Hawa ka rukh

मम्मी !मुझे ये लोग बहुत तंग कर रहे हैं , मुझे अपने पास बुला लो ! मैं अब और यहां रहना नहीं चाहती, गिड़गिड़ाते हुए 'नेहल' ने अपनी मां को फोन किया। ये लोग मुझे, फोन भी नहीं करने देते, मुझ पर नजर रखते हैं आज यहां पर कोई नहीं है इसीलिए आपको फोन लगा रही हूं। लॉक लगा कर रखते हैं ,शायद आज लॉक लगाना भूल गए हैं। 

 नेहल अपनी ससुराल में परेशान थी, और अपनी मां से शिकायत कर रही थी ,-न जाने ये लोग कैसे हैं ? मुझ पर नजर रखते हैं। न ही मैं यहां ठीक से खा पाती हूं, न ही सो पाती हूं। पढ़ी-लिखी होने के बावजूद भी मैं बेबस और लाचार हो गई हूं। मेरी सास सारे दिन ताना मारती रहती है। मैं अब यहां और रहना नहीं चाहती। 


उधर से आवाज आई - बेटा !जब लड़की दूसरे घर जाती है, तो उसे कुछ तो बर्दाश्त करना पड़ता है, उन लोगों के' रंग में रंगने का प्रयास करो !' जैसा वो चाहते हैं, वैसा ही करो ! छोटी-छोटी बातों के लिए परेशान नहीं होते हैं, कुछ बातों को नजर अंदाज भी कर दिया करो ! जब तुम्हारा व्यवहार अच्छा होगा तो धीरे-धीरे उनके मन की ग्लानि भी शांत हो जाएगी और तेरी सास को तब तेरा महत्व समझ आएगा ! कि हमारे घर  कितनी अच्छी और होनहार बहु आई है। शुरू-शुरू में तू भी इन लोगों के लिए अजनबी है, और ये तेरे लिए। हिम्मत से काम लो ! अब वह घर तुम्हारा है, तुम्हें उसे अपनाना होगा। इस तरह एक-एक बात पर ध्यान दोगी, तो तुम वहां नहीं रह पाओगी।

तो क्या करूं ?इस घर को अपना समझकर ही तो यहाँ आई थी किन्तु इन लोगों के व्यवहार से ही तो मुझे पता चला ,मैं गलत थी।  मैं अब यहां नहीं रह पाऊँगी , ये  लोग मुझ पर, ना ही विश्वास करते हैं ,आये  दिन मुझे ताने मारते रहते हैं। हर चीज में मुझे घुटन महसूस होती है। मां ने नेहल की बात को अनदेखा और अनसुना कर फोन काट दिया, नेहल रोती रही। 

नेहल के पिता ने उसकी मां से पूछा - किसका फोन था ?

आपकी बिटिया का ही फोन था। 

 क्या कह रही थी ?

यही ,कि मुझे वापस बुला लो मैं यहां रहना नहीं चाहती ,ये लोग मुझे तंग करते हैं। 

तब तुमने क्या किया ? 

क्या करती उसे समझा दिया अब वही तुम्हारा घर है ,उन लोगों को तुम्हें अपनाना होगा और तुम्हें उन लोगों को, धीरे-धीरे समय के साथ उस घर को अपना लोगी तो सब संभल जाएगा। 

कहीं ऐसा तो नहीं, वो लोग ,हमारी नेहल को ज्यादा ही तंग कर रहे हों,चिंतित स्वर में कृपाशंकर जी बोले।  

मैं समझती हूं, उसकी सास बहुत तेज और चालाक है किंतु अब उस घर में, उसका विवाह कर दिया है अब उसको खुद ही उन लोगों से निपटना होगा। यदि मैं उसके घर के ,किसी भी कार्य में, हस्तक्षेप करूंगी तो कह देंगे - कि इसकी मां हमारे घर में लड़ाई करवा रही है। माँ तो पहले से ही बदनाम हैं ,माँ को जब भलाई नहीं मिलती जब उसकी बेटी उनका घर संभालती है और काम बिगड़ गया तो माँ ने सिखाया होगा।वो तो सीधे मुँह पर कह देगी -ले जाओ !अपनी बेटी को।   

लेकिन हमें उसकी भी तो बात सुननी चाहिए, पिता कहकर रह गए, लेकिन नेहल की मां जानती थी -मेरी बेटी बहुत परेशान है, किसी तरह से तो इसका विवाह किया है, हमारे पास देने को दहेज भी नहीं था बेटी का साथ दिया, तो यहीं  वापस आ जाएगी। दूसरी बेटी भी बैठी है ,पहली बेटी घर में आकर बैठ जाएगी तो छोटी बेटी का भी विवाह नहीं होगा। यही सब सोचते हुए, उसकी मां ने उसके दर्द को नजर अंदाज किया। 

अब जब भी नेहल का फोन आता उसकी मां किसी न किसी बात से, उसे समझाने का प्रयास करती, कभी कहती-' तुम अपनी सास की खूब सेवा करो! उसका कहना मानो ! और जब छोटी [ देवरानी] वाली आएगी, तब उसे तुम्हारी कीमत का पता चलेगा, कि मेरी बड़ी बहू कितनी अच्छी थी ? नेहल उनकी सारी बातें सुनती थी घर का सारा काम करती थी और कभी कुछ नहीं बोली।जब भी नेहल परेशान होती,  माँ हमेशा अपनी बातों से नेहल को बहला देती। 

कुछ समय पश्चात छोटी भी आ गई, नेहल को लगता -अब इसे डांट पड़ेगी लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ लेकिन धीरे-धीरे सास ही बदलने लगी।वो गलती करती ,तब भी सास नजरअंदाज कर जाती।

 इन बातों को कम से कम 20से 25 वर्ष बीत चुके थे अब बच्चे बड़े हो गए थे जैसे -तैसे जीवन कट रहा था नेहल अपने परिवार में, अपने बच्चों के साथ रह रही थी। अब तो बेटों के लिए बहुएं ढूंढी जा रही थी। कुछ चर्चा का विषय ऐसा बना , आजकल की लड़कियां, बहुत परेशान करती है , बहु मिलना भी आसान नहीं है। आजकल की लड़कियां किसी की सुनती ही कहाँ है ? 

तभी नेहल बोली -आजकल की लड़कियों के माता-पिता उनके साथ खड़े रहते हैं इसलिए वो  किसी से डरती नहीं , वे अपनी बेटियों का सहयोग करते हैं। 

प्रिया बोली -ऐसा होना भी चाहिए, बेटी अपना दुख अपने मां-बाप से नहीं कहेगी तो किससे  कहेगी ?

तभी नेहल का दर्द फूट पड़ा ,हमने भी तो बहुत सहा, नेहल बोली, और हमारे माता-पिता ने भी, इस बात में कभी सहयोग नहीं किया, उम्र के साथ-साथ नेहल अब रिश्तों को, व्यावहारिकता को, समाज की उच्च नीच को समझने लगी थी। तब वह अपनी सास को सुनाते हुए कहती है -हमारी माँ ने हमारा सहयोग कभी नहीं किया क्योंकि वह नहीं चाहती थी कि बेटी के परिवार में ,मैं किसी भी तरह का हस्तक्षेप करुं ?उसका कहने का उद्देश्य यही था।

 प्रत्यक्ष रूप से अपनी सास के सामने अभी भी नहीं बोल पाई किंतु उसकी सास समझ गई थी,कि वह कहना क्या चाहती है ?

 तब वो बोलीं -मां- बाप उसी का सहयोग नहीं करते हैं, जिनके बच्चे स्वयं गलत होते हैं , जब बच्चा गलत है तो मां-बाप क्यों साथ देंगे ? उनकी यह लाइन सुनकर, जैसे नेहल का संपूर्ण अस्तित्व हिल गया। इसका अर्थ यही हुआ कि मुझ में ही कोई कमी थी, इन लोगों ने तभी मुझे परेशान किया और इसी कारण मेरे माता-पिता ने भी मेरा कभी साथ नहीं दिया।

 आज जबकि नेहल को अपनी मां के कहे शब्द स्मरण हो रहे थे -तू जब उनसे अच्छा व्यवहार करेगी, उनकी सेवा करेगी तो उनके विचार बदल जाएंगे और कभी तो एक वक्त ऐसा आएगा उन्हें एहसास होगा कि वो  गलत थीं , उन्होंने अपनी बहू के साथ अच्छा नहीं किया किंतु आज उनकी बात सुनकर, नेहल को लगा-मेरी माँ की जो भी सोच थी ,जो भी मैंने सहा ,आज उसे सब बेमानी नजर आ रहा था। 

 जो वक्त बीत गया वह वापस तो नहीं आ सकता किंतु इन्हें तो इस बात का एहसास भी नहीं है कि इन्होंने मेरे साथ कितना गलत किया था ?मुझ पर कितने अत्याचार किए हैं ?उनके अनुसार तो मैं गलत थी इसलिए ये मुझ पर अत्याचार कर रही थीं।

 मां के जिन शब्दों को सुनकर नेहल ने,सब सहन किया ,धैर्य से जीवन बिताने का प्रयास किया। अब उनका कोई महत्व नहीं रह गया था।'' रात गई ,बात गई। '' कितने वर्षों से वह इसी तमन्ना में, अपना समय व्यतीत कर रही थी, कभी तो उसकी सास को अपने किये पर पछतावा होगा। जबान से उसके लिए दो शब्द अच्छे  निकलेंगे लेकिन आज अपनी पोती के सामने जो उन्होंने कहा- उसने' हवा का रुख' ही बदल दिया।हालात बदल दिए ,सोच ही बदल गयी। 

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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