मधुलिका ,बेटे का बहाना बनाकर ,कुमार के साथ घूमने के लिए आगरा आती है किन्तु मधुलिका का वहाँ आने का असली उद्देश्य क्या है ? ये तो सिर्फ़ वही जानती है। मधुलिका ,कुमार का पीछा कर रही थी ,अचानक ही न जाने कुमार कहाँ ग़ायब हो गया ?अब वो कुमार की प्रतीक्षा में थी कहीं तो दिखेगा। मंकु वहां खड़ा बोर हो रहा था,बच्चा है ,उसे तो खेलना और घूमना ही भाता है ,उसे क्या मालूम ?उसे घुमाने के लिए यहाँ कोई नहीं आया वरन उसके पिता की जासूसी हो रही थी ,तब वो अपनी मम्मी से बोला -मम्मी !हम यहां क्यों खड़े हैं ? पापा भी कहीं चले गए हैं,आओ !यहाँ से चलते हैं ,मुझे आइसक्रीम भी खानी है।
इस समय मधुलिका का ध्यान सिर्फ कुमार पर था। वह कुमार को ढूंढना चाहती थी किंतु ये कुमार भी न जाने अचानक ही कहां गायब हो गया ? उसे फोन करके पूछ भी नहीं सकती थी,बल्कि नाराज होगा और कहेगा -तुम मेरी जासूसी कर रहीं थीं।
वो चाहती थी 'सांप भी मर जाये ,लाठी भी न टूटे। ' जब उसे बहाना बनाना है ,तो कोई भी बहाना बना देगा, -कि मैं मीटिंग में हूं। हो सकता है, वह इस बात पर ऐतराज भी करें कि मैंने, तुमसे पहले ही कह दिया था कि मैं तुम्हारे साथ नहीं चल पाउँगा। प्रतीक्षा के सिवा अब और कोई चारा भी नहीं रह गया था। तब तक मधु आगरा की सड़कों पर ऐसे ही घूमती है और बेटे की इच्छापूर्ति करती है। एक घंटे पश्चात, उस 'प्रदर्शनी ''में लोग आने जाने लगे,इतने भी नहीं किन्तु एक -दो से शुरुआत हुई।
तभी मधुलिका ने देखा, कुमार एक होटल से बाहर निकलता है , उसे देखकर वह छुप जाती है, वह जानना चाहती थी, कि इसके साथ इस समय कौन है ? किंतु वह अकेला ही बाहर आया था, मधुलिका को निराशा हुई। उसे अपने आप पर ग्लानि महसूस हुई। क्या मैं, इसके विषय में गलत सोच रही थी, मैंने व्यर्थ में ही इस पर संदेह किया इसके साथ तो कोई नहीं है। मन में प्रफुल्ल्ता का एहसास हुआ ,अब तक वह जो इतनी वेदना से गुजर रही थी ,वह अब शांत हो गयी थी। तब मंकु से बोली -बेटा !आये हैं, तो' प्रदर्शनी' भी देख ही लेते हैं, वह कलाकार कौन है ,यह भी जान लेते हैं ?
नहीं ,मुझे वहां नहीं जाना है ,मंकु ज़िद करते हुए बोला।
किन्तु मधुलिका सोच रही थी ,जब आ ही गयी हूँ ,तो देखने में क्या हर्ज़ है ? यह सोचकर वह प्रदर्शनी के लिए, उस ''प्रदर्शनी ''को देखने के लिए अंदर चली गई।शायद बच्चा अनजान लोगों को देखकर घबरा रहा था ,इसीलिए वो अपनी माँ का हाथ खींच रहा था। तब मधुलिका ने उन चित्रों को देखा और उससे बोली -देखो !कितनी सुंदर चित्रकारी है ,मेरा बेटा भी सुंदर ड्रॉइंग बनाता है ,उसकी मेम ने उसको' गुड़' दिया था। उसका ध्यान भटकाने और उसका मन लगाने के लिए वो ऐसा कर रही थी। बड़ा होकर मेरा मंकु भी इससे अच्छी चित्रकारी करेगा। धीरे -धीरे भीड़ बढ़ रही थी ,किन्तु मधुलिका ने मंकु का हाथ कसकर पकड़ा हुआ था ताकि इस भीड़ में वो कहीं खो न जाये।
उन पेंटिंग्स को देखते हुए वो आगे बढ़ रही थी , मन ही मन सोच रही थी - वाकई में ,कलाकृतियां एक से एक लाजवाब हैं। कलाकार का नाम पढ़ रही थी, यामिनी मन ही मन सोचा - कुमार जब भी, प्रदर्शनी देखने के लिए आता है ,इसे लड़कियां ही मिलती हैं। वो जानती है ,कुमार' कला प्रेमी' है,कहीं कला के बहाने उससे संपर्क तो साधना नहीं चाहता। अगर ऐसा होता तो वह फिर शिल्पा को क्यों छोड़ता ? वह भी तो एक अच्छी कलाकार थी? न जाने अब वो बेचारी ! कहां होगी ? शिल्पा के लिए मधुलिका को अफसोस हुआ। मधुलिका ने वहां उपस्थित एक लड़की से पूछा -जिसने यह कलाकृतियां बनाई है, क्या वो कलाकार भी यहीं उपस्थित हैं ?
यस मैम ! वे थोड़ी देर में आ जाएंगीं , कहकर वो अतिथियों का स्वागत करने लगी।
कुछ देर पश्चात, एक बहुत ही खूबसूरत,' पाश्चात्य वस्त्रों' में लिपटी महिला ने वहां पर प्रवेश किया। मधुलिका ने उसे देखा और उसकी कल्पना शिल्पा से करने लगी। कद -काठी तो उसके जैसा ही है, किंतु उससे 'खूबसूरत' है। उसका ध्यान मधुलिका की तरफ नहीं था, मधुलिका अपने बेटे को दिखला रही थी, इन आंटी ने ये सभी तस्वीरें बनाई हैं ,एक तरह से कहा जाए तो वह उसे बहला रही थी क्योंकि इस सब में उसके बेटे की कोई रुचि नहीं थी। रुचि तो मधुलिका को भी नहीं थी, वह तो बस यहां पर सच जानने के लिए आई थी कहीं उसकी लापरवाही उसका घर बर्बाद तो नहीं कर रही।
कुछ देर पश्चात मधुलिका ने भीड़ में कुमार को भी देखा, उसे सोचकर आश्चर्य हुआ, मैं इसे अब तक देख कैसे नहीं पाई , यह कब से यहां है ? सोचा, जब यह यहां है तो इससे मिल ही लेते हैं , कुमार अवश्य ही यहाँ आता ये तो मैं जानती हूँ किन्तु इसने एक बार भी मुझसे नहीं कहा -कि हम प्रदर्शनी देखने साथ में चलेंगे। क्या इसकी मीटिंग हो गयी ? इस बात को सोचकर मधुलिका को बुरा लगा।तब उसने सोचा ,अब हम ही मिल लेते हैं , उसे कुछ गलत भी नहीं लगा किन्तु इस स्थान पर उसे महसूस हो रहा था ,जैसे वो कुमार से अज़नबी है ,अपने ही पति को देखकर उसे ऐसा ही कुछ महसूस हुआ।
मधुलिका, कुमार से मिलने के लिए जैसे ही आगे बढ़ती है, तभी वह नई कलाकार आगे बढ़कर कुमार का स्वागत करती है, कुमार मुस्कुराकर उसके साथ आगे बढ़ जाता है। इसका अर्थ है, कुमार इस लड़की को पहले से ही जानता है और जहां पर भी प्रदर्शनी होती है यह वही पहुंच जाता है।जो मन अभी कुछ देर पहले ही शांत हुआ ,वो फिर से विचलित हो उठा। अब तक तो मधुलिका का इस ओर ध्यान ही नहीं गया था किंतु अब मधुलिका देख रही थी, इस लड़की का पेट भी थोड़ा बाहर है। अनजाने ही उसके मन में एक नये विचार ने उसकी रूह तक को कंपा दिया, तुरंत ही वह तेजी से आगे की तरफ बढ़ी, वह कुमार को'' रंगे हाथों पकड़ लेना'' चाहती थी किंतु बच्चे के साथ इतनी तेजी से चल नहीं पा रही थी एक व्यक्ति से टकरा गई। जैसे ही उसकी नजर कुमार से हटी, कुमार वहां नहीं था।
मधुलिका ने चारों तरफ, उसे ढूंढा किंतु वह उसे कहीं भी दिखलाई नहीं दिया। वह मन ही मन बुदबुदाई -आज तो मैं इसे ''रंगे हाथों पकड़ ही लेती'' यदि यह आदमी सामने न आता,उसे घूरते हुए सोच रही थी किन्तु वह 'सॉरी 'कहकर वहां से चला गया। अब यदि मैं उससे कहती भी हूं कि मैंने तुम्हें वहां देखा, तो वह इंकार कर देगा। मधुलिका ने सोचा -क्यों न मैं इस लड़की से ही मिल लेती हूं।
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