Mysterious nights [part 167]

पुनीत को लगता था ,हमारे घर में यह जो नई लड़की, बहु बनकर आई है ,वो ठीक नहीं है ,हमारे घर की रस्में भी मानने से इंकार कर रही है। वो उस पर पति का अधिकार दिखलाकर उसे, अपने वश में करना चाहता था किन्तु तभी उसे पता चलता है ,रूही ही शिखा है ,यह देख और समझकर तो उसे जैसे चक्कर ही आ गए। तब उसे लगता है ,घर में हुई इन घटनाओं के पीछे हो न हो इसी का हाथ है। तब वो उससे पूछता है - क्या गौरव भाई के मारने में तुम्हारा ही हाथ था ?

नहीं ,भला मैं नाजुक सी लड़की,अबला बेचारी !इतने ताकतवर इंसान से कैसे लड़ सकती हूँ ?रूही इठलाकर बोली,बाज़ी जैसे अब उसके हाथ में थी। 


जो भी किया, तुम्हारे भाई ने ही किया हंसकर बोली। 

भाई ने, क्या किया ?आश्चर्य से पुनीत ने पूछा। 

बस तुम्हारे भाई गर्वित ने सुलह करने के लिए उसे कॉफी पिलाई थी। 

तो क्या हुआ ?कॉफी पिलाना क्या गलत है ?

तुम अब जो भी सुनोगे, उससे तुम्हारे होश उड़ जायेंगे,पहले थोड़ा पानी तो पी लो !

नहीं ,मुझे पानी नहीं पीना है ,तुमने मेरे भाई के साथ क्या किया ?मुझे वो बताओ !

न...न... देवरजी ! मेरे होने वाले पतिदेव ! अभी तो तुम्हें बताया ,मैंने कुछ नहीं किया ,उन्होंने ही कॉफी पिलाई थी। 

ये बात तो तू ,पहले भी बता चुकी है ,नाराज होते हुए पुनीत ने कहा। 

उसके बाद ,उस कॉफी ने ही अपना काम किया ,बस मैंने तो एक चुटकी,उसमें, अपना प्रेम डाला था ,अब क्या करूं ?तुम्हारे भाई को, मेरा वो' प्रेम' रास ही नहीं आया कहकर हंसी और तुरंत ही उसका  चेहरा सख़्त हो गया और बोली -तभी उसे 'ह्रदयघात 'हो गया। 

तूने उसमें क्या डाला था ?मुझे बता !!!

क्या तुमने पढ़ाई नहीं की ,डॉक्टर को पता होता है ,कि वो क्या पदार्थ होता है ?किन्तु उसे भी कैसे पता चलता ?वो डॉक्टर जो नहीं था, कहकर हंसने लगी और बोली -तुम्हारे उस ड़रपोक भाई से मैंने बस यही कहा -तुम्हारे हाथ की काफ़ी पीकर ही वो मरा है। सच में वो अपने भाई से बहुत प्रेम करता था ,इस बात का उसे बहुत दुःख हुआ और वो शांति की तलाश में निकल गया। बात भी सही है ,यहाँ तो अब अशांति का ही वास है। भागने दो !उसे !कब तक अपनी मौत से भागेगा ?

तेरा ये चेहरा !मैं सबको दिखाऊंगा ,तू चुड़ैल है ,चुड़ैल !! तू हमें बर्बाद करने आई है ,जी में तो आ रहा है ,तुझे गला घोंटकर यहीं मार दूँ किन्तु अन्य लोगों को भी तो पता चलना चाहिए ,तू क्या चीज है ? तेरा अब जुलुस निकलवाएंगे !सारे गांव के सामने तेरी असलियत आएगी ,कहकर वो बाहर की तरफ भागा। 

रूही हंसी और बोली - पहले अपने आपको तो बचा ! ज्यादा दूर नहीं जा पायेगा। 

रूही की बात सुनकर वो रुका और बोला -तू, ऐसा क्यों कह रही है ?

जा ! पहले घर वालों तक पहुंच तो सही ,भाग.....कहीं  तेरे मन की मन में ही न रह जाये।  

तभी पुनीत को घबराहट होने लगी और वो बाहर की तरफ भागा ,अभी कुछ दूरी तक ही गया था ,उसे साँस लेने में दिक्क्त महसूस होने लगी। ये तूने क्या कर दिया ?वो चीखना चाहता था ,उसके पीछे आती रूही बोली -तूने, पानी जो पीया है। 

किन्तु वो पानी तो तूने भी..... आगे के शब्द वो नहीं बोल पाया। 

अब अपने आपको ज्यादा कष्ट मत दे ! पहले मैंने पानी इसलिए पिया ताकि तुझे, मुझ पर भरोसा हो ,मैंने पहले से ही गिलास में वही चीज डाल दी थी ,जो तुम्हारे भाई ने कॉफी में पी ,अब तुम्हारा भी राम नाम सत्य ! अब तो तुमने सच्चाई का पता लगा ही लिया। यहाँ तो तुम किसी से कुछ नहीं कह पाओगे किन्तु ऊपर जाकर अपने भाई को सच्चाई अवश्य बताना ! शुभरात्रि ! कल मुझे उठकर तुम्हारे लिए झूठे आंसू भी तो बहाने हैं कहकर रूही अपने कमरे की तरफ बढ़ चली किन्तु पुनीत अपनी माँ के कमरे की तरफ बढ़ने का प्रयास कर रहा था।

प्रातःकाल कोई बड़े जोर -जोर से रूही के कमरे का दरवाजा खटखटा रहा था। रूही देर रात तक ठीक से सो ही नहीं पाई थी इसीलिए सुबह भी ,उठ ही नहीं पाई ,नींद में तो वो भूल ही गयी थी कि कल रात्रि उसके कमरे में क्या हुआ था ?जैसे ही उसकी आँख खुली और उसने अपने को उस कमरे में देखा ,तब उसे जैसे सब स्मरण हो आया। मन ही मन सोचा, आज सुबह-सुबह एक मनहूस खबर सुनने के लिए तैयार रहना है । अंगड़ाई लेते हुए उसने जम्हाई ली और दरवाजा खोल दिया। 

दरवाजे पर कविता खड़ी थी, रूही को देखते ही बोली -बहू जी ! गजब हो गया , अपने पुनीत भैया को कुछ हो गया है, लगता है वह नहीं रहे, आप जल्दी आ जाइए !

रूही तो पहले से ही जानती थी, फिर भी उसे अभी अभिनय करना था , इसीलिए वह तुरंत ही , फ्रेश होकर कमरे से बाहर निकली। जब वह वहां पहुंची, तो दमयंती जी तो जैसे बेसुध पड़ी थी। वो खुली आंखों से सब कुछ देख रही थीं, कौन आ रहा है, कौन जा रहा है ? किंतु लग रहा था, जैसे वह अपनी चेतना खो  चुकी हैं। जमीन पर पुनीत पड़ा था, उसे देखकर, रूही बोली -अरे, इन्हें क्या हुआ ?

तब कविता बोली - जब रामखिलावन ने देखा, तब ये बाहर पड़े थे। मुझे तो लगता है, इनकी भी हालत गौरव भैया जैसी हो गई है। 

 डॉक्टर आया था, किंतु शरीर में कुछ होता तो वह बताता ,उसे डर भी था, यह इस परिवार की दूसरी मौत है। कैसे, किस मुंह से कहे ? अब यह जिंदा नहीं है। तब बोला -क्या आप में से कोई जानता है ,इन्हें क्या हुआ था ?

 हमें पता होता, तो तुरंत अस्पताल ले जाते , रामखिलावन ने सुबह देखा था, कि ये बाहर पड़े हुए थे , आप देखिए !क्या किसी जहरीले कीट ने तो नहीं काट लिया है ,वहां बैठी एक महिला बोली। 

 डॉक्टर पुनीत के शरीर की जांच कर रहा था और बोला -लगता तो नहीं है ,इन्हें ऐसे किसी जहरीले कीड़े ने काटा है , अगर वह जहरीला होता तो इनके मुंह से झाग निकल रहा होता। इनकी हालत तो देखकर तो लगता है, जैसे इनके भाई की हालत हुई थी, वैसे ही इनकी हालत हुई भी है। डॉक्टर के  ये शब्द दमयंती के कानों में भी पड़े, उसकी पलकें एक पल के लिए झपकी। किंतु अभी भी वह अपने बेटे के सदमे से बाहर नहीं थी।

 धीरे-धीरे रिश्तेदार आ रहे थे , सुमित भी आ गया था किंतु अब सुमित की आंखों में वह अपनापन नहीं था। तब उसने पूछा -क्या गर्वित भाई को बुला लिया ? 

अब जगत सिंह बोले -उसका पता तो चले, वह कहां पर है ?

 कुछ देर पश्चात, टेलीविजन पर एक  सूचना प्रसारित हो रही थी। जाने -माने' ठाकुर अमर प्रताप सिंह के खानदान' को न जाने क्या हो रहा है ? लगता है ,उनकी हवेली में 'मौत तांडव 'कर रही है। अभी कुछ दिनों पहले एक बेटे की मौत को ज्यादा समय नहीं हुआ और अब यह दूसरी मौत है। कहा जाता है, इस हवेली को जिन्दा रखने के लिए, ठाकुर खानदान की कुछ रस्में हैं जो घर परिवार के लोग ही निभाते हैं किंतु अब तो लगता है ,जैसे किसी की नजर ही लग गई है। इस परिवार के लोग एकाएक न जाने कैसे ? इस दुनिया को अलविदा कह कर जा रहे हैं। क्या  यह किसी की साजिश हो सकती है ? या फिर किसी का श्राप ! 

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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