विचलित मन -
प्रियजनों !
आज के सत्संग में हम' विचलित मन' के विषय में बातें करेंगे ,यह मात्र एक शब्द ही नहीं है ,बल्कि यह एक सबसे बड़ी मानवीय चुनौती है। यह वह अवस्था है, जहां मन स्थिर नहीं रहता ,जहां विचार बिखर जाते हैं भावनाएं दिशाहीन हो जाती हैं और व्यक्ति अपने ही भीतर शांति को खो बैठता है। विचलित मन किसी एक उम्र वर्ग या परिस्थिति की समस्या नहीं है यह आज के युग का सामूहिक संकट है।
हमें हमारा चित्त किसी भी कार्य में हो स्थिर रखना चाहिए। जो लोग सत्संग में आते हैं, उन्हें अपना ध्यान गुरु के प्रवचनों में लगाना चाहिए किन्तु ये मन अपनी ही करता है। इधर गुरु प्रवचन दे रहे हैं, किन्तु मन कभी कारोबार में ,कभी गृहस्थी के काम में ,तो कभी बच्चों के लिए भटक रहा है और हम भी, इसकी बातों को सुनने लगते हैं। गुरु के प्रवचनों से ध्यान भटकाकर ये हमें इधर -उधर दौड़ाता रहता है। सबसे पहले तो हमें इसे ही नियन्त्रित करना चाहिए। इसको नियंत्रित करना इतना आसान नहीं है। यह तो आध्यात्म की बात हो गयी।
किन्तु ये हमारे साथ बचपन से ही छल कर रहा है ,बच्चा जब पढ़ने के लिए विद्यालय में जाता है ,तब शिक्षा के लिए भी एकाग्रता की आवश्यकता होती है किन्तु तब भी ये मन उस छात्र को उसके लक्ष्य से भटकाने का प्रयास करता है। उसका' मन विचलित' होकर ,कभी खेल की ओर रुख़ करता है ,कभी अन्य साधनों की तरफ खींचता है ,जिसमें बच्चा खुश रहे या वो चीज,जो उसके लिए सरल हो। कठिन कार्यों में यह उसे एकाग्र नहीं होने देता।
इसी प्रकार किसी भी क्षेत्र में आगे जाने के लिए ,मन को बहुत समझाना पड़ता है ,उससे लड़ना पड़ता है। उसका तो कार्य ही यही है ,मानव को उसकी राह से भटकाना। प्रेम किसी स्त्री अथवा पुरुष से हो या फिर ईश्वर से ,मन एक ही स्थान पर स्थिर होना चाहिए। सांसारिक प्रेम में स्त्री अपने साथी का विश्वास और प्रेम चाहती है ,इसी तरह पुरुष भी स्त्री से यही अपेक्षा रखता है किन्तु प्रेम में जिसका भी मन विचलित होता है उसको परिणाम भुगतने पड़ते हैं।
मन को स्थिर रखने के लिए हमें इसके पीछे नहीं जाना है ,इसकी सुननी ही नहीं है बल्कि जैसे ही ये हमें बाहरी विचारों की तरफ ले जाये और हम इसके पीछे -पीछे चल दिए तो न जाने कहाँ -कहाँ ले जाकर छोड़ेगा ?
मनुष्य का मन एक दीपक की भाँति है। जब वह स्थिर होता है, तो प्रकाश देता है—मार्ग दिखलाता है, लेकिन जब वही दीपक हवा में डगमगाता है, तो न प्रकाश ठीक से फैलता है, न दिशा स्पष्ट होती है। विचलित मन ऐसा ही डगमगाता दीपक है।
1. विचलित मन क्या है?
विचलित मन का अर्थ केवल बेचैनी या तनाव नहीं है। यह उस अवस्था का नाम है, जहाँ मन बार-बार अतीत में अटका रहता है या भविष्य के भय में भटकता है।व्यक्ति बाहरी शोर में इतना उलझ जाता है कि भीतर की आवाज़ उसे सुनाई ही नहीं देती जिसके परिणामस्वरूप निर्णय कमजोर हो जाते हैं और भावनाएँ असंतुलित हो जाती हैं।
मन विचलित तब होता है जब मन का केंद्र टूट जाता है। जब लक्ष्य धुँधले पड़ जाते हैं और मूल्य हाशिये पर चले जाते हैं।
2. विचलित मन के कई कारण हो सकते हैं -
सबसे पहले तो किसी से अपनी तुलना न करें ,उसे देखकर आगे बढ़ने का प्रयास तो किया जा सकता है किन्तु उसके प्रति ईर्ष्या मन को विचलित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। किसी और की सफलता, यह तुलना मन को बेचैन करती है और आत्म-संतोष को नष्ट कर देती है।
आज हम ऐसे समय में हैं जहाँ सूचना की बाढ़ है, लेकिन विवेक की कमी है, लगातार मोबाइल, समाचार, 'सोशल मीडिया'पर हम भटकते रहते हैं , मन को विश्राम नहीं मिलता। विश्राम के बिना मन विचलित होना तय है।
जब हम मूल्य भूलकर, संयम, करुणा, कर्तव्यों को पीछे छोड़ देते हैं, तब भी मन दिशाहीन हो जाता है। दिशाहीन मन स्वभावतः विचलित होता है।
अपूर्ण संबंध,टूटते रिश्ते, अधूरी बातचीत, दबे हुए भाव—ये सब मन में गाँठें बनाते रहते हैं, वही गाँठें बाद में बेचैनी बनकर उभरती हैं।
3. विचलित मन के दुष्परिणाम -
विचलित मन केवल मानसिक समस्या नहीं है; इसके प्रभाव जीवन के हर क्षेत्र में दिखाई देते हैं।
निर्णायक क्षमता कमजोर होती जाती है ,कार्य अधूरे रह जाने के कारण क्रोध और निराशा बढ़ती है जिसके कारण संबंधों में दूरी आती है।आत्म-विश्वास डगमगाने लगता है।जीवन ही उद्देश्यहीन नजर आने लगता है।
जब मन विचलित होता है, तो व्यक्ति बाहरी रूप से सक्रिय रहते हुए भी भीतर से थका हुआ महसूस करता है,उसके आगे बढ़ने की जिज्ञासा घटने लगती है।
शास्त्रीय दृष्टि से देखा जाये तो 'विचलित मन'हमारा सबसे बड़ा शत्रु है और स्थिर मन मित्र !मन को बाँधना नहीं, साधना चाहिए क्योंकि दबा हुआ मन विद्रोह करता है, लेकिन समझाया गया मन सहयोग देता है।
अब प्रश्न यह उठता है कि विचलित मन को स्थिर कैसे किया जाए ? सबसे पहले तो हमें यह स्वीकारना होगा -कि हां हमारा मन विचलित है, और तब उसके लिए समाधान खोजा जाता है , विचलित है, तो किन कारणों से विचलित है, उसे कारण का पता लगाकर, एकाग्रता का अभ्यास करना चाहिए , यदि उस कारण को हम समझ नहीं पा रहे हैं , या वह कारण हमारे हाथ से बाहर है, तब हमें अपना ध्यान दूसरी तरफ करना चाहिए।
मान लीजिए -किसी बात को लेकर हमारा मन विचलित है, और वह समस्या हमसे हल नहीं हो रही है , तब हमारा ध्यान हमें दूसरी तरफ लगाना चाहिए ऐसी कई चीजे हैं, जिससे हम अपने विचलित मन को एकाग्र करने का प्रयास कर सकते हैं -जैसे अच्छा साहित्य पढ़ना , लिखना, ध्यान करना, यह कुछ साधन ऐसे हैं जो मन को एकाग्र करते हैं, या फिर अपनी रुचि का कोई भी कार्य करना। इसमें सबसे महत्वपूर्ण कार्य मोेन का भी है। कुछ देर परिवार से अथवा समाज से कटकर और मौन रहकर भी हम अपने विचलित मन को एकाग्र कर सकते हैं। हमारा मौन हमें हमारे मन में अंदर झांकने का अच्छा अवसर देता है।
विचलित मन से स्थिर मन की ओर कैसे जाएँ ?
अब प्रश्न यह नहीं कि मन विचलित क्यों है, बल्कि यह है कि उसे स्थिर कैसे किया जाए ? प्रतिदिन कुछ समय का मौन मन के शोर को शांत करता है।
विचलित मन अक्सर “जो नहीं है” पर केंद्रित रहता है।कृतज्ञ मन “जो है” को देखता है।कृतज्ञता मन को वर्तमान में लाती है—और वर्तमान में शांति होती है।
जब जीवन में उद्देश्य स्पष्ट होता है, तो मन भटकता नहीं है। नियमित दिनचर्या मन को स्थिर करती है , मन की बात किसी विश्वसनीय व्यक्ति से साझा करें ताकि अपने मन का भार भी हल्का हो और हो सकता है ,यदि आपने ,किसी सही व्यक्ति से अपनी परेशानी साझा की है तो समस्या का निदान भी बता सकता है। स्व से बाहर निकलकर दूसरों के लिए कुछ करना भी मन को स्थिर करता है।
जहाँ विश्वास होता है, वहाँ भय कम होता है।जहाँ भय कम होता है, वहाँ विचलन घटता है।विश्वास किसी एक परंपरा तक सीमित नहीं—यह जीवन पर, स्वयं पर और उस व्यवस्था पर भरोसा है जो हमें थामे हुए है।
प्रियजनों,
अब आप सोच रहे होंगे ,क्या ये एक दोष है ? विचलित मन कोई दोष नहीं है; यह संकेत है कि हमें रुककर अपने भीतर झाँकना चाहिए।मन को दोष देने के बजाय, उसे समझना सीखिए।मन को भागने से रोकने के बजाय उसे उचित दिशा दीजिए।
याद रखिए—
मन जब शांत होता है, तब जीवन सरल हो जाता है।मन जब स्थिर होता है, तब सत्य स्पष्ट हो जाता है।
और मन जब अपने केंद्र में होता है, तब मनुष्य अपने उद्देश्य में होता है।
आइए, आज यह संकल्प लें कि हम अपने मन को शोर से निकालकर शांति की ओर ले जाएँगे।
क्योंकि स्थिर मन ही सशक्त जीवन की नींव है।
धन्यवाद।
