Zaruri nahi

 जरूरी तो नहीं, रातों को नींद ,'मोहब्बत' में न आए।

कभी-कभी ज़िम्मेदारी भी, करवट बदलने पर मजबूर करती हैं। 

जरूरी तो नहीं, इश्क़ में ही, हमने धोखे खाए हैं। 

कभी-कभी हमारे अपने ही, हमको रुलाने पर लाचार करते हैं।



 

जरूरी तो नहीं,'' रुसवाईयां'' इश्क़ में ही होती हैं ।

हमें अपने लोगों ने भी कई बार, इसी अंजाम तक पहुंचाया है। 

जरूरी तो नहीं, उसकी याद में ही तारों को गिना जाता है। 

''गर्दिशों'' में भी हमने, रातों को तारे गिनते बिताया है।

 

जरूरी तो नहीं इंतज़ार ,मोहब्बत में आशिक़  का होता है। 

कभी-कभी आरज़ू , खुशनुमा पलों 'का भी इंतज़ार होता है। 

जरूरी नहीं, एकांत प्रेम की मानिंद चुना....  मैंने ,

कभी-कभी एकांत 'सुकूँ ए मौज' के लिए भी चुना होता है।

 

'इबादत 'की हमने, कभी खूबसूरत  'सनम' की,

आज तो' इबादत' के लिए 'सुकूँ ए चाहत '' रहती है। 

जरूरी नहीं, रातों को ख्वाबों में, किसी हंसी की सूरत आए।

 ख़्वाब देखे,मुद्द्तें हो गयीं,बस चाहत सुकूं ए नींद की रहती है।


 अक़्सर उदासियों के घेरे ने ,रातों को जगाया है।   

हो सकता है ,रातों को बेचैनियों ने, मेरी निंदों  को चुराया है। 

तन्हाइयों में ,लोगों की बेरूख़ी ने, बहुत सताया है। 

 पुकारा नहीं, किसी ने,.लगता संग अपने कोई' हमसाया 'है। 


ज़रूरी नहीं ,मोहब्बत के बदले मोहब्ब्त ही मिले हमको !

कभी -कभी  कड़वाहटों संग भी ,जीवन हमने बिताया है। 

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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