जब यूसुफ मियां , अपने घर वापस लौट कर आए तो सलमा उनका बेक़रारी से इंतजार करती हुई दिखलाई दी। उनके आते ही ,उसने पूछा -उन्होंने क्या कहा ? क्या कुछ बात बनी ? आपके भाई जान मान गए। ,उन्होंने क्या जबाब दिया ? तजस्सुस इतनी थी, कि उसने यूसुफ़ साहब के चेहरे पर ध्यान ही नहीं दिया।वो चाहती थी ,यूसूफ साहब आते ही ,उसे वहाँ का सारा क़िस्सा विस्तार से सुनाएँ।
बेग़म ! अंदर चलो !आराम से बैठकर बातें करते हैं। पहले हमारे लिए भोजन परोस दो !बड़ी भूख भी लगी है।
अरे हाँ ! मैं तो भूल ही गई ,आप तो भूखे पेट ही घर से निकले थे। चलो ! खाना परोसते हुए बात करते हैं। तब सलमा ने खाना परोसने के लिए कहकर बाहर आ गयी और बोली -आप अपने भाईजान के यहाँ गए थे। उन्होंने कुछ तो ख़ातिरदारी की होगी या नहीं। मन ही मन सोचा ,यदि ख़ातिरदारी की होती तो ये इस तरह भूख लगी है ,न कहते किन्तु ऐसे ख़्यालात !वो अभी मन में नहीं लाना चाहती थी इसलिए अपने आप ही बोली - अच्छा अभी ये सब छोड़िये ! पहले ये बताइये !आपने उनके सामने अपनी बात रक्खी या नहीं।
इसीलिए तो गया था ,किन्तु उनके तेवर कुछ ठीक नहीं लग रहे हैं। उनके सामने अपनी बात तो रखी है किन्तु सही से जबाब नहीं दिया ,परेशानी से बोले -उनकी आवाज़ में फ़िक्र थी।
क्या कह रहे थे ? आपके भाई जान !
मेरी बात सुनकर पहले तो शांत रहे, फिर बोले -घर में बात करके आपको बताता हूं , अभी तो अपनी बेगम से और अपने बेटे खालिद से भी बात करेंगे।
आपको क्या लगता है ? वो इस रिश्ते को मना तो नहीं करेंगे।
देखिए ! बेगम हम कुछ कह नहीं सकते, हमारे मना करने से उन पर असर तो हुआ है, अब उनकी बेगम और खालिद क्या कहता है ? वो उनसे बात करेंगे, तब पता चलेगा।
कब बात करेंगे ? उन्होंने कब जवाब देने के लिए कहा है ?
बेगम ! इतनी जल्दबाजी मत दिखाओ ! यदि हम लोग,उन्हें इतनी जल्दबाजी दिखाएंगे तो उन्हें हम पर शक भी हो सकता है, तसल्ली से काम को होने दो ! वो तो सीधे रिश्ता लेकर हमारे घर आये थे। पहले हमने ही सामने से, रिश्ते को मना कर दिया था।
अब उसके बाद, हम अपने आप ही उनसे रिश्ता करने के लिए जा रहे हैं तो उनके व्यवहार में थोड़ा बदलाव तो आएगा ही.... यूसुफ़ साहब ,को यह बात रह -रहकर सता रही थी कि उनके अपने भाई ने ,उनसे चाय -पानी के लिए भी नहीं पूछा ,मुझसे झूठ बोला कि ज़ोया घर पर नहीं है। तब वे सलमा से बोले -ज़ोया तो घर पर ही थी , अंदर से उसने आवाज लगाई थी ,तब मुझे पता चला कि वो तो घर में ही है। भाईजान ने एक कप चाय के लिए भी नहीं पूछा नाश्ता करने की बात तो दूर थी। हमने ,उनसे रिश्ते के लिए मना किया था किंतु भाई के रिश्ते के नाते उन्हें, हमने अच्छे से नाश्ता कराया था।
युसूफ मियां की बातें सुनकर सलमा थोड़ी उदास हो गई ,उसे एक उम्मीद जगी थी ,उसकी ख्वाहिश थी कि पता तो चले ,वो क्या चाहते हैं ? क्या वो, अपने बेटे से ज़ीनत के रिश्ते के लिए तैयार हैं ? तो उसके दिल को खुशी होती,थोड़ा सुकून मिलता किंतु युसूफ मियां के ऐसे जवाब सुनकर अपने मन को तसल्ली दे रही थी। थोड़ा इंतजार करते हैं।
अंदर ही अंदर उसके ज़हन में एक आवाज़ उठ रही थी कि कहीं वो, इस रिश्ते से इंकार न कर दें। यदि उन्होंने इस रिश्ते से इंकार कर दिया ,तो क्या होगा? यही सोच कर वह काँप उठी थी। यदि उन्होंने भी इस रिश्ते के लिए मना कर दिया तो फिर जीनत का रिश्ता किससे होगा ? कौन इससे शादी करेगा ? तब तक तो रिश्तेदारों में भी बात फैल जाएगी, कि जीनत का रिश्ता टूट गया। मन में खुशी की एक लहर उठी थी तुरंत ही शांत भी हो गई , और अब मन में घबराहट के रूप में बदल गई थी।
कौन कहता है ?सुंदर होना बुरा नहीं है ,यदि इस सुंदरता पर कलंक लग जाये तो यही सुंदरता बदनुमा दाग़ लगने लगती है। वैसे इस बेचारी का भी क्या दोष ?इसे तो मालूम ही नहीं चला ,इसकी ज़िंदगी में कौन कालिख़ पोत गया। सुंदरता और यौवन तो कुदरत ने जी भरकर दिया है किन्तु लगता है क़िस्मत से मात खा गयी है।
युसूफ मियां ने खाना खाया और अपने कारोबार के लिए चले गए , उनके दोनों बच्चे पढ़ रहे थे और कारोबार पर भी, ध्यान दे रहे थे।
शाम को जब खालिद घर पर आया, आते ही उसने पूछा -अम्मी ! चचाजान सुबह -सुबह हमारे घर क्यों आए थे ?
मुझे नहीं मालूम, तेरे अब्बू से बात की और बाहर से बाहर ही चले गए। थोड़ी देर में , तेरे अब्बू आते ही होंगे उनसे ही पूछ लेना, क्या हुआ था क्योंकि उन्होंने मुझे तो कुछ बात बताई ही नहीं।
कहीं ऐसा तो नहीं ज़ीनत का रिश्ता टूट गया हो, खालिद ने अपने मन की बात रखी। उसे उम्मीद थी ,कि अम्मी एक बार कह दे ! ज़ीनत का निक़ाह अब नहीं हो रहा है ,इस बात को सोचकर ही उसके दिल की हसरतें करवट बदलने लगीं। मन को जैसे सुकून मिलेगा।
उसका रिश्ता टूटा हो या जुडा हो, हमें इससे क्या ? मुँह बनाते हुए जोया ने कहा।
अम्मी कुछ तो हुआ है , तभी चचाजान यहां पहुंच गए।
ज़ीनत का रिश्ता तो अहमद से तय हुआ था ,हो सकता है ,निक़ाह की तारीख़ तय हो गयी हो,इसीलिए निक़ाह में शरीक़ होने के लिए बुलाने आएं हों।
ज़ोया अभी इस विषय में नहीं जानती थी कि खालिद भी ज़ीनत को पसंद करने लगा था और वालिद साहब , ज़ीनत के लिए खालिद का रिश्ता लेकर गए थे।
कुछ देर बाद ही, वाहिद साहब घर में आते हैं, और पूछते हैं -दोनों में क्या बातें हो रही हैं ?
कुछ नहीं अब्बू ! मैं अम्मी से पूछ रहा था सुबह चचाजान किस लिए आए थे ? खालिद ने साफ-साफ शब्दों में अपने दिल की बात उनसे पूछ ही ली।
वाहिद मुस्कुराए और बोले - ज़ीनत का रिश्ता टूट गया है। यूसुफ़ तो यही कह रहा है कि रिश्ता हमने तोड़ा है किंतु मुझे लगता है, बात कुछ और ही है।
उनकी बात सुनकर खालिद के चेहरे पर मुस्कुराहट आई और बोला मैंने कहा था न.... यह रिश्ता नहीं होगा।
तूने तो कुछ नहीं किया है, उन्हें उस पर थोड़ा शक़ हुआ।
मुझ पर शक करने की जरूरत नहीं है,अब्बू ! जब रुकैया फूफी जान यहां पूछताछ करने के लिए आई थीं तभी मुझे लगा था कि जरूर बात कुछ और है और मैंने भी कह दिया था -जीनत का चाल -चलन ठीक नहीं है, सारा दिन बाजार में मटरगश्ती करती घूमती है।
यह तूने सही नहीं किया, इस पर नाराज होते हुए वाहिद साहब बोले।
तभी जोया बोली -इसने जो किया ठीक ही किया, सलमा के ''पांव तो जैसे जमीन पर ही नहीं पड़ रहे थे ,क्योंकि उसकी ज़ीनत के लिए एक डॉक्टर का रिश्ता आया है। अब जमीन पर कदम रखेगी तो उसे पता चलेगा कि जमीन कितनी पथरीली है ?
मैं सोच रहा था, अपने खालिद से जीनत का रिश्ता करवा देते हैं।
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