Aaj ka satsang [part 3]

                                                                  “वास्तविक सौंदर्य”

प्रियजनों,

आज हम जिस विषय पर विचार करने जा रहे हैं, वह केवल रूप या आकर्षण की बात नहीं करता, बल्कि मनुष्य के संपूर्ण अस्तित्व को छूता है। वह विषय है—“वास्तविक सौंदर्य”! यह प्रश्न जितना सरल प्रतीत होता है, उतना ही गहन है—सुंदरता क्या है? क्या वह जो आँखों को भाती है, या वह जो आत्मा को स्पर्श करती है? क्या वह जो समय के साथ ढल जाती है, या वह जो समय से परे टिक जाती है?

वास्तविक सौंदर्य क्या है ?क्या वह है ?जो आचरण में दिखलाई देता है। जिसे कुछ लोग साधारण भाषा में ''मन की सुंदरता'' भी कह देते हैं। 


''आज का समाज सौंदर्य को दर्पण में खोजता है, जबकि वास्तविक सौंदर्य दर्पण के उस पार होता है।''

आधुनिक युग ने सौंदर्य को एक उत्पाद बना दिया है—नाप-तौल में बाँधा हुआ, तुलना में तौला हुआ, और बाजार में बेचा हुआ। रंग, आकार, उम्र, कपड़े, प्रतिष्ठा—इन सबको सौंदर्य का मानक घोषित कर दिया गया है।

पर प्रश्न यह है—क्या जो दिखता है, वही सुंदर है? और जो नहीं दिखता, क्या वह अस्तित्वहीन है?यह दृष्टि सौंदर्य को सीमित कर देती है और मनुष्य को अधूरा छोड़ देती है।

वास्तविक सौंदर्य वह है जो बाहर नहीं, भीतर से प्रकट होता है।यह वह गुण है जो देखने से अधिक अनुभव किया जाता है।

वास्तविक सौंदर्य में शामिल हैं -विचारों की पवित्रता, भावनाओं की सच्चाई, आचरण की गरिमा ,दृष्टि की करुणा और कर्मों की ईमानदारी !

यह सौंदर्य शोर नहीं करता, प्रदर्शन नहीं चाहता, यह चुपचाप जीवन को उज्ज्वल करता है।

बाहरी सौंदर्य समय का अतिथि होता है—आज है, कल ढल जाता है।

आंतरिक सौंदर्य समय का साथी होता है—समय के साथ निखरता जाता है।

बाहरी सौंदर्य प्रशंसा चाहता है जबकि आंतरिक सौंदर्य 'प्रेरणा देता है।

बाहरी सौंदर्य तुलना में जीता है जबकि आंतरिक सौंदर्य स्वीकार में।

आज जब व्यक्ति बाहरी सौंदर्य को ही सब कुछ मान लेता है, तब असंतोष जन्म लेता है ,वह कभी संतुष्ट नहीं रह पाता लेकिन जब आंतरिक सौंदर्य को महत्व मिलता है, तब संतुलन बना रहता है।

चरित्र वह आधार है जिस पर वास्तविक सौंदर्य खड़ा होता है।

सुंदर चेहरा बिना चरित्र के खोखला है, लेकिन सुदृढ़ चरित्र बिना रूप के भी प्रभावशाली होता है।

चरित्र में सत्य, संयम, धैर्य और उत्तरदायित्व शामिल हैं। जिस व्यक्ति का चरित्र उज्ज्वल होता है, उसकी उपस्थिति ही सौंदर्य बन जाती है।

मनुष्य जैसा सोचता है, वैसा ही बनता है।विचारों में सौंदर्य होगा, तो व्यवहार में शांति होगी।कटु विचार चेहरे पर कठोरता लाते हैं। उदार विचार चेहरे पर सौम्यता लाते हैं। वास्तविक सौंदर्य की शुरुआत विचारों की शुद्धता से ही होती है। वाणी केवल शब्दों का समूह नहीं, बल्कि व्यक्तित्व का दर्पण है। मधुर वाणी चेहरे से अधिक सुंदर होती है। तीखे शब्द सबसे सुंदर चेहरे को भी कुरूप बना देते हैं और सच्चे, विनम्र शब्द साधारण व्यक्ति को भी स्मरणीय बना देते हैं। करुणा सौंदर्य की सबसे उच्च अभिव्यक्ति है।

जो व्यक्ति दूसरों के दुःख को समझता है, वही वास्तव में सुंदर है।वास्तविक सौंदर्य तब प्रकट होता है - जब हम बिना अपेक्षा किसी की सहायता करते हैं ,बिना शर्त स्वीकार करते हैं और बिना दिखावे भलाई करते हैं। 

समाज ने सौंदर्य का सबसे कठोर मापदंड नारी पर थोपा है लेकिन नारी का वास्तविक सौंदर्य उसकी धरा की तरह सहनशीलता, सृजनशीलता और संवेदनशीलता में है—न कि केवल उसके रूप में।नारी की शक्ति ही उसका सौंदर्य है ,उसकी लज्जा उसका गहना ,और उसकी गरिमा ही उसकी शोभा। कभी वो अन्नपूर्णा बन जाती है ,घर के कितने लोगों का पेट भरती है ,कभी त्यागमयी इस तरह अनेक रूप उसके अंदर समाये हैं जो उसकी सुंदरता में'' चार चाँद लगा देते हैं। ''

वहीँ दूसरी तरफ पुरुष का सौंदर्य उसकी शक्ति में नहीं, उसके संयम में है।उसकी आवाज़ में नहीं, उसके आचरण में है। चरित्र की गरिमा ,उत्तरदायित्व, संवेदना और न्यायप्रियता—ये पुरुष सौंदर्य के वास्तविक आयाम हैं।

जब समाज बाहरी सौंदर्य को ही मूल्य बना लेता है, तब असमानता जन्म लेती है और जब वास्तविक सौंदर्य को मान्यता मिलती है, तब मानवता विकसित होती है। एक सुंदर समाज वह नहीं जहाँ सब सुंदर दिखें, बल्कि वह जहाँ सब सुंदर व्यवहार करें।

आध्यात्मिक दृष्टि से सौंदर्य सत्य से जुड़ा है ,जो सत्य है, वही सुंदर है।जो करुणामय है, वही सुंदर है।जो न्यायपूर्ण है, वही सुंदर है।यह सौंदर्य आत्मा का अलंकरण है।

हम कैसे जानेंगे ?वास्तविक सौंदर्य क्या है ?क्या हम वास्तव में सुंदर हैं ? आत्मनिरीक्षण करें, ईमानदारी से जिएँ ,वाणी और व्यवहार में संयम रखें ,तुलना छोड़ें ,सेवा भाव  अपनाएँ  और स्वयं को स्वीकार करें। मैं जैसा भी हूँ ,उसने मुझे बड़े परिश्रम से बनाया है ,उसकी इस कलाकृति को बिगड़ने नहीं देना है। वास्तविक सौंदर्य सजाने से नहीं, संवारने से आता है। 

प्रियजनों !

अंत में मैं यही कहूंगा , रूप बदलता है, सौंदर्य नहीं ,वो तो दिन पर दिन निखरता है। 

चेहरे ढलते हैं, चरित्र नहीं ,समय सब कुछ छीन सकता है, लेकिन वास्तविक सौंदर्य नहीं क्योंकि वास्तविक सौंदर्य आत्मा की वह रोशनी है,जो अंधकार में भी मार्ग दिखाती है। हमें ऐसा ही सुंदर बनना है ,ऐसा ही सौंदर्य अपनाना है ,जो दिखे नहीं, महसूस हो ,जो बोले नहीं, प्रेरित करे और जो मिटे नहीं, बल्कि अमर हो।यही है—वास्तविक सौंदर्य है 

                                             धन्यवाद !

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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