अभी आई थीं ,दो पंक्तियाँ !न जाने कहाँ फुर्र हो गयीं हैं ?
अधरों की मुस्कान से लेकर, भँवों की कमान हो गयीं हैं।
प्रफुल्लित हो ,जज्बातों ने कुछ कहना चाहा।
ख़्वाहिशों की तो जैसे दास्ताँ हो गयी हैं ।
इधर ढूंढा ,उधर ढूंढा ,सोचती रही ,
न जाने ,वो तितलियाँ कहाँ खो गयीं हैं ?
नजरों के समक्ष बैठी थीं,आस लगाए।
भावों में उतर ही रहीं थीं ,सहसा !
किसी दर्द के गलियारे होती हुई ,
किसी के ग़मों की मज़ार में शामिल हो गयी हैं।
कसकर हाथ थामा ,सुकून ढूंढने चलते हैं।
शब्दों के बाज़ार से, ख़ुशियाँ ढूंढ़ लाते हैं।
रंगों की रोेशनाई में डूब, मदमस्त हो गयीं हैं।
अभी तक दर्द में डूबी जो उदास नजर आती थीं।
अब खुशियों के मेले में ,प्रसन्नता की लहरों में तैर गयीं हैं।
रौशन हुई ,प्रीत के रंगों में , भावों की रूह को छू गयी हैं।
फुर्र से हुई थी, दो पंक्तियाँ !सुख -दुःख के सागर में खो गयीं हैं।
सफ़र का उसके, अंत नहीं हुआ , अब थोड़ी थक गयीं हैं ।
सुकूँ की तलाश में , राहगीर संग तरु की छाँव में सो गयीं हैं।
उसकी उम्मीदों संग ,स्वप्नलोक के रंगों में खो गयीं हैं।
स्वप्न ही सही ,एक जीवन जी गयी हैं।
कभी ठहरती, कभी हवा में गुलाब सी महकती ,
काँटों में उलझी , आह !भरती सी ,
मयख़ानों की तहरीर बन ,मय के प्यालों में घुल गयीं है।
किसी की चाहत को लफ्ज़ों में पिरो ,
किसी के इश्क़ का अफ़साना बन गयीं हैं।
जिंदगी से जुडी, तो ज़िंदगानी बन गयीं हैं।
अर्थ से जुडी ,अर्थपूर्ण बन गयीं हैं।
श्रंगार से जुड़ीं , रसभरी हो गयीं हैं।
अलंकारों से सजी ,कविता बन गयीं हैं।
भक्ति भाव में डूबी ,जिंदगी का भाव दर्शा गयीं हैं।
डोलती हैं ,न जाने कहाँ -कहाँ ?लगता आवारा हो गयीं हैं।
अभी आईं थीं ,दो पंक्तियाँ !न जाने कहाँ फ़ुर्र हो गयीं हैं ?
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