Zeenat [ part 1]

''ज़ीनत '' हां उसका यही नाम था, किंतु मेरा परिचय उसके इस नाम से नहीं हुआ था, मेरा परिचय उसके उस नाम से हुआ था, जो उसे समाज के लोगों ने दिया था। मैं नहीं जानती थी कि वह कौन है ? कहां से आई है, कहां रहती है ? किंतु उसे देखकर उसके बारे में जानने की इच्छा जागृत हो उठी। और जब मैंने उसको जाना और समझने लगी , तब लिखने की इच्छा भी जागृत हो उठी। यह एक ऐसी लड़की की कहानी है , जो अच्छे खानदान परिवार से आई थी, और समय और परिस्थितियों ने, उसे इतना बेबस और बेकार बना दिया था। शायद वह अपना मानसिक संतुलन ही खो बैठी थी। 


खो बैठी थी या लोगों ने उसे खोने पर मजबूर कर दिया था, यह तो उसकी कहानी जानकर ही पता चलेगा। जिस जगह से वह आई थी, वहां महिलाओं को वैसे भी, भोग्या के सिवा कुछ नहीं माना जाता,उनके अनुसार एक औरत का कार्य घर संभालना और अपने शौहर को खुश करना ही होता है।  किसी अच्छे खानदान में हो जाने से भी, उनकी स्थिति में कोई परिवर्तन नहीं होता,जब तक लोगों की सोच में परिवर्तन न हो।  होता भी होगा, तो उसके घर के लोगों ने तो ऐसा नहीं सोचा।

 एक अच्छे खानदान और परिवार से आई लड़की, सड़कों पर धक्के खा रही थी लोगों उसे'' पागल'' कहते थे। उसकी इस हालात का कौन जिम्मेदार था ? उसके माता-पिता , उसके समाज के लोग , या उसकी परिस्थितियाँ ? किस तरह उसने अपने जीवन को काटा और क्यों ?वह शोषण का शिकार होते हुए भी , परिश्रम करके खाना चाहती थी। आत्मसम्मान के साथ जीना चाहती थी। क्या वो वास्तव में ही 'पागल 'थी ? उसे कभी किसी ने समझने का प्रयास ही नहीं किया सिर्फ औरत होने के नाते उसका लाभ उठाया। वह कभी अपने घर की 'ज़ीनत ' थी और आज कैसे सड़कों की 'ख़ाक' बनकर रह गई ? मान -सम्मान समझती थी, एक ऐसा रिश्ता ,जो सामाजिक दृष्टि से आँखों देखी किसी को नहीं सुहायेगा किन्तु एक ऐसी कहानी जो सोचने पर मज़बूर करती है। एक ऐसा रिश्ता जो 'हमदर्दी ''कहें या 'सहानुभूति 'से बना। 

  आईये ! इस कहानी को आगे बढ़ाने में और समझने में कहानीकार का साथ दीजिए और अपनी समीक्षाओं के माध्यम से उत्साहवर्धन कीजिये !

 यह बात उन दिनों की है, जब मैं नई-नई विवाह करके अपनी ससुराल आई थी। अभी मैं लोगों से, ठीक से परिचित भी नहीं हुई थी, उस परिवार के लोगों को समझने का प्रयास कर रही थी।नई -नई जगह थी ,नए लोग थे, उस परिवार में अपने को कैसे शामिल करना है ? इसी की जद्दोज़हद चल रही थी। गर्मियों के दिन थे,भोजन के पश्चात मैं छत पर टहल रही थी। मैंने अपने घर की छत से देखा, एक लड़की रोती हुई, चिल्लाती हुई, चली जा रही थी। पति महाशय भी , साथ में ही टहल रहे थे। उनसे पूछा - यह कौन है ? और इस तरह क्यों चिल्ला रही है ?

उनका जवाब आया -यह तो' पागल' है, उस दिन इसी नाम से उसका परिचय हुआ। कोई उसे' पागल' कहता, कोई 'पगलेट' तो कोई' बावली !' रबल्ली 'उसका एक नाम नहीं था। न जाने, किस बात पर लड़ पड़े ? इसीलिए लोग उससे बचते थे। पतिदेव ने बताया -यह ऐसी ही है और यह गलत भी है। 

गलत कैसे ? मैं कुछ समझ नहीं पाई। 

अब यह भी मुझे समझाना पड़ेगा, यह किसी के भी साथ सो जाती है।

जब नीचे आकर उस लड़की के विषय में जानना चाहा ,तब सास ने बताया -पड़ोस में झाड़ू -पोछा करती है ,किसी भी बात पर भड़क उठती है ,वो' पागल' है।   

 मन में अनेक विचार आए, क्या यह वास्तव में' पागल' है , 'बावली' है ? मेहनत करती है ,भीख तो नहीं मांग  रही है ,जब यह मेहनत करके अपना भोजन जुटाती है फिर लोग इसके परिश्रम की क़द्र  क्यों नहीं करते ?इसकी लड़ाई का क्या कारण हो सकता है ?

ख़ैर बात आई गई हो गई , मैंने भी ध्यान नहीं दिया किंतु मेरे मन में उसकी एक छवि बन गई। वह सबसे लड़ती - झगड़ती है , कहने को उसका अपना कोई नहीं है ,वो रहती कहाँ है ?कोई नहीं जानता ,जिससे भी पूछो !वही अलग -अलग स्थान बताता ,शायद वही अपना गलत पता देती। इससे मन में विचार आया ,ये ख़तरनाक भी हो सकती है फिर लोग, इसे अपने घर बुलाकर काम क्यों करवाते हैं ? मन में विचार आया चोरी भी तो कर सकती है। अपने यही विचार अपने पति सुदीप को बताये। 

मेरी बातें सुनकर वो हँसे और बोले -इसके विषय में इतना ज्यादा सोचने की आवश्यकता नहीं है ,ये तो सारा दिन ऐसे ही सड़कों पर धक्के खाती फिरती है। उनकी बातें सुनकर लगा,इसके जीवन का किसी के लिए भी कोई महत्व नहीं है। क्या इसका कोई परिवार नहीं है ?क्या वे लोग नहीं जानते ?ये घरों में झाड़ू - पोछा लगाकर अपना जीवन यापन करती है।

 मैं अक़्सर उसे दिख जाती थी, वह मुझे देखकर मुस्कुराती थी , मैं उसकी मुस्कान देखकर, मुस्कुरा देती थी,मेरी उससे कोई दुश्मनी नहीं थी किंतु सुदीप के कहे शब्द ,मुझे स्मरण हो आते और घृणा करने का मन करता। न चाहते हुए भी मैं, उसे इस तरह से देखती, जैसे मैं उससे  सवाल पूछ रही हूं कि वह ऐसा क्यों करती है ,वह किसी से भी क्यों लड़ती है ,क्या वह सच में पागल है ?या फिर इस समाज द्वारा बना दी गयी है। यदि पागल है ,तो इसे' पागलखाने' में होना चाहिए।  वास्तव में ही मेरे मन में,उसको लेकर अनेक प्रश्न कुलबुलाने लगते किन्तु उससे न ही कुछ पूछ पाती ,न ही बात करती। कोई भी देखेगा ,तो उससे घृणा ही करेगा ,देखने में इतनी गंदी लगती थी।  

मन में अनेक कहानियां उमड़ आती हैं। क्या यह भोले होने का अभिनय कर रही है, यह लड़ती क्यों है ? इसका पति कहां गया है ? क्या इसका परिवार नहीं है ? किंतु मुझे क्या ? यह सोचकर मैं अपने प्रश्नों को एक झटका देकर, अपने घर के अंदर चली जाती।

एक दिन वो हमारे घर के बाहर बैठ गयी ,बड़ी थकी और परेशान लग रही थी ,उस समय मेरी सास भी घर पर नहीं थी। मैंने उसे ध्यान से देखा ,सोचा -'इसे यहां से उठा दूँ ,सास देखेंगी तो नाराज़ होंगी ,इसे यहाँ क्यों बैठा रखा है ?भगाया क्यों नहीं ? उस दिन मैंने उसे नजदीक से देखा ,उसके बाल बेतरतीब बिखरे हुए ,शायद टूटे भी हों ,उलझे से ,छोटी -पतली सी चोटी, बदन पर गंदे कपड़े किन्तु फटे हुए नहीं थे ,देखने में बदन में पतली -दुबली ,चेहरे पर परेशानी ,मैं उससे ज्यादा उसके करीब नहीं जा पाई क्योंकि न जाने कितने दिनों से वह नहाई भी नहीं होगी ? मन ही मन सोचा -इसीलिए लोग इसे भगा देते होंगे। 

तब मैंने उससे पूछा -यहाँ क्यों बैठी हो ?

त्या तरुँ बाज़ी ,तहाँ जाऊँ ? भूख लदी है ,तुस्स खाने को हो तो दे दो ! मैं तुम्हारा झाड़ू पोंछा कर दूंगी। 

उसकी कुछ बातें समझ आईं कुछ नहीं ,तब मैंने जाना ,उसके कुछ शब्द भी स्पष्ट नहीं थे किन्तु इतना अंदाज़ा लग चुका था,वो भूखी है ,इसके लिए वो काम करने के लिए तैयार है। मुझे उससे सहानुभूति हुई , मैंने घडी में समय देखा , बिना समय गंवाए अंदर गयी और तवा गैस पर रख दिया, फ़्रिज से आटा निकाला और रोटी सेकने लगी ,दूसरे चूल्हे पर चाय रख दी। तुरंत ही दो रोटी सब्जी के साथ चाय लेकर आ गयी ,ये कार्य मैंने इतनी फुर्ती से किया ,अब सोचती हूँ तो आश्चर्य होता है ,उस समय मैं, ये सब कैसे कर पाई ? वो वहीँ बैठकर खाने लगी खाने के पश्चात मुस्कुराई और बोली -बाजी  तुम्हारे यहाँ काम कर दूँ। 


laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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