कुमार बाहर जाने के लिए तैयार हो रहा था ,तभी उससे मधुलिका ने पूछा -कहाँ जा रहे हैं ?और जब कुमार ने बताया कि वो काम के सिलसिले में ,'आगरा 'जा रहा है। तभी मधुलिका कह उठी -मुझे भी जाना है ,बहुत दिन हो गए ,मैं भी कहीं घूमने नहीं गयी।
आज तक तो मधुलिका ने उससे ऐसा कभी नहीं कहा था ,कि वह उसके साथ जाएगी किन्तु आज अचानक उसके इस तरह कहने पर कुमार झुंझला गया ,उसे लगा ,'कहीं इसे मुझ पर शक तो नहीं हो गया। 'तब सहजता से बोला - यह क्या बचपना है? मैं वहां मीटिंग में जाऊंगा , कोई मस्ती करने या घूमने नहीं जा रहा हूं।
मैं भी कोई'' दूध पीती बच्ची नहीं हूं'', जो तुम्हारे पीछे-पीछे घूमूँगी। तुम अपनी मीटिंग में चले जाना और मैं अपने बेटे को साथ लेकर, वहां शहर में घूम आऊंगी।तुमने तो अपनी तरफ से कभी नहीं कहा ,चलो !तुम्हें कहीं घुमा लाता हूँ क्योंकि तुम्हारे घर की सारी जिम्मेदारियां मुझ पर ही तो थीं। पापा -मम्मी का ख़्याल रखना ,उन्हें समय पर दवाई देना ,बच्चे को पालना और अब पढ़ाना।
मम्मी नहीं हैं ,पापा तो हैं ,उनका ख्याल कौन रखेगा ? पापा अब ठीक हैं ,मैं तुम्हारी तरह लापरवाह नहीं ,मैं उनका इंतज़ाम करके जाउंगी। कुमार उसे चुपचाप खड़ा देख रहा था ,अब इससे क्या बहाना बनाऊं ? क्या सोच रहे हो , विदेश नहीं जा रही हूं , ताना मारते हुए बोली। मैंने कौन सा तुम्हें रोका हुआ है , तुम अपना काम करना और मैं, मंकू के साथ घूम लूंगी। अब तो आपको कोई परेशानी नहीं होनी चाहिए ,कहते हुए वह फुर्ती से बाहर निकल गयी।
अब कुमार, मधुलिका से क्या कहे ? कि वह किसी मीटिंग में नहीं जा रहा बल्कि उसका कोई व्यवसायिक कार्य है ही नहीं वरन एक' कला प्रदर्शनी' में जा रहा है , या फिर अपनी दोस्त से मिलने जा रहा है जिससे वह, मधुलिका से छुप-छुप कर मिलता है।मन ही मन सोच रहा था -वैसे इसे आजतक बाहर लेकर मैं कितनी बार गया हूँगा ? अपनी जगह इसकी बात भी सही है ,मैंने भी कभी इससे न ही पूछा ,न ही कहा -चलो !आज कहीं घूम आते हैं। आज ये स्वयं अपने मुँह से कह रही है ,यदि आज इसे नहीं ले गया ,तो अभी तक तो इसे मुझ पर शक़ नहीं है किन्तु अब हो जायेगा ,इस ड़र के कारण वह मधुलिका को साथ ले जाने के लिए तैयार हो जाता है।
कुमार को गुस्सा तो बहुत आया, किंतु अपने पर नियंत्रण किया और समझदारी से काम लेते हुए बोला - अब तुम जाना ही चाहती हो, तो चलो ! शीघ्र ही तैयार हो जाओ ! मैं तुम्हें 'ताजमहल 'के सामने छोड़ दूंगा और तुम, अपनी बेटे को लेकर वहां पर घूम लेना, और लौटते हुए तुम्हें लेकर वापस आ जाऊंगा।
तुम्हारी मीटिंग कब तक है ?सारा दिन तो नहीं होगी ,समय मिले तो शीघ्र ही आ जाना ,सभी साथ घूमेंगे।
कुमार ,मधुलिका को ध्यान से देख रहा था ,आज तक तो इसने इस तरह कभी कुछ नहीं कहा न ही पूछा किन्तु आज मुझे बहुत समझा रही है ,मुझे क्या करना है ,क्या नहीं ?कितनी देर मीटिंग है ?देखने -सुनने में यह सामान्य सी बातें थीं , ज्यादातर परिवारों में इस तरह की शिकायतें अक़्सर पति -पत्नी में चलती ही रहती है।
यह ज़्यादातर भारतीय महिला की विडंबना भी है। विवाह से पहले लड़की को इसीलिए घूमने नहीं देते कि अभी वह कुंवारी है, स्यानी लड़की इस तरह बाहर नहीं घूमती, विवाह के पश्चात कुछ भी करना और कहीं भी घूमने जाना, अक्सर मांओं का यही विचार रहा है और बेटियों से यही कहती हैं ,और जब विवाह हो जाता है, तब वह ससुराल की होकर रह जाती हैं, जहां सास- ससुर की सेवा, ननद हो या देवर के कार्य, उनके विवाह करवाना ,उनमें शामिल होना, स्वयं मातृत्व सुख के लिए ,माँ बनकर उस घर के वंश को आगे बढ़ाना, बच्चे पालना उन्हें पढ़ाना, यही एक औरत का कार्य रह जाता है।
इस सब में वह इतनी व्यस्त हो जाती है, कि अपने लिए समय ही नहीं निकाल पाती है और कभी-कभी उसे लगता है , उसने अपने आप को समझने में, आगे बढ़ने में बहुत देर कर दी। कई बार, कुछ चीजें हाथ से भी निकल जाती हैं , जैसे मधुलिका को महसूस हो रहा था कि शायद कुमार अब और कहीं भटकने लगा है। इतना सब करने के बावजूद भी, उसे क्या मिलता है -बेवफाई, धोखा अथवा षड्यंत्र !
जिसके साथ वह विवाह करके उस घर में आती है और अपनी नई जिंदगी की शुरुआत करती है, वही भूल जाता है कि वह तेरी' अर्धांगिनी' है,तेरी आधी खुशियों पर उसका भी अधिकार है ,वह उसके दर्द तो बांटती है किन्तु सुख में कितनी भागीदारी है ?यह तो वहां रहने वालों के व्यवहार पर और उसके जीवन साथी पर निर्भर करता है।
इसका भी जीवन है, इसकी भी कुछ इच्छाएं होगीं। जिन्हें वह तेरे परिवार के लिए नजरअंदाज करके जीवन में आगे बढ़ रही है। कुछ लोग, इस बात का महत्व समझते हैं किंतु कुछ लापरवाह होते हैं , उन्हें उसके जीवन का मूल्य समझ ही नहीं आता कि उसने तुम्हारे साथ जुड़कर, कितना बड़ा त्याग किया है ? कम से कम वह जीवन में उसके साथ खड़ा तो हो सकता है। इसी तरह से कुमार भी, मधुलिका से विवाह करके जैसे भूल ही गया था कि उसने मधुलिका के साथ प्रेम विवाह किया था। उसकी भी कुछ इच्छाएँ थीं , जिनको वह उसके परिवार के लिए नजरअंदाज करके उसके साथ जीवन में आगे बढ़ना चाहती थी।
जीवन में ,जो चीज हमें सरलता से मिल जाती है, हम उसका महत्व ही भूल जाते हैं। ' किंतु अब मधुलिका को लगता है, कि अब उसे अपने जीवन को संवारना होगा कहीं उसका जीवन उसकी लापरवाही से बिखर तो नहीं रहा है। वह दिखलाना नहीं चाहती थी, कि उसे कुमार पर शक है, वरना वह सतर्क हो जाता किंतु अब उस पर वह नजर भी रखना चाहती थी इसलिए उसके साथ जा रही थी। कई बार गलतफ़हमी भी हो जाती है ,यही सोचकर कुमार से पूछकर वो अपने रिश्ते की ड़ोर को कमज़ोर नहीं करना चाहती थी। यह रिश्ता वो मोती है ,एक बार उस माला से टूटकर गिर गया ,तो शायद मिल भी नहीं पायेगा।
हां यह सही रहेगा, मधुलिका ने ही जवाब दिया, देखा जाए तो मधुलिका भी चाहती थी कुछ तो पता चले आखिर कुमार किस मीटिंग में जाता है, किससे मिलता है ? मधुलिका के मन में शक तो आ गया था फिर भी उसने कुमार को दर्शाया नहीं था कि उसे, कुमार पर शक हो गया है। वह चुपचाप अपने बेटे को घुमाने का बहाना करके कुमार के संग आगरा के लिए आ ही गयी। रास्ते में उसने कला प्रतियोगिता के कई बैनर देखें। अब तो उसका शक यकीन में बदल रहा था, यह अवश्य ही इस प्रदर्शनी को देखने के लिए आया है या फिर उस प्रदर्शनी वाली से मिलने ... उसने उस प्रदर्शनी का स्थान और समय अपने मन में बैठा लिया। कुमार अपने कहे अनुसार, उन्हें ताजमहल में छोड़कर, वहां से निकल गया। उसके निकलते ही, मधुलिका ने चुपचाप उसका पीछा किया।
कुमार जिस स्थान पर जा रहा था, वह वही स्थान था , किंतु अभी तो प्रदर्शनी का समय भी नहीं हुआ था। फोन पर बात करते-करते अचानक ही, कुमार न जाने कहां गायब हो गया ?
