Mysterious nights [part 169]

ऐसे वातावरण में ,किसी को कुछ भी समझ नहीं आ रहा था। सभी ग़मगीन बैठे थे, जिसको भी पता चल रहा था। वही अपनी दुखभरी संवेदनाएं व्यक्त करने पहुंच जाता। घरवाले अभी गर्वित के आने की प्रतीक्षा में थे। ताकि वो समय से आकर अपने भाई और पिता का अंतिम बार दर्शन कर ले।

 तभी अचानक दमयंती अपने स्थान से उठी ,सभी ने सोचा ,इतनी देर से एक ही स्थान पर बैठी हुई हैं। थक गयी होगीं किन्तु वो उठकर अपने कमरे की तरफ बढ़ती चली गयी ,किन्तु उसे गए हुए ,लगभग आधा घंटा हो गया। तब किसी ने पूछा - इस बच्चे की माँ कहाँ है ?उसे अपने बच्चे और पति के पास यहाँ होना चाहिए।


 

वो अभी अपने कमरे में गयी हैं ,आती ही होंगी। उन्हें सबने जाते हुए तो देखा था किन्तु निकलते हुए नहीं देखा ,तब उन्होंने पूछा -वो अपने कमरे में ऐसा क्या कर रही है ? तब कविता उठकर दमयंती जी को बुलाने के लिए उनके कमरे में जाती है किन्तु कमरे में तो कोई नहीं था। उसने आकर बताया -मालकिन वहां नहीं हैं। 

ऐसा कैसे हो सकता है ?वो कहाँ चली गयी ?उनके रिश्ते में ,उनकी ननद बोली। भाभी को ढूंढो !हवेली में यहीं कहीं गई होगी,भगवान !उन्हें इतने बड़े दुःख को झेलने की हिम्मत दे ,उन्हें ढूंढो ! कहीं उन्हें भी कुछ न हो जाये। 

 इतनी बड़ी हवेली है ,मैं भला उन्हें कहाँ -कहाँ ढूंढूंगी ? कविता ने जबाब दिया। 

सबके मन में ड़र बैठ गया था ,आज दमयंती की ज़िंदगी का सबसे काला पन्ना है ,जब एक ही दिन में उसका बेटा और उसका पति उसकी आँखों के सामने ही ,इस दुनिया से चले गए । वो भी कहीं अपने साथ कुछ कर न ले। 

इधर दमयंती ,अपने कमरे से निकलकर सीधे हवेली के उस गुप्त मार्ग से होते हुए ,उन महात्मा जी से मिलने जा पहुंची। ऐसे समय में उसे उनके साथ होना चाहिए किन्तु उसे लग रहा था। मेरे घर में जो भी दुर्घटनाएं हो रहीं हैं। इनका निवारण वो बाबा ही कर सकते हैं और वो आज ही मिलेंगे, फिर न जाने वो कब आएं ?तीन को तो खो चुकी हूँ किन्तु अब दो को और नहीं खो सकती। मेरी इस समस्या का निदान अवश्य ही उनके पास होगा।  यही सोचकर वो अपनी हवेली से बाहर आ गयी थी और उसी व्यक्ति के बताये गए ,मार्ग से होते हुए उस ताल के पीछे की झोंपड़ी के करीब जा पहुंची।

 वो शीघ्रता से, उस झोंपड़ी के समीप जा पहुंची। वहां पहुंचकर उसने देखा -एक सिद्ध पुरुष, किसी क्रिया में व्यस्त थे,शायद हवन कर रहे थे।  वह कुछ नहीं बोली और दरवाजे पर खड़ी रहकर देख रही थी क्योंकि वह सोच रही थी इनका कार्य पूर्ण हो तो मैं उनसे अंदर जाने की अनुमति मांगू। तभी उनका स्वर  गूँजा -आई तो....हो, किंतु बड़ी देर लगा दी , उनकी आवाज सुनकर, दमयंती को लगा शायद वो किसी और को पुकार रहे हैं ,और वह इधर-उधर देखने लगी।  अब क्या वहीं खड़ी रहोगी, अंदर नहीं आओगी, कहते हुए उन्होंने हाथ से इशारा किया। तब दमयंती को लगा, ये मुझे ही पुकार रहे हैं।

इतना सब खोने के पश्चात ,अब तुम्हें ,हमसे मिलने की सुध आई। 

गुरूजी !मेरी सास यहाँ आती थीं ,अब वो इस दुनिया में नहीं रहीं ,किन्तु अब हवेली पर इतनी विपत्तियां आन पड़ीं हैं ,कुछ तो उपाय कीजिये !मेरे बच्चे एक -एककर इस दुनिया से जा रहे हैं। न जाने मेरे परिवार को किसकी बुरी नजर लगी है ?

तुम्हारे परिवार को, तुम्हारे ही बुरे कर्मो की नज़र लगी है,बाबा स्पष्ट बोले - तुम्हारी सास तो इस दुनिया से चली गयी किंतु उसके जीवन का उद्देश्य घर की एकता बनाये रखना था किन्तु पवन को या फिर जल  को क्या कभी कोई बांध सका है ? और वो लोगों के जीवन को बांधने चली थीं । वहीं  उससे चूक हो गई। दमयंती चुपचाप जाकर उनके सामने बैठ गई थी और उनकी बातें सुन रही थी।  उसका दंड उसको मिल चुका है और तुम्हारे द्वारा ही वो दंडित हुई है कहते हुए गुरूजी की नजरें दमयंती के चेहरे पर जा टिकीं।  उनके इतना कहते ही... दमयंती का चेहरा पीला पड़ गया।

 उसका पीला पड़ा चेहरा देखकर वो बोले -तुम क्या समझती हो ?तुमने जो पाप किया है ,वो क्या छुपा रह जायेगा किन्तु  तुमने भी तो बहुत गलतियां की हैं। यह जरूरी नहीं की, जिसने गलती की है ,उसको दंड देने का अधिकार, तुमको मिल गया है, यदि उसने गलती की है तो वह सुधारने का प्रयास भी तो कर सकती थी। लेकिन तुम तो अपने को जैसे भगवान ही मान बैठी थीं। उनके मुख से ऐसी बात एक सुनकर दमयंती घबरा गई। तुम क्या समझ रही हो ?क्या किसी को कुछ पता नहीं चलेगा ? वह हमारे गुरु की भक्त थी, माना कि उससे कुछ गलती हुई थी किंतु तुमने मार कर उससे और बड़ी गलती की है। 

अब तुम क्या चाहती हो ? तुम भी तो गलती पर गलती किए जा रही हो। उन्होंने दमयंती की तरफ देखा , दमयंती नज़रें झुकाए बैठी रही।

 तब वह बोली -यही तो समझ नहीं आ रहा है मुझसे कौन सी गलतियां हो रही हैं या हुई हैं , जो मैं समझ नहीं पा रही हूं जिनका परिणाम मेरी संतानों को भुगतना पड़ रहा है और आज तो मैं विधवा भी हो गयी। मेरे साथ ही ये सब क्यों हो रहा है ?कहते हुए दमयंती रोने लगी।  

तुमने एक विधवा का अपमान किया है ,उसका अपराध तो तुम्हें भोगना ही होगा। 

मम्मी जी! ने यह नहीं बताया था, कि वह विधवा न हो, उन्होंने तो कहा था -कि कोई कुंवारी कन्या हो। 

हां, यह कहा होगा, किंतु वो विवाहिता थी ,उस पर अपने पति के प्रेम का रंग चढ़ चुका था। वो कुंवारी कैसे रही ?तुम उसके तन को देख रहीं थीं किन्तु मन से तो वो उसकी हो ही चुकी थी। यह भी तो कहा होगा, उसकी स्वीकृति आवश्यक है। तुम्हारा एक बेटा तो बंधन से बाहर था, उसके लिए कोई बंधन नहीं था, वह अपनी पत्नी के साथ सहर्ष अकेला रह सकता था। वह लड़की बहुत ही सुशील , और संस्कारी लड़की थी। उसकी कोमल भावनाएं अपने पति के लिए थीं। आज के समय में ऐसी सती नारी कहाँ मिलेगी ? जो अपने प्यार के लिए अपना जीवन कुर्बान करने के लिए तैयार थी किंतु तुमने उसके त्याग को समझा ही नहीं वरन  तुम्हारे इस स्वार्थ में, तुम्हारे वो बेटे सहयोगी रहे। 

उसे कुंवारी लड़की समझ कर अपने चारों बेटों के लिए तुम, उसे धोखे से उसके मायके से वापस ले आईं । क्या यह उचित था ? वह तुम्हारे पुत्र की बेवा थी। इतना ही नहीं, तुम लोगों ने उसका चरित्र हनन  किया। उसकी आत्मा को रौंद डाला। उसके सतीत्व का सर्वनाश कर दिया , क्या यह उचित था, क्या उसने स्वीकृति दी थी ?एक बार आकर गुरूजी से तो मिल लेते, हो  सकता है ,वो कोई समाधान बताते। 

इतने आरोप सुनकर, दमयंती अपने को रोक न सकी और रोते हुए बोली -भगवन ! मैं  पुत्र मोह में पड़ गई थी, मैंने इस और ध्यान ही नहीं दिया। 

यह सुनकर उन महात्मा को क्रोध आया और बोले-तुमने अपने पुत्र मोह के कारण, एक नारी को जीते जी मृत्यु प्रदान की और तुम्हारी सास ने सिर्फ एक अपराध किया था , वह परिवार की एकता बनाये रखना चाहती थी जिसके कारण उससे गलती हुई और उसका परिणाम उसे भुगतना पड़ा तुमने अपनी सास की ही हत्या कर दी -'इंसान समझता है ,हमें कोई नहीं देख रहा किन्तु उसकी तो सेंकडो आँखें हैं ,अपने अपराध के दंड का परिणाम भुगतने के लिए कहीं जाना नहीं पड़ता ,सबका यहीं हिसाब हो जाता है किसी का शीघ्र तो किसी का देर से.....  यह सुनते ही दमयंती मन ही मन सोच रही थी, इन्हें  ये सभी बातें  कैसे मालूम हुईँ  ?

क्या सोच रही हो ? तुमने सोचा होगा, कोई तुम्हें देखा नहीं पा रहा है किंतु तुमने उस ऊपर वाले का ध्यान नहीं किया जिसकी दृष्टि चारों तरफ रहती है। तुम पाप पर पाप किए जा रही थी,, क्या तुमको उसका दंड नहीं मिलेगा ?

गुरुदेव में नादान थी, मैं कुछ समझ ही नहीं पाई थी मुझे क्या करना चाहिए और क्या नहीं ? मैं घबरा गयी  थी, और उन पर क्रोध भी था,उनके कारण ही तो हमारी हवेली को, ये श्राप लगा है  किंतु अब तो बताइए मेरी हवेली पर विनाश के बादल मंडरा रहे हैं ,मैं इतना तो अवश्य समझ पा रही हूं अवश्य ही किसी की काली नजर लगी है। 

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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