जरूरी तो नहीं, रातों को नींद ,'मोहब्बत' में न आए।
कभी-कभी ज़िम्मेदारी भी, करवट बदलने पर मजबूर करती हैं।
जरूरी तो नहीं, इश्क़ में ही, हमने धोखे खाए हैं।
कभी-कभी हमारे अपने ही, हमको रुलाने पर लाचार करते हैं।
जरूरी तो नहीं,'' रुसवाईयां'' इश्क़ में ही होती हैं ।
हमें अपने लोगों ने भी कई बार, इसी अंजाम तक पहुंचाया है।
जरूरी तो नहीं, उसकी याद में ही तारों को गिना जाता है।
''गर्दिशों'' में भी हमने, रातों को तारे गिनते बिताया है।
जरूरी तो नहीं इंतज़ार ,मोहब्बत में आशिक़ का होता है।
कभी-कभी आरज़ू , खुशनुमा पलों 'का भी इंतज़ार होता है।
जरूरी नहीं, एकांत प्रेम की मानिंद चुना.... मैंने ,
कभी-कभी एकांत 'सुकूँ ए मौज' के लिए भी चुना होता है।
'इबादत 'की हमने, कभी खूबसूरत 'सनम' की,
आज तो' इबादत' के लिए 'सुकूँ ए चाहत '' रहती है।
जरूरी नहीं, रातों को ख्वाबों में, किसी हंसी की सूरत आए।
ख़्वाब देखे,मुद्द्तें हो गयीं,बस चाहत सुकूं ए नींद की रहती है।
अक़्सर उदासियों के घेरे ने ,रातों को जगाया है।
हो सकता है ,रातों को बेचैनियों ने, मेरी निंदों को चुराया है।
तन्हाइयों में ,लोगों की बेरूख़ी ने, बहुत सताया है।
पुकारा नहीं, किसी ने,.लगता संग अपने कोई' हमसाया 'है।
ज़रूरी नहीं ,मोहब्बत के बदले मोहब्ब्त ही मिले हमको !
कभी -कभी कड़वाहटों संग भी ,जीवन हमने बिताया है।
