नहीं करती थी। 

एक दिन वो खुश होकर बोली -आंटी जी तू..  बहुत अच्छी हैं, मैं तुम्हारे यहां बहुत समय तक काम करूंगी।

 सभी लोगों को विश्वास था, दो-चार दिन में ही लड़कर, यह घर छोड़कर चली जाएगी लेकिन उसको काम करते हुए, मेरे पास लगभग, 15 दिन हो चुके थे। मोहल्ले में जिनको भी पता चला ,मैंने उसे काम पर लगाया है ,तब मुझे चेतावनी भी मिली। 

दरअसल हुआ ये था ,मैंने किट्टी में अपनी एक पड़ोसन से कहा -कोई कामवाली हो तो बताओ !

उन्होंने अनभिग्यता ज़ाहिर की ,तब मैंने पूछा था -तुम्हारे यहाँ जो लगी है ,उसे ही भेज दो !

क्या वो पड़ोसन ?भूमि की सहायता के लिए ,अपनी काम वाली को भेजेगी ,आगे क्या होगा जानने के लिए पढ़िए ! ज़ीनत !



laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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