मम्मी, गर्वित को न जाने क्या हो गया है ? न जाने, कहां घूमने चला गया है ? उसे, रूही के साथ नहीं रहना था तो उसने, इससे विवाह क्यों किया ? दमयंती चुपचाप उसकी बातें सुन रही थी। तब वह बोला -आपने उस लड़की से बात की या नहीं, इस तरह तो यह हमारे घर को बर्बाद कर देगी। दोनों भाइयों में झगड़ा करवा दिया और अब गौरव हमारे साथ ही नहीं बल्कि इस दुनिया में ही नहीं रहा। मुझे तो लगता है ,इसी ने ही कुछ किया है। आपने देखा नहीं, इसके आते ही, भाई की क्या हालत हो गयी है ?
जिस गर्वित और गौरव के सामने हर किसी का बोलने तक का साहस नहीं होता था, उनके सामने नजर उठाकर भी बात नहीं कर सकते थे ,इसने आकर उनकी जोड़ी को तुड़वा दिया। अब एक तो इस दुनिया में ही नहीं रहा और दूसरा गर्वित भाई भी यहां नहीं है ,वो भी हवेली छोड़कर चला गया,न जाने कहाँ गया है ?हमें ये भी मालूम नहीं है। ये क्या हो रहा है ? सुमित भी आजकल घर में कम ही नजर आता है, न जाने कहां खोया रहता है ?
पुनीत की बातें सुनकर दमयंती को भी लग रहा था- न जाने, मेरे घर को किसकी नजर लग गई है ? जिस हवेली में इतनी रौनक रहती थी ,वो न जाने कहाँ लुप्त होती जा रही है ? हवेली की दीवारें धीरे -धीरे झर रही हैं। ऐसा लग रहा है ,इसकी नींव कमज़ोर पड़ती जा रही है। इसकी दीवारें दरकने लगीं है। कोई दरार तो है जो बढ़ती जा रही है। कभी ,इस हवेली को देखकर लगता था ,ये जिन्दा है ,इधर -उधर घूमते लोग ,नौकर -चाकर काम करते हुए, इधर -उधर घूमते नजर आते थे।
हमारे मन में उत्साह था कि हमारे बच्चों की संतानें इस हवेली के आंगन में खेलेंगीं लेकिन अभी तो कोई भी उम्मीद नजर नहीं आ रही।अब लगता है ,जैसे हवेली धीरे -धीरे मर रही है ,क्या इसका अंतिम समय आ रहा है ?ठाकुर अमर प्रताप सिंह की हवेली बिखरती नजर आ रही थी। अचानक ही दमयंती को लगा, जैसे वो हवेली खंडहर होती जा रही है, वो ये सब देख ,सोचकर घबरा गयीं ।
मेरे बच्चे ही न जाने कैसे, मुझसे बिछुड़ते जा रहे हैं ? पांच होने के बावजूद भी, चार रह गए और अब चार से तीन ही रह गए हैं और उनकी भी आगे बढ़ने की कोई उम्मीद नजर नहीं आ रही। तब वह बोली -मैंने इस नई बहू से बात तो की है किंतु यह भी मुझे, आसानी से मानती नजर नहीं आ रही। इसमें कुछ तो ऐसा है ,जो सही नहीं है।
क्यों ? इसने ऐसा क्या कह दिया ? पुनीत ने तुनकते हुए पूछा।
जब मैंने उसको, इस हवेली की रस्मों के विषय में बताया और उसे सम्पूर्ण जानकारी दी।
तब वो क्या बोली ?आराम से वहीँ कुर्सी पर बैठकर पुनीत ने पूछा।
तब वो कह रही थी -कि अब तो कोई बंधन रहा ही नहीं, यह बंधन तो स्वतः ही टूट गया। न जाने मन में क्या लिए हुए हैं ? हमें गर्वित ने भी कुछ नहीं बताया, कितने दिनों के लिए और कब तक के लिए गया है ? कल मैं उन साधु को ढूंढते हुए ,वहां जाऊंगी और उनसे पूछूंगी। क्या इस तरह यह बंधन टूट गया ? अब हम आमजन की तरह रह सकते हैं या नहीं।
अगले दिन दमयंती हवेली के इस गुप्त द्वार के माध्यम से, उस साधु को ढूंढते हुए ,मंदिर की तरफ जाती है। अब तक यह कार्य सुनयना जी का ही था और अब यह कार्य दमयंती को मजबूरी में करना पड़ रहा था। उसे अपने परिवार में कोई हंसी-खुशी नजर नहीं आ रही थी , ना ही कोई आगे बढ़ने की उम्मीद नजर आ रही थी।घर में नई दुल्हन आई है किन्तु लगता है ,जैसे हवेली ख़ामोश हो गयी है। सब कुछ होते हुए भी, सब कुछ नीरस लग रहा है।
उसने अनेक साधु- महात्माओं से बात की, कि क्या कोई ऐसे महात्मा को जानता है ,जो तांत्रिक क्रिया भी करते हैं। कई जगह धक्के खाने के पश्चात एक व्यक्ति ने बताया - अब वो बाबा तो हिमाचल ध्यान करने गए हैं किन्तु उनकी सिद्धियों का प्रताप आज भी है ,उनकी गद्दी को उनके चेले' रामवतार' ने संभाला है।
तब तो आप मुझे उनका वह स्थान बता दीजिये ,जहाँ वो रहते हैं ,मैं बहुत बड़ी विपदा में हूँ।
आपकी बात तो ठीक है किन्तु आज वो यहां नहीं हैं ,कल आयेंगे।
आप, कल आइयेगा ,वो जो सामने ताल है ,इस ताल के पीछे जो पेड़ों के झुरमुट में झोंपड़ी बनी हुई है ,वहीं पर आएंगे।
पक्का, वो कल आ जायेंगे।
हाँ ,कल अवश्य ही आएंगे ,कल' एकादशी' जो है ,वहीं पूजा -पाठ करेंगे।
ठीक है ,मैं कल आ जाउंगी ,कहते हुए दमयंती ने अपने सिर का पल्लू ठीक किया और अपना चेहरा छुपाते हुए उसी गुप्त द्वार से हवेली के अंदर आ गयी।
अर्ध रात्रि थी ,हवेली में परेशान सी दमयंती अभी जाकर ठीक से सो पाई थी। उसके चारों कमरे,जिनमें उसके जीवन की नई शुरुआत हुई थी।किन्तु अब सूने पड़े हैं। अब उसने, उनमें अपने बच्चों के लिए सपने सजाये थे किन्तु उसका घर तो उसे बिखरता सा प्रतीत होता है। उसके पति, चारों भाई मिलकर, अपने कारोबार को संभालने का प्रयास कर रहे हैं ,अब उम्र भी तो बढ़ती जा रही है। उम्र के इस पड़ाव पर ,भरी जवानी में दो -दो औलादें ,नजरों के सामने से चलीं गयीं। इस बात का दुःख तो है किन्तु वे तो पुरुष हैं। क्या उन्हें दर्द नहीं होता ?परिवार को उजड़ते देखकर भी धैर्य बनाये रखना जानते हैं।
ताकि अब जो है ,वो आगे न बिखरे !एक होटल की देखरेख में रहता है। दूसरा खेतों की और निकल जाता है। उन्हें लगता है ,हमसे ज्यादा तो बच्चे न जाने कितने अनजाने दुखों का सामना कर रहे हैं ? किन्तु उनके अंदर भी दर्द समाया है ,अपने जवान बच्चों की मौत देखी है। अब हवेली में प्रवेश करने का मन ही नहीं करता। सुमित भी अपने पिता के साथ होटल में ही था क्योंकि उसे कल किसी से मिलने जो जाना था। घर में पुनीत ही था।
अर्ध रात्रि में अचानक रूही की आँख खुली ,अँधेरे में उसे एहसास हुआ जैसे कि कोई उसके समीप है ,उसने हाथ से अपने भ्र्म को विश्वास में बदलना चाहा और वह चिहुँक उठी ,सच में कोई तो था जो उसके करीब लेटा था,वो उठकर बैठने का प्रयास करती है ,किन्तु तभी किसी की मजबूत बांहों ने उसे जकड़ लिया। वो बोली -गर्वित !!!क्या तुम हो ?उसे कोई जबाब नहीं मिला ,किसी की गर्म सांसें उसके बेहद करीब थीं। तभी उसने जोर से बोलना चाहा, उससे पहले ही उसके मुँह पर हाथ रखकर उसकी आवाज बंद कर दी गयी। वो छटपटाई ,और पूरी ताकत से उस व्यक्ति से अपने आपको छुड़ाने का प्रयास करने लगी।
