Mysterious nights [part 166]

रात्रि के अँधेरे का लाभ उठाकर ,कोई रूही के कमरे में प्रवेश करता है। जब तक रूही को पता चलता है ,कोई उसके कमरे में है।  तब तक अँधेरे के उस इंसान ने ,उस पर काबू पा लिया ,उसके दोनों हाथ किसी चीज से बांध दिए थे , रूही बोली -तुम कौन हो ? मुझे इस तरह से क्यों बांधा है ?अभी तक वह सोच रही थी ,हवेली में कोई चोर घुस आया है। क्या तुम जानते नहीं ,मैं इस घर की बहु हूँ ? तुम जो कोई भी हो ,मुझे खोल दो ! वरना अच्छा नहीं होगा ,मैं शोर मचा दूंगी। 

उसके इतना कहते ही ,वो बोला -ये मेरा अधिकार है ,तुम शोर नहीं मचा सकती ,यदि तुमने शोर मचाया तो मैं तुम्हारे मुँह को भी बंद कर सकता हूँ।


 रूही उस आवाज को पहचानने का प्रयास कर रही थी ,तब वो बोली - तुम क्या तुम 'पुनीत' हो ?उसने कोई जबाब नहीं दिया और उसके हाथ रूही के तन पर रेंगने  लगे छोड़ दो, मुझे ! यदि तुमने मेरे साथ कुछ भी किया तुम बचोगे नहीं ,रूही ने धमकी दी। 

तुमने ही कौन सा अच्छा कार्य किया है ?मेरे भाई को अपने नज़दीक नहीं आने दिया ,तुम अपने को क्या समझती हो ? मेरे भाइयों में झगड़ा करवा दिया ,तुम क्या समझती हो ?मैं कुछ समझता नहीं हूँ किन्तु अब मैं तुम्हें समझ गया हूँ। मेरी माँ से कहती हो -अब ये बंधन टूट गया। तुम हमारे रीति -रिवाज़ तोड़ने  यहाँ आई हो। जिससे तुमने प्यार का नाटक किया तुम उसी की होकर न रह सकीं, कहते हुए उसके सम्पूर्ण कपड़े उसके बदन से उतार फेंके। 

अब रूही को क्रोध आ गया और वो चीख़ते हुए बोली - मैं' शिखा' नहीं हूँ , जो सब बर्दाश्त कर जाउंगी ,इसका परिणाम तुझे भुगतना होगा ,गौरव को उसके किये का दंड मिल चुका है ,अब तुझे भी नहीं छोडूंगी। वह जोर से दहाडी किन्तु उसके हाथ बंधे हुए थे। पुनीत के कानों में उसके शब्द किसी पिघले हुए शीशे की तरह उतरते चले गए। पहले उसने रूही की आवाज को बंद करने के लिए तुरंत ही, उसका मुँह बंद करना चाहा ,किन्तु रूही ने उसके हाथ में काट लिया। वह छटपटाया, किन्तु दूसरी बार उसने उसके मुँह को कसकर दबाया और पूछा  -तू कौन है ?

 मुँह बंद में ही रूही उउउउउउ करके आवाज कर रही थी ,

मैं अब धीरे से हाथ हटा रहा हूँ ,इसीलिए जो कुछ भी मैं पूछूं ,मुझे जबाब देना ,समझी !कहकर उसने हाथ हटा दिया। तब वो बोली -तेरी मौत ! अपनी मौत का दीदार नहीं करोगे। 

तब पुनीत ने अँधेरे में, ढूंढते हुए रौशनी की ,उसे लग रहा था ,प्रकाश में अपने को इस अवस्था में देखकर ,ये अपने को देखकर ,शर्म से पानी ,पानी हो जाएगी। तब पुनीत ने पूछा - ले, कर लिए दीदार !अब बता ! तू शिखा को कैसे जानती है ?कहते हुए जैसे ही उसकी नजर रूही की नग्न जांघों पर गयी ,वो बुरी तरह घबरा गया। वो उस निशान को जानता था।

 कुछ याद आया, रूही मुस्कुराई।

 क्या तुम.... कहकर उसने पास रखा पानी पीया। 

पहचान गए ,अब इस हवेली में मौत नाच रही है ,तुम एक- एक कर सभी जाओगे !

तुम जिन्दा कैसे बचीं ?पुनीत ने पूछा। उसे तो विश्वास ही नहीं था कि शिखा जिन्दा भी हो सकती है और अब ये दूसरे रूप में ,हमारी मौत  बनकर आई है। अब वह समझने का प्रयास करने लगा -हो सकता है ,इसने ही जानबूझकर दोनों भाइयों में झगड़ा करवाया ,ये भी हो सकता है ,इसने ही गौरव भइया को मारा हो। यह सोचकर वो उसके करीब आया और बोला -नागिन !अब तू हमारे घर में ,अब दूसरे रूप में आई है। मेरे दो भाइयों को डस गयी। तुझे छोडूंगा नहीं ,कहते हुए उसके करीब आया।रूही के बदन पर वस्त्र नहीं थे ,रूही उसी हालत में अपने हाथों को खोलने का बार-बार प्रयास कर रही थी किन्तु अब पुनीत को उसके तन से घृणा हो रही थी। वह जानना चाहता था ,इसने गौरव को कैसे मारा ?

तब रूही बोली -पहले मेरे हाथ खोलो !वरना जीवन भर खोजते रहना, आखिर मेरे ह्रष्ट -पुष्ट भाई के साथ क्या हुआ था ?

तुम्हारा ये रूप कैसे ??? पुनीत को कुछ भी समझ नहीं आ रहा था। क्या भाई को पता है ?ये रूही नहीं शिखा है ,अनेक प्रश्न कुलबुलाने लगे। यही ये सब बताएगी। अभी तक तो पुनीत यही सोचकर उसके कमरे में आया था कि उसने हमारी रस्मों को मानने से कैसे इंकार किया ? मेरे भाई में क्या कमी थी ,जो इसने उसे हवेली से बाहर जाने पर मजबूर कर दिया ,ऐसा क्या हुआ था ? यही सब बातें उसके मन में घूम रही थीं और उनका बदला लेने के लिए उसने यह कदम उठाया था। किन्तु उसे क्या मालूम था ,यहाँ आकर उसे इतनी बड़ी सच्चाई से सामना करना पड़ जायेगा। ये बदले की भावना से इस घर में आई है। ये चुड़ैल है ,इसने मेरे दो भाइयों को मार दिया। अचानक ही उसका' खून खौल उठा' और पूछा  -बता ! तूने मेरे भाइयों के साथ क्या किया ?

मेरे हाथ खोल !पहले कपड़े पहनने दे !जो तूने अपनी हवस पूरी करने के लिए उतारे थे। तू समझता है ,अब यहाँ मैं अपनी इज्जत की ख़ातिर तुझसे भीख़ मांगूंगी। वो इज्ज़त जो तुम सबने मिलकर कब की तार -तार कर दी ,वो बची ही कहाँ थी ? तुम लोगों के लिए तो मैं मर चुकी हूँ ,जिसे तुम लोग ठीक से जला भी नहीं पाए ,वही तन अभी भी सुलग रहा है , तुमसे बदले की भावना में ,इस हवेली के सर्वनाश की उम्मीद में..... पुनीत उसके हाथ खोल रहा था। तभी रूही के मुख से हवेली के सर्वनाश की बात सुन ,पुनीत ने उसे एक जोरदार थप्पड़ लगाया। 

रूही ने उसे घूरकर देखा ,उसकी स्वाँसे गहरी हो चली थीं ,क्रोध से और दर्द से उसकी आँखों में पानी आ गया। उसने अपने कपड़े पहने। 

अब बता !तूने मेरे भाई के साथ क्या किया ?रूही मुस्कुराई और बोली -इतनी भी जल्दी क्या है ?आराम से बैठते हैं ,कहते हुए उसने पानी पीया और उसकी तरफ भी एक गिलास पानी आगे बढ़ा दिया। 

नहीं, मुझे इसकी कोई आवश्यकता नहीं है ,गुस्से से बोला। 

पड़ेगी !कहकर मुस्कुराई और पानी उसके सामने रख दिया ,तब बोली -तुम्हारे उस भाई से शिखा रोज मिलने आती थी। वो मूर्ख ! ये जानता ही नहीं था ,मैं ही शिखा हूँ ,उसे लगता मेरे अंदर शिखा का भूत आया है। मैंने उसकी सच्चाई से, उसका सामना करवाया था ,उसे लगता -मैं ,मैं नहीं ,मेरे अंदर शिखा का भूत है ,उसका साहस ही नहीं होता था कि वो सच्चाई का सामना कर सके। उसे स्वतः ही मेरे क़रीब आने में डर लगने लगा। भोली सी बनकर बोली -मैंने कभी उसे अपने क़रीब आने से इंकार ही नहीं किया किन्तु 'शिखा का भूत 'उसे आगे बढ़ने ही नहीं देता था ,उसने उसे कमज़ोर बना दिया था ,कहकर जोर -जोर से हंसने लगी किन्तु तुम्हारी दाद देनी पड़ेगी। तुम शिखा का नाम सुनकर डरे नहीं ...... 


laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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