Aaj ka satsang [part 4]

                                                                              “समर्पण भाव ''

प्रियजनों,

आज हम जिस विषय पर मनन करने जा रहे हैं, वह केवल एक भावना नहीं, बल्कि जीवन जीने की एक उच्चतम अवस्था है। वह विषय है—“समर्पण भाव”। यह शब्द सुनते ही अनेक लोगों के मन में एक भ्रांति उत्पन्न होती है—कि समर्पण शायद कमजोरी है, हार है, या स्वयं को मिटा देना है किंतु सत्य इसके ठीक विपरीत है। समर्पण भाव कमजोरी नहीं है बल्कि आत्मबल की पराकाष्ठा है।

एक ऐसा समर्पण जैसा मीरा ने कान्हा की भक्ति में किया ,एक नारी जिसका सम्पूर्ण जीवन अपने परिवार के प्रति उत्तरदायित्वों को निभाते हुए ,पूर्णतः समर्पित रहती है।तभी एक सुखी परिवार की नींव रखी जाती है।  


जहाँ अहंकार “मैं” पर टिकता है,वहीं समर्पण “हम” और “उस” की ओर ले जाता है और जहाँ समर्पण होता है, वहीं जीवन में शांति, स्पष्टता और उद्देश्य प्रकट होता है।

पहले हम ये समझेंगे, समर्पण भाव का वास्तविक अर्थ क्या है ?

समर्पण का अर्थ है—अपने अहंकार, हठ और संकीर्ण इच्छाओं को त्यागकर,किसी उच्च उद्देश्य, सत्य, कर्तव्य या ईश्वर के प्रति स्वयं को अर्पित कर देना।समर्पण पलायन नहीं है ,समर्पण जिम्मेदारी से भागना नहीं है ,समर्पण यह स्वीकार करता है कि मैं अकेला ही नहीं, मैं एक व्यवस्था का हिस्सा हूँ।जब व्यक्ति समर्पण करता है, तब वह निष्क्रिय नहीं होता—बल्कि अधिक सजग, अधिक सज्ज और अधिक सक्षम बनता है।

अहंकार कहता है—“मैं ही सब कुछ हूँ।”किन्तु समर्पण कहता है—“मैं इस व्यवस्था का एक माध्यम हूँ।”अहंकार संघर्ष को जन्म देता है, समर्पण समाधान को ढूंढता है। अहंकार व्यक्ति को अकेला करता है,समर्पण उसे व्यापक बनाता है।जहाँ अहंकार है, वहाँ भय है—क्योंकि “मैं” को खोने का डर है।जहाँ समर्पण है, वहाँ निर्भयता है—क्योंकि “मैं” किसी बड़े सत्य में विलीन हो चुका है।

मनुष्य की अधिकांश अशांति का कारण ही यह है कि वह सब कुछ अपने नियंत्रण में रखना चाहता है ,जो उसके वश में नहीं, उसे भी।

समर्पण भाव सिखलाता है—जो तुम्हारे वश में है, उसे पूरी निष्ठा से करो और जो तुम्हारे वश में नहीं है , उसे शांति से सौंप दो।यही भाव मन को हल्का करता है।यही भाव चिंता को विश्वास में बदलता है।समर्पण का अर्थ कर्म त्याग नहीं, बल्कि फल त्याग है।गीता में भी कहा गया है - 'कर्म करो !फल की इच्छा मत करो !' तात्पर्य यही है ,यदि तुम्हारा कर्म उत्तम है ,तो उसका फल स्वतः ही मीठा होगा। 

जब हम कर्म को समर्पण भाव से करते है ,तब कर्म बोझ नहीं बनता ,अपेक्षा तनाव नहीं बनती और परिणाम आत्मसम्मान को नहीं तोड़ता। समर्पित कर्म में पूर्णता होती है, परंतु आसक्ति नहीं।

जहाँ संबंधों में केवल अधिकार होता है, वहाँ टकराव होता है और जहाँ संबंधों में समर्पण भाव होता है, वहाँ समझ होती है।समर्पण का अर्थ यह नहीं कि आप स्वयं को मिटा दें,बल्कि यह कि आप संबंध को “मैं” से ऊपर रखें। माता-पिता का प्रेम, गुरु का मार्गदर्शन, नारी का परिवार और अपने पति के प्रति समर्पण, सच्ची मित्रता—ये सभी समर्पण भाव के जीवंत उदाहरण हैं।

भक्ति का मूल ही समर्पण है।भक्ति कोई अनुष्ठान नहीं, बल्कि एक आंतरिक अवस्था है।जब व्यक्ति कहता है—“जो होगा, तेरी इच्छा से होगा”—तो यह पराजय नहीं, बल्कि परम विश्वास की घोषणा है।

समर्पण भाव में व्यक्ति शिकायत नहीं करता,वह सीखता है।वह प्रश्न नहीं करता,वह स्वीकार करता है।

यह समझना अत्यंत आवश्यक है कि समर्पण कायरता नहीं है।वास्तव में, समर्पण के लिए सबसे अधिक साहस चाहिए।अहंकार को पकड़कर रखना आसान है ,उसे छोड़ना कठिन।अपने दृष्टिकोण को ही अंतिम सत्य मान लेना सरल है ,उसे व्यापक सत्य के सामने झुकाना कठिन।इसलिए समर्पण वीरों का गुण है—कमज़ोरों का नहीं।सैनिकों में अपने देश के प्रति वही 'समर्पण भाव 'उनमें 'वीरता का भाव' पैदा करता है। 

आज का युग प्रतिस्पर्धा, प्रदर्शन और तुलना का युग है ,यह युग व्यक्ति को सिखाता है—“पहले तुम।”पर समर्पण भाव सिखाता है—“पहले कर्तव्य, पहले मूल्य, पहले सत्य।”जब कार्यस्थल पर समर्पण भाव होता है,तो काम केवल नौकरी नहीं रहता—सेवा बन जाता है। जब समाज में समर्पण भाव होता है,तो अधिकार से पहले, उत्तरदायित्व आता है। आज के युग में 'समर्पण'भी सही चुनाव लेकर करना चाहिए ,जैसे कुछ लोग गुरु चुनते हैं ,सत्संगों में जाते हैं ,वे अपने गुरु के प्रति समर्पित हैं किन्तु क्या गुरु उनके समर्पण योग्य है ?अनुचित स्थान पर समर्पण भी कोई महत्व नहीं रखता है क्योकि समर्पण का वास्तविक मूल्य तो उसे भी पता नहीं होगा।इसका उदाहरण ,आज भी कुछ बाबा ,कारावास में अपना समय बिता रहे हैं।  

समर्पण का एक महत्वपूर्ण पक्ष है—स्वीकृति।स्वयं को स्वीकार करना,दूसरों को स्वीकार करना,और जीवन की अनिश्चितता को स्वीकार करना ,जो स्वीकार कर लेता है,वही आगे बढ़ जाता है ,जो स्वीकार नहीं करता,वह संघर्ष में उलझा रहता है। ये मनुष्य के अंदर निहित तो होता है ,किन्तु ये समर्पण भाव अचानक से नहीं आता; यह अभ्यास से आता है -प्रतिदिन आत्मनिरीक्षण करें,अपने अहंकार को पहचानें, उससे लड़ें नहीं,अपेक्षाओं को कम करें,कृतज्ञता का अभ्यास करें,सेवा के अवसर खोजें और परिणाम को नहीं, प्रयास को महत्व दें !समर्पण एक प्रक्रिया है—एक दिन का निर्णय नहीं। 

 समर्पण और स्वतंत्रता में विरोधाभास प्रतीत होता है, पर यह सत्य है—समर्पण से ही वास्तविक स्वतंत्रता मिलती है।जब हम अहंकार के गुलाम होते हैं,तो हम वास्तव में बंधे होते हैं और जब हम समर्पित होते हैं,तो हम भय, अपेक्षा और असुरक्षा से मुक्त हो जाते हैं।

समर्पण —एक जीवन की एक उच्चतम अवस्था है ,हमें किसी व्यक्ति विशेष के प्रति समर्पित नहीं होना है बल्कि उसके कार्यों ,उसकी भावना ,उसकी सोच, विचारों के प्रति समर्पित होना है। हम भक्ति भाव में ईश्वर के प्रति समर्पित होते हैं क्योकिं उसने हमें जीवन दिया ,सदमार्ग पर चलने के लिए राह सुझाई ,प्रतिपल वो हमें अपने संग महसूस होता है। यदि हम किसी इंसान के प्रति समर्पण भाव रखते हैं ,तो उसके विचार ही हमें हमारे इस भाव के लिए प्रेरित करते हैं ,हम स्वतः ही समर्पित हो जाते हैं फिर चाहे वो प्रेम भाव ही क्यों न हो। 

प्रियजनों,

समर्पण भाव का अर्थ जीवन से लड़ना नहीं है ,  जीवन के साथ चलना है ।यह भाव हमें झुकाता नहीं,बल्कि ऊँचा उठाता है।जहाँ समर्पण है, वहाँ द्वंद्व समाप्त हो जाता है।जहाँ समर्पण है, वहाँ शांति जन्म लेती है और जहाँ समर्पण है, वहाँ जीवन अर्थपूर्ण बन जाता है।

आइए, हम ऐसा समर्पण अपनाएँ जो हमें हमारे वास्तविक स्वरूप से जोड़ दे क्योंकि 'समर्पण भाव' ही वह द्वार है,जहाँ से अहंकार समाप्त होता है और सत्य का आरंभ होता है।'समर्पण अन्धविश्वास को जन्म नहीं देता।' 

धन्यवाद।

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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