Ye bhedbhav kyon ?

समझ नहीं आता ,क्या' सवर्ण'  होना कोई अपवाद है या अपराध ! इसे ही तो कलयुग कहेंगे।किसी ने क्या खूब कहा है -

    ''रामचंद्र कह गए सिया से ,ऐसा कलयुग आएगा।हंस चुगेगा दाना- तिनका, कौवा मोती खायेगा। ''

सवर्ण होना कोई अपराध तो नहीं ,ये लोग ही मिलकर आज तक, देश हित में खड़े रहे हैं। देश के लिए हर तरह से अपना योगदान देते हैं ,यहाँ तक की'' कर ''भी इनसे ही ज्यादा लिया जाता रहा है। सरकार कोई भी आये ,वोटों की खातिर ,हर एक नेता ने अपने पद का अनुचित लाभ उठाया। कुछ नेता रहे हैं ,जो देश के लिए सोचते हैं किन्तु कुछ नेता वोटों के लिए ही सोचते हैं और तब वे मोहरा बनाते हैं ,आम जनता को ,उनमें जातिवाद की फूट ड़ालकर, उनके सच्चे हितेेषी बन जाना चाहते हैं।किन्तु उन्होंने कभी ये नहीं सोचा, एक के साथ न्याय करते -करते दूसरे के साथ अन्याय पर आ गए।


उन्होंने पहली चोट की ,''आरक्षण'' करके ,यह सबसे घातक प्रहार रहा ,जो सवर्णों को धीरे -धीरे निगलने का प्रयास कर रहा था। जाति से 'सवर्ण' होना, जैसे अपराध हो गया है। राजनैतिक कूटनीति मुझे समझ नहीं आती और न ही मुझे पसंद है किन्तु इसके माध्यम से हमारे बच्चों के लिए जहरीले बीज बो दिए गए। हमें कोई भी सरकारी सुविधा नहीं मिली ,तब भी जीवन में आगे बढ़ते रहे। यहाँ तक की, इस देश की उन्नति के लिए लोगों ने अपनी जमीनें भी कुर्बान कर दीं। यदि कोई बच्चा पढ़ नहीं पाता तो कम से कम अपनी खेती तो सम्भाल लेता था किन्तु उनकी जमीनों का शुल्क देकर, उनमें लालच का बीज बो दिया। पैसे की चमक देखकर ,आज वो खुश हैं, किन्तु भविष्य में तो उसे बेरोजगारी या फिर किसी का मजदूर बनने पर मजबूर होना पड़ेगा।

सवर्ण जातिके बच्चों के लिए ,रोजगार भी कैसे मिलेगा ?वो तो 'आरक्षण' की भेंट चढ़ गया। कितना भी होशियार बच्चा हो ,उसका तो नब्बे प्रतिशत पर भी दाखिला नहीं,उसकी भी 'मैरिट लिस्ट ''बनेगी।  आरक्षण के कारण ,अब चालीस या पचास प्रतिशत वाले बच्चे डॉक्टर ,इंजीनियर बनेंगे,इलाज़ भी कैसा होगा, जान लीजिये ? अब तो अल्प ज्ञानी ही राज करेंगे।

 कब तक सवर्ण यह सब सहेंगा ? भविष्य भी हमारे हाथों में ही है ,एक न एक दिन भयानक विस्फोट की तैयारी कर रहे हैं। अब जाति प्रथा बची ही कहाँ है ? शहरों में सवर्ण हो या 'अनुसूचित जाति'के लोग,अब सभी एक साथ खाते -पीते, उठते- बैठते हैं। अंतर्जातीय विवाह हो रहे हैं। उन्हें शिक्षा से लेकर ,हर क्षेत्र में छूट मिल रही है। 

वे आरक्षित हैं ,इसीलिए एक ही परिवार के चार -चार आदमी सरकारी नौकरी में है और सवर्ण वाले क़ाबिल होते हुए भी ,प्राइवेट नौकरियों के लिए तलवे घिस रहे हैं। एक' सवर्ण' कहलाने वाला बच्चा,उसके सामने संघर्ष ही संघर्ष , पहले शिक्षा ने उसका बालपन छीना ,अधिक प्रतिशत से जो पास होना है। रातों की नींद उड़ी ,प्रतियोगिता में आने के लिए सबसे ज्यादा प्रतिशत जो लाने हैं। वह सवर्ण जाति में होने का दण्ड जो भुगत रहा है। इतने परिश्रम के पश्चात भी यदि वो पढ़ाई करता भी है ,तो अपने से कम नंबर लाने वाले के अधीनस्थ काम करता है क्योंकि जो भी नेता आता है ,वो गरीबों का बहुत बड़ा हितैषी जो है ,उसे वोट चाहिए। 

मैं पूछती हूँ ,क्या सवर्ण में गरीब नहीं होते ?क्या वो लोग आगे बढ़ने के लिए परिश्रम नहीं करते ?तब ये 'आरक्षण 'क्यों ? ये भेदभाव क्यों ? एक आईएएस अधिकारी ,अपने से कम पढ़े -लिखे के साथ काम करेगा तो क्या इस देश का सम्मान बढ़ेगा ? क्या सवर्ण बच्चा इंसान नहीं है ,क्या ये उसका अपराध है ? आरक्षण भी महंगाई की तरह बढ़ता ही जा रहा है। न ही ,महंगाई का पेट भर रहा है और न ही 'आरक्षण ''जातिवाद ''का। अब ये लोग अच्छे से अच्छे रह रहे हैं ,खा -पी रहे हैं ,ये'' आरक्षण ''समाप्त क्यों नहीं होता ? सरकार  ये नियम लागू क्यों नहीं करती ? परिश्रम के बल पर आगे बढ़ो ! यदि कोई गरीब है ,उसकी उचित शिक्षा का प्रबंध किया जाये ,न कि सवर्ण जाति के बच्चों के पेट पर पट्टी बांध दी जाये। 

एक महिला जो सिर्फ़ स्नातक है ,वो आज करोड़ों की हवेली में रह रही है। इस देश में न जाने कितनी परा स्नातक ,डिग्री लिए महिलाएं दोेहरी मार झेल रही हैं। एक तरफ गृहस्थी ,दूसरी तरफ दफ्तर ! इस सब असमानता का दोषी कौन है ?वोट के लालच में ,हममें से ही कोई ,जो अज्ञानता वश किसी भी गलत इंसान को लेकर गद्दी पर बैठा देते हैं।'' गद्दी पर बैठते ही ,वो इंसान जनता का नहीं ,वरन गद्दी का ग़ुलाम हो जाता है और तब होता है ,भेदभाव' नंगा नाच ' हमारे विरुद्ध ही कानून बनाये जाते हैं, और हम कुछ दिन, कह -सुनकर जीवन में आगे बढ़ जाते हैं। जिसको जो करना होता है ,वो करके चला जाता है और भविष्य के लिए कानून के नाम पर ज़हरीले बीज बोकर चला जाता है ,एक'' ज़हरीला बीज ''जिसका दंड हमारी आने वाली नस्लें भुगत भी रहीं हैं और भुगतेंगी। हमारे पूर्वज भी कहकर गए हैं -'अच्छी फ़सल को ,हमेशा कीड़ों ने ही खाया है। '

कुछ लोगों का कथन है - ये देश हित में है ,कैसे ?दूसरे को नीचा गिराकर.....यदि एक छोटी लाइन है ,तब उसको बड़ी करने के लिए, दूसरी लाइन को मिटाया नहीं जाता।'यह तो हमेशा से ही हुआ है ,बड़ी मछली छोटी मछली को खाती है ,देश में कोई भी बड़ा बने ,उसका चारा हमेशा से ही, छोटी मछलियां ही रहेंगी। तालाब में बड़ी मछली यह नहीं देखती ,कि ये छोटी मछली किस जाति अथवा प्रजाति की है ?उसे तो भोजन से मतलब है।  

   

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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