वाहिद,शाम को जब अपने घर आते हैं , तब ख़ालिद उनसे जानना चाहता है कि उसके चचाजान घर पर किस लिए आए थे ? यह बात, तब ज़ोया को भी पता चलती है 'कि जीनत का रिश्ता टूट गया है। 'इस बात से ज़ोया को खुशी होती है, और वो कहती है - कि सलमा के'' पांव तो जमीन पर ही नहीं टिक रहे थे। ''उसका डॉक्टर दामाद आएगा। तब वाहिद से कहती है - उसकी बेटी का रिश्ता टूट गया, इससे हमें क्या ? कम से कम अब वह ऊंची उड़ान तो नहीं भरेगी और जमीन पर कदम रख कर चलेगी।''
तभी गंभीरता से वाहिद बोले - मैं सोच रहा था, कि हम अपने खालिद का रिश्ता ज़ीनत से करवा देते हैं।
उनकी यह बात सुनकर ज़ोया एकदम से जैसे सदमे में आ गई ,उसे कुछ सूझा नहीं ,एकदम से क्या जबाब दे ? परन्तु गुस्से से भर गई, और बोली -जिस लड़की का रिश्ता टूट गया ,उससे क्या मैं, अपने खालिद का निक़ाह होने दूँगी ? क्या उसके लिए यही एक लड़की रह गयी है ? मेरे मामू की पोती है ,मैं उससे अपने खालिद की बात चलाने की सोच रही थी।
ज़ीनत से निकाह में ही क्या बुराई है ? इसमें क्या गलत है ?हमारे खालिद को भी तो वह लड़की पसंद है खालिद भी उसे पसंद करता है ,बेहद ज़हीन और खूबसूरत लड़की है। यदि हम अपने खालिद का रिश्ता उससे कर देते हैं तो इसमें क्या बुराई है ?
ज़ोया ने अपने बेटे की तरफ देखा और पूछा -क्या तुझे ज़ीनत पसंद है ? तूने उसे देखा है।
हाँ , उसे मैं पसंद करता था......
उसके शब्द सुनकर वाहिद ने पूछा - पसंद करता था, क्या मतलब है ? अब पसंद नहीं करता है। तूने ही तो मुझे रिश्ता लेकर उनके घर भेजा था। अब क्या नई बात हो गई है ? वाहिद साहब नाराज़गी से बोले।
हुआ, कुछ नहीं है, जब हमें रिश्ता करना था तो उन्होंने मना कर दिया और अब वो आए हैं, तो अब हम रिश्ता नहीं करेंगे। कुछ न कुछ तो हुआ है ,तभी तो उसका रिश्ता अहमद से टूट गया है , हो सकता है अहमद और ज़ीनत एक साथ मिले हो। अहमद ,ज़ीनत के साथ रहा और उसे छोड़ दिया।
यह तुम कैसी बात कर रहे हो ? क्या तुम जानते नहीं हो कि ज़ीनत अपने ही घर की लड़की है ,कितनी सादगी से रहती है। उसके अम्मी -अब्बू को भी हम जानते हैं, मेरा ही तो भाई है।
तुम्हारा भाई है, तो क्या हुआ ?वह कोई ''दूध का धुला ''नहीं है। आपके भाई हैं ,तो क्या हुआ ? रिश्ता टूटा तो है, क्या उनकी बेटी कोई गलत काम नहीं कर सकती ?मुझे तो लगता है ,जरूर किसी न किसी कारण से तो रुकैया ने रिश्ता तोड़ा होगा। हमें भी, उसका पता लगाना चाहिए । आखिर उसके साथ क्या हुआ था, रुकैया ने रिश्ता क्यों तोड़ा ? ज़ोया में भी बेटे की माँ होने का गुरुर आ गया था।
क्यों, बात को फैलाती हो ? समझाने के लहज़े में वाहिद बोले - क्या तुम अपने खालिद को नहीं जानती हो, इसे कौन, अपनी लड़की देगा ? मजबूरी में ही सही, वे अपने खालिद के लिए रिश्ता लेकर तो आए हैं। अब ऐसे मौके का फायदा हमें उठाना चाहिए। अपना खालिद ठीक से कोई काम धंधा करता नहीं है ,सारा दिन आवारा गर्दी करता है। उसके चेहरे की तरफ देख बोले - कम से कम इस वक़्त इसका घर बस जाएगा और इतनी खूबसूरत लड़की मोहल्ले में ढूंढे से भी नहीं मिलेगी।
बेग़म ! इसी से पूछो ! जब इसने ज़ीनत को देखा ,तब से ही बेचैन था। यह तो उसे पसंद करने लगा था और इसने मुझे रिश्ता लेकर यूसुफ़ के घर भेजा था।
इतनी बड़ी बात हो गयी किन्तु मुझे बताना किसी ने मुनासिब न समझा ,ख़ालिद के अब्बू तुमने भी, मुझसे ये बात छुपाई ,'सलमा तो गुरुर से वैसे ही फूल गयी होगी।'
तब ख़ालिद से बोली -क्यों रे , ख़ालिद ! तेरे अब्बू सही कह रहे हैं , घर में इतनी बड़ी बात हो गई और मुझे नहीं पता भी नहीं चला। तब उसने वाहिद से पूछा - जब आप रिश्ता लेकर गए थे ,तो उन्होंने क्या कहा था ?
तब तो उन्होंने अपनी मजबूरी बताई थी कि अहमद मियां से रिश्ता तय हो चुका है। अपनी जगह, उनकी बात भी सही थी, अभी इसमें हम क्या कर सकते हैं ?
अब उस छोड़ी हुई लड़की से, मेरे लड़के का विवाह करने के लिए तैयार हो रहे हैं ,ज़ोया तुनककर बोली।
तुम भी ख़्वामहखाह बात का बतंगड़ बनाती हो, जब उसका निकाह ही नहीं हुआ तो फिर छोड़ी हुई ,कैसे हो गई ? रुकैया के यहाँ उनकी बात नहीं बनी, तो हम बना लेते हैं। तब वाहिद ने ज़ोया को दहेज का लालच दिया ,उनकी इकलौती बेटी है। बहुत सारा दहेज़ लेकर आएगी और अब तो अपनी इज्जत- आबरू बचाने के लिए वह कुछ भी देने को तैयार हो जाएंगें ।
खालिद के दिमाग में भी यह बात घर कर गई और उसे लालच भी आ गया ,तब वह बोला -ठीक है अब्बू !मैं आपकी ज़बान के लिए अपनी कुर्बानी देने के लिए तैयार हूं। आप उनसे कह सकते हैं ,मैं इस निक़ाह के लिए तैयार हूं लेकिन मुझे वो महंगी वाली मोटरसाइकिल चाहिए जो आजकल फैशन में चल रही है।
ठीक है,आज ही उनसे बात करता हूं।
ख़ालिद मन ही मन खुश हो रहा था'' एक पंथ दो काज '' हो गए, मनपसंद दुल्हन भी मिल गई और दहेज़ भी साथ में मिलेगा।
ज़ोया को ,यह बात पसंद नहीं आई और मुँह फुलाकर बोली -मेरी राय की तो कोई अहमियत ही नहीं है। तुम दोनों का जो जी चाहे करो !और अंदर चली गयी।
उसके पीछे -पीछे ख़ालिद आया और बोला -अम्मी !आप क्या चाहती हैं ? क्या मैं ज़ीनत से निक़ाह न करूं ?आप ही सोचिये ! अब वो लोग, हमारे एहसान तले दबे रहेंगे ,ऐसे मौक़े पर हम उनके काम आएं हैं। तब बोला - क्या आपके मामू की पोती बहुत खूबसूरत है।
ज़ोया ने ,ख़ालिद की तरफ देखा ,मन ही मन सोचा ,ये तो मैं ही कह रही हूँ ,उससे रिश्ते की बात चलाएंगे यदि उन्हें हमारा ख़ालिद पसंद न आया तो क्या करेंगे ? ज़ीनत भी हाथ से निकल जाएगी। तब बोली -खूबसूरत तो है, किंतु कई बरस हो गए उसे देखा भी नहीं .....
ठीक है ,अब ज़ीनत पर एहसान कर देते हैं ,निक़ाह के बाद ,आपके घर के कामों में हाथ बंटाएगी। आपकी गुलामी करती रहेगी ,नहीं करेगी, तो तलाक़ दे दूंगा। हमारे तो दोनों हाथों में लड्डू !
ख़ालिद की वहशियाना साज़िश को सुनकर ,ज़ोया को अपने बेटे की ज़लालत भरी बातें सुनकर ,उस पर गुस्सा तो आया और उसका मन किया ,वो अपने इस कमज़र्फ औलाद के खड़ी होकर ज़ोरदार दो तमाचे रसीद कर दे , किन्तु न जाने क्यों ,उसने हाँ में गर्दन हिलाकर उसकी बात पर अपनी मंजूरी दे दी।