“संयम”
प्रियजनों,
आज हम जिस विषय पर विचार करने जा रहे हैं, वह है ,'संयम 'यह न तो केवल त्याग की बात करता है और न ही केवल नियमों की। आज का विषय —“ संयम' वह शक्ति है, जो मनुष्य को बाहरी अनुशासन से ऊपर उठाकर आंतरिक अनुशासन की ओर ले जाती है। यह वह गुण है जो व्यक्ति को बाँधता नहीं, बल्कि उसे संतुलित करता है।कहने का मतलब है ,''आत्मनियंत्रण ''
'संयम 'उस व्यक्ति को बाहरी तौर पर कोई बांधता नहीं है वरन वह स्वेच्छा से अपनी इन्द्रियों और अपने मन को नियंत्रित करता है। तब वह 'संयमी 'कहलाता है। जहाँ इच्छा अंधी हो जाती है, वहाँ संयम दृष्टि देता है। जहाँ आवेग शासन करने लगता है, वहाँ संयम शासन को विवेक सौंप देता है।
आज के युग में, जहाँ “सब कुछ अभी” की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है, संयम केवल आवश्यक नहीं—अनिवार्य हो गया है।
संयम का वास्तविक अर्थ , इच्छाओं का दमन नहीं, बल्कि इच्छाओं का नियमन है।संयम जीवन से भागना नहीं, बल्कि जीवन को समझदारी से जीना है।
संयम कहता है—“जो आवश्यक है, उतना ही पर्याप्त है।”यह संतुलन का विज्ञान है—अति से बचना और न्यून को भरना।अक्सर यह समझ लिया जाता है कि संयम स्वतंत्रता को सीमित करता है।वास्तविकता इसके विपरीत है। जो व्यक्ति अपनी इंद्रियों का गुलाम होता है,वह कभी स्वतंत्र नहीं हो सकता और जो व्यक्ति अपनी इंद्रियों का स्वामी होता है,वही वास्तव में स्वतंत्र होता है। संयम निर्बंध नहीं, स्व-शासन है,वह निष्कंटक जीवन जीता है ,उसे न जीने का मोह ,न मरने का भय !
आँख, कान, जीभ, मन—ये सब जीवन के द्वार हैं।जब इन द्वारों पर संयम नहीं होता,तो बाहर का अव्यवस्थित संसार भीतर घुस आता है।असंयमित दृष्टि लालसा पैदा करती है और बाहर मन की इच्छानुसार आज्ञा का पालन करती है ,यह मानव की स्वाभाविक प्रवत्ति है ,वह बुराइयों की तरफ ज्यादा आकर्षित होता है। असंयमित वाणी विवाद को बढ़ाती है ,और असंयमित स्वाद रोगों का आमंत्रण देता है। और असंयमित विचार अशांति को ,तब 'संयम' इन द्वारों पर प्रहरी बनकर खड़ा होता है।
वाणी मनुष्य की पहचान है ,जो कहा जाता है, वह लौटकर तो नहीं आता वरन वाक्य बाण जिसको चुभते हैं ,वही दर्द महसूस करता है। संयमित वाणी ,अनावश्यक कटुता से बचाती है ,संबंधों को टूटने से बचाती है और स्वयं की गरिमा बनाए रखती है संयमित व्यक्ति बोलने से पहले सोचता है और बोलने के बाद पछताता नहीं है।
क्रोध और संयम में बहुत बड़ा विरोधाभास है, क्रोध क्षणिक होता है, पर उसके परिणाम दीर्घकालिक होते हैं ',संयम'' क्रोध' को दबाता नहीं है वरन उसे समझदारी से रूपांतरित करता है। जो व्यक्ति क्रोध में निर्णय लेता है,वह स्वयं को ही दंडित करता है।संयमित व्यक्ति जो भी बोलेगा अथवा कहेगा ,सोच -समझकर कहेगा ,संयमी व्यक्ति जानता है—हर बात पर प्रतिक्रिया देना आवश्यक नहीं है।
आज का युग भोग को अधिकार मानता है किन्तु संयम सिखलाता है कि हर उपलब्ध वस्तु आवश्यक नहीं कि हमारे पास हो ,असंयमित उपभोग ,संसाधनों को नहीं,मनुष्य को खोखला करता है ,कुछ लोग आडंबर के लिए अनावश्यक वस्तुओं का अंबार लगा लेते हैं।
संयमित जीवन संतोष को जन्म देता है,और संतोष से शांति। संबंध केवल भावनाओं से नहीं,'संयम' से टिकते हैं।अपेक्षाओं में संयम,अधिकार में संयम,और प्रतिक्रियाओं में संयम—यही संबंधों की स्थिरता का आधार है। यह हमारे व्यवहार से परिलक्षित होता है। संयम न हो,तो प्रेम भी बोझ लगने लगता है। संयम आत्म-सम्मान का रक्षक है ,जो स्वयं पर नियंत्रण रखता है,वह दूसरों से सम्मान की भीख नहीं माँगता।संयमित व्यक्ति परिस्थितियों का गुलाम नहीं होता।वह परिस्थितियों का विवेकपूर्ण सामना करता है।
आध्यात्मिक उन्नति का पहला सोपान संयम है ,बिना संयम के साधना भी प्रदर्शन बन जाती है।संयम मन को स्थिर करता है।स्थिर मन सत्य को पहचानता है।जहाँ संयम है,वहाँ अंतर्दृष्टि है। आज के समय में 'संयम' केवल व्यक्तिगत नहीं रह गया है।
हम लोग एक सामाजिक प्राणी हैं,समाज में रहने के लिए भी हमें बहुत संयम की आवश्यकता है। समाज में रहकर यदि हमें कोई बात किसी को पहुँचानी है तो संयम से काम लेना होगा ,यह सूचना किस समय किस अवसर पर देनी है ,यह संयम ही ,विवेक को सूचित करता है। किसी भी बात की अभिव्यक्ति कैसे करनी है ?यह संयम द्वारा ही व्यवहार में आता है। अपनी आकांक्षाओं को कितनी उड़ान देनी है ? 'संयम' नियंत्रित करता है , वस्तुओं का उपभोग किस तरह और कितना आवश्यक है ?'संयमित व्यक्ति' तय करता है।बिना संयम का समाज अराजकता की ओर बढ़ता है।
अब प्रश्न यह उठता है ,अपने अंदर संयम को कैसे विकसित करें ?यह कोई उपदेश से नहीं है ,किसी दूसरे ने दिया और हमने ले लिया वरन यह अभ्यास से आता है।संयमित जीवन जीने के लिए ,छोटे-छोटे नियम बनाएँ - अपनी कमजोरियों को पहचानें, तुरंत प्रतिक्रिया देने से बचें ,कृतज्ञता का अभ्यास करें और संतोष को अपनाएँ। संयम यह एक दिन का संकल्प नहीं है किसी ने आज किया कल की आवश्ययकता नहीं है , इसको निरंतर साधना है।
संयम का अंतिम लक्ष्य त्याग नहीं, संतुलन है।न अत्यधिक भोग,न कठोर वर्जना—बल्कि सजग, विवेकपूर्ण जीवन।इस पर मुझे एक कहानी स्मरण हो आई -जब महात्मा बुद्ध ज्ञान प्राप्ति के लिए गए ,तब उन्होंने कठोर साधना की यहाँ तक की कई दिनों तक भूखे भी रहे। जिसके कारण उनका तन काफी कमजोर हो गया था। बोधगया में जिस वृक्ष के नीचे वो बैठे हुए थे। वहां एक स्त्री खीर लेकर आई ,उसने कोई संकल्प लिया हुआ था और उसने वो खीर महात्मा बुद्ध [सिद्धार्थ गौतम ]को भी खाने को दी किन्तु उन्होंने इंकार खाने से किया ,तब उसने कहा - ''वीणा के तारों को इतना मत खींचो ,नहीं तो वे टूट जायेंगे।
वीणा के तारों को इतना ढीला मत छोडो !वरना वे बजेंगे नहीं।''
तब महात्मा बुद्ध ने उसकी दी हुई खीर खाई और तब उन्हें ज्ञान प्राप्त हुआ। कहने का मतलब यही है ,जीवन में संतुलन बनाकर चलना चाहिए ,और यही संतुलन हमारे अंदर 'संयम 'से ही आता है।
प्रियजनों,
संयम कोई बोझ नहीं, बल्कि जीवन को मर्यादित करता है।यह हमें छोटा नहीं करता,बल्कि ऊँचा उठाता है।जहाँ संयम है,वहाँ विवेक है।जहाँ विवेक है,वहाँ शांति है और जहाँ शांति है,वहाँ सार्थक जीवन है।आइए ! हम संयम को त्याग नहीं,शक्ति मानकर अपनाएँ क्योंकि संयम ही वह आधार है जिस पर चरित्र टिकता है और भविष्य बनता है।मर्यादित जीवन जीने की प्रेरणा देता है।
धन्यवाद।
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