घर में एक मौत हो गयी और इसका प्रसारण,टेलीविजन पर हो रहा है। माना कि ठाकुर परिवार के विषय में जानने के लिए लोग उत्सुक रहते हैं। जानना चाहते हैं ,इस परिवार में क्या चल रहा है ?किन्तु इतना भी नहीं कि उनके परिवार में एक मौत हुई है और वो तमाशा बन जाये या फिर लोग उस परिवार के रीति -रिवाज़ और रहन -सहन को लेकर उस हवेली में घुसने का प्रयास करें। तभी बलवंत सिंह ने आगे बढ़कर, उस टेलीविजन को बंद कर दिया।
यह खबर, इन लोगों को किसने दी ? हरिराम जी ने पूछा - यह कोई खुशी की खबर नहीं है , जो मीडिया वालों को दे दी जाए। हमारे यहाँ दुःख बढ़ा है ,इसका हमें तमाशा नहीं बनाना है।
गर्वित को बुलाने के लिए ही, मजबूरन यह सूचना हमें, उन्हें देनी पड़ी, उसका तो पता ही नहीं है, वह कहां गया है ? उसे भी, पता नहीं होगा ,हवेली में क्या हो रहा है ?इसलिए इन लोगों का सहारा लेना पड़ा ताकि वो , यह सूचना देखे और घर वापस लौट आए,ज्वालासिंह ने जबाब दिया -किन्तु इन्होंने इसके प्रसारण को रहस्य्मयी ख़बर बना दिया।
नमक -मिर्च लगाना तो इनकी पुरानी आदत है।
रूही को रोना तो नहीं आ रहा था, इसलिए उसने थोड़ा घुंघट आंखों पर कर लिया था ताकि उसका चेहरा बाकी लोगों को कम ही दिखाई दे।
तभी एक जोरदार आवाज गूंजी -अरे, डॉक्टर! तुम्हें यहां क्यों बुलाया गया है ? तुम अपना काम करो ?क्या तुम कुछ कर सकते हो या नहीं, तुम लोगों ने, पहले ही मान लिया है कि अब यह जिंदा नहीं है, आखिर इसे हुआ क्या है ? कुछ तो पता होगा, किसी जीव ने काटा है, या फिर इसे जहर दिया गया है। तुम यहां इसी तरह बैठे रहने के लिए आए हो, कुछ करोगे या नहीं, तब ये ठीक कैसे होगा ?
आज जगत सिंह जी की आवाज तेज हो गई थी।उनकी मूछें और बाल श्वेत रंग में रंग चुके हैं किन्तु अभी भी उनकी क़द -काठी मजबूत दिखती है। अभी भी सीधे खड़े रहते हैं। उम्र के हिसाब से पहनावा थोड़ा बदला अवश्य है किन्तु उनकी चाल और रुआब देखकर कोई कह नहीं सकता कि वो साठ वर्ष के हैं। चेहरे पर अभी भी रंगत दिखती है ,कोई बिमारी नहीं ,अभी भी मीलों तक पैदल घूम आते हैं।
किन्तु आज उनकी नजरों के सामने से उनका तीसरा बेटा, उन्हें जमीन पर लेटा हुआ नजर आ रहा था। दुख की अधिकता के कारण, उन्होंने अपना क्रोध डॉक्टर पर ही निकाला।
एक पुरुष जिसको आरम्भ से ही मजबूत होना सिखलाया जाता है।उसका स्वयं का अहम भी, उसके झुकने से इंकार करता है। वो कोई अबला नारी नहीं, जो महिलाओं की तरह रो दें । वो कमज़ोर नहीं है ,उसे अपने परिवार और घर के लिए मजबूत होना होता है। वो एक घर की छत है ,सब सहकर भी उसे दिखलाना नहीं है ,कि उसे भी दर्द होता है। यहाँ तो ठाकुर ख़ानदान की तख़्ती लगी है ,जो अपनी आन -बान- शान के लिए जाने जाते हैं। उनकी दो औलादें उनकी नजरों के सामने बिना किसी कारण इस धरा की मिटटी में मिल चुकी हैं। एक अभी उनके सामने है। जो अभी कुछ घंटों पहले उनकी नजरों के सामने हंस -खेल रहा था। वो इस तरह जमीन पर लेटा मिलेगा इसकी तो कल्पना भी नहीं की थी अभी कुछ महीनों में ही उनके हँसते- खेलते बेटे इस तरह उनकी नजरों के सामने ही चले जायेंगे। एक पिता को मानसिक रूप से तोड़ने के लिए, क्या ये इतना बड़ा आघात कम है ?
मन में एक घुटन थी ,वो रो भी नहीं पा रहे थे ,चिल्ला रहे थे ,अब उस घुटन ने ,मन की घबराहट के रूप में अपना स्थान बना लिया था, वो समझ नहीं पा रहे थे आख़िर इस हवेली में क्या हो रहा है ? न जाने, किसकी बद्दुआ लगी है ? ये बात आज उन्हें महसूस हो रही थी। जिन बच्चों को देखकर उनका सीना प्रसन्नता से चौड़ा होता था ,आज वो उनकी नजरों के सामने किस तरह लेटा हुआ है। उन्हें लग रहा था ,ये अभी उठेगा और कहेगा -बड़े पापा !अब मैं इतना बड़ा हो गया हूँ। सब संभाल सकता हूँ। आप तो बस अब आराम करना।
डॉक्टर उनकी हालात और उनकी मानसिक स्थिति को समझ कर घबरा गया, कहीं ऐसा ना हो, इनका क्रोध मुझे झेलना पड़े। तब वह बोला -ठाकुर साहब ! मैंने प्रयास किया किंतु किस पर प्रयास करूं सांस तो मेरे आने से पहले ही, नहीं बची थीं।
अरे, डॉक्टर !तो भगवान होता है , तुम्हें इसे ठीक से देखना चाहिए। हो सकता है, फिर से साँस आ जाए।
अब डॉक्टर क्या कहे ? डॉक्टर की स्थिति को समझ कर हरिराम जी उससे बोले -अब तुम जा सकते हो।
नहीं, ये अभी नहीं जायेगा ,उन्होंने रोकना चाहा किन्तु तब तक डॉक्टर अपनी जान बचाने के लिए आगे बढ़ गया। तभी कहते हुए जगतसिंह जी जैसे ही उठे ,उनके सीने में भयंकर दर्द उठा ,और वो दर्द के कारण कराह उठे और वहीँ जमीन पर गिर पड़े। तभी जाते हुए डॉक्टर को हरिराम ने पुकारा -डॉक्टर !उनकी ह्रदयविदारक चीख सुनकर ,डॉक्टर वापस लौटा ,जगतसिंह जी की हालत देखकर उसने तुरंत ही अपनी दवाइयों का बैग खोला और...... तब तक जगतसिंह जी खामोश हो चुके थे। उनके दर्द से उन्हें मुक्ति मिल गयी थी। दवाई की भी आवश्यकता नहीं पड़ी।
डॉक्टर ने वहां खड़े सभी लोगों की तरफ निराशा से देखा ,वो लोग भी समझ चुके थे ,जगतसिंह जी भी अब इस दुनिया से प्रस्थान कर चुके हैं। भरी जवानी में ,अपनी आँखों के सामने अपनी तीन -तीन संतानों को इस दुनिया से जाते देखकर,वो ये दुःख सहन न कर सके और चल बसे। उम्र में तो अब सबसे बड़े वही थे। बच्चों का सदमा झेल न सके। उनको जाता देखकर ,हरिराम ,बलवंत और ज्वाला जैसे बिखर से गए। हवेली के अंदर दो -दो लाशें पड़ी हैं। यह बात सम्पूर्ण गांव में फैल गयी। न जाने , हवेलीवालों को किसकी नजर लगी है ? अब तो हवेली से लाशें ही बाहर आ रहीं हैं।
उदास मन गर्वित गंगा के घाट से नहाकर,अभी एक जगह चाय- नाश्ता करने के लिए आया था। तब उसने भी ,यह खबर देखी और सुनी ,उसे तो जैसे अपने कानों पर विश्वास ही नहीं हुआ। ये मेरे घर में क्या हो रहा है ? क्या ये ख़बर सच्ची है ?ऐसा कैसे हो सकता है ?अभी तो मुझे बाहर आये ज़्यादा दिन भी नहीं हुए ,अब अचानक ऐसा क्या हो गया ? तुरंत ही उस स्थान से बाहर आया और उसने अपना फोन निकाला जिसको उसने कुछ दिनों के लिए बंद करके रख दिया था और तुरंत ही घर के नंबर पर फोन लगा दिया।
हैलो ! किसी अनजान व्यक्ति ने फोन उठाया। ऐसे वातावरण में फोन उठाने की किसे सुध थी ,गर्वित ने ,रूही को फोन किया था किन्तु उसने भी फोन नहीं उठाया। उठाती भी कैसे ?वो तो भीड़ में ,अपनी सास दमयंती के समीप बैठकर इस परिवार के लिए सहानुभूति बटोर रही थी और जैसे ही कोई पूछता तो उसे कहानी सुनाती -मुझे तो कुछ भी मालूम नहीं है ,क्या हुआ ?वो तो सुबह हमारी नौकरानी कविता ने दरवाजा खटखटाया ,और इस हादसे के विषय में बताया। मैंने तो सुबह से एक घूंट पानी भी मुख में नहीं डाला ,तुरंत ही दौड़ी चली आई। यहाँ आकर देखा तो..... अधूरे शब्द छोड़ रोने का अभिनय करती। न जाने इस हवेली के लोगों को क्या हो रहा है ?न जाने, किसका बुरा कर्म सामने आ रहा है ?कहते हुए दमयंती की तरफ देखती और अब ये बड़े पापा ! ये तो सभी की आँखों के सामने थे ,बेचारे !इस उम्र में अपने बेटों से बिछुड़ने का दुःख सहन न कर सके।
हैलो !कौन साहब बोल रहे हैं ?
मैं गर्वित बोल रहा हूँ ,आप कौन ?
उसने अपना नाम नहीं बताया और पूछा -साहब !आप कहाँ हैं ?सभी आपकी प्रतीक्षा में हैं।
हवेली में क्या हुआ ?घबराते हुए गर्वित ने पूछा।
आपके सबसे छोटे भाई पुनीत बाबा नहीं रहे ,गर्वित के हाथ से फोन छूटते -छूटते बचा ,मेरा सबसे छोटा भाई पुनीत !
उसे क्या हुआ ?
पता नहीं, साहब !उनके दुःख में बड़े मालिक !!!
अरे किसना !किससे बातें कर रहे हो ? रामखिलावन ने पूछा।
बड़े साहब !!इससे पहले की वो अपनी बात पूरी करता ,रामखिलावन ने उससे फोन छीना और बोला -हैलो !किन्तु तब तक फोन कट चुका था। तूने हमें बताया क्यों नहीं ?
कैसे बताता ?वो पूछने लगे।
क्या पूछ रहे थे ?घर के बारे में ,मैंने उन्हें पुनीत बाबा के बारे में बता दिया।
अच्छा चल बाहर बैठ !कहकर रामखिलावन उसे बाहर ले गया और बलवंत सिंह जी को बताया - बड़े भइया का फोन आया था ,उन्हें पता चल गया है।
क्या वो आ रहा है ?
पता नहीं ,किसना ने फोन पर बात की थी।
गर्वित देर तक रोता रहा और हवेली में पहुंचने के लिए गाड़ी में बैठ गया।
