Or radheshyam ji nahi gye

राधेश्याम जी की उम्र अब लगभग 60 वर्ष की हो चुकी थी, किंतु यह उम्र यूं ही नहीं बीती, उन्होंने अपने जीवन में कठिन परिश्रम किया, घर बनाया, बच्चों का विवाह किया . बेटियों का विवाह करके उन्हें अपने ससुराल भेज दिया और बेटों की भी शादी कर दी। उनका एक बेटा बाहर नौकरी करता है एक बेटा, उनके साथ रहकर समीप में ही कोई कारोबार कर रहा है।  उनके जीवन का उद्देश्य तो जैसे पूरा हो गया था। अब वह सुखपूर्वक अपना जीवन व्यतीत करना चाहते थे ,सोचा था -'बेटियां अपने घर बार की हो गईं और एक बेटा बाहर नौकरी करता है। एक मेरे साथ है ,जब भी मन इधर-उधर जाने का करेगा तो कभी दूसरे बेटे के पास चला जाऊंगा और कभी यहां रहूंगा यह तो मेरा अपना बनाया हुआ घर ही है। 


देखा जाए, राधेश्याम जी की जिंदगी सेट हो चुकी थी। अब उन्हें अपना जीवन आराम से बसर करना चाहिए। किंतु यह जीवन है, यदि इंसान स्वयं भी अपना जीवन आराम से जीना चाहता है तो लोग उन्हें जीने  नहीं देते। राधेश्याम जी का छोटा बेटा, उसकी बहू उसके कान मे कुछ न कुछ कह ही देती थी। कभी उससे कहती -देखो !तुम्हारा भाई और भाभी तो आराम से रह रहे हैं और मैं यहां इन बूढ़े -बुढ़ियाँ की सेवा में लगी हूं। कुछ फर्ज, उन्हें भी तो निभाना चाहिए , अपनी जगह देखा जाए तो उसकी बात भी सही थी। कभी वह खाना बनाने में देरी करती, कभी किसी बहाने से बाजार निकल जाती।

 राधेश्याम जी को लगा- बहू ! हमसे थोड़ा परेशान है, थोड़े दिन बड़े बेटे के यहां घूम आते हैं। जब वे लोग, बड़े बेटे के यहां गए ,बेटा तो खुश हुआ किन्तु अब बड़ी बहू को तो अकेले रहने की आदत हो गई थी। अपने सास -ससुर का आना उसे अच्छा नहीं लगा। बात भी सही है, महंगाई का जमाना है, शहरों में तो मिट्टी भी मौल की मिलती है।

 दोनों पति-पत्नी मिलकर, नौकरी करते थे लेकिन उतने ही उनके खर्चे भी बढे हुए थे कुछ दिन राधेश्याम जी, अपने बड़े बेटे के पास रहे खुश रहे और कभी न जाने के लिए, वापस भी आ गए। यह बात उन्होंने किसी को नहीं बताई कि उनके साथ किसने क्या व्यवहार किया ?लेकिन फिर वह बड़े बेटे के पास कभी नहीं गए छोटे के बेटे के पास वो रह रहे थे लेकिन इस अधिकार से रह रहे थे कि वह घर उनका है, राधेश्याम जी भी छोटा-मोटा कार्य करके कमा लेते थे और छोटे बेटे के ऊपर ही खर्च भी कर देते थे। किंतु दिन पर दिन उनके छोटे बेटे अनमोल का लालच बढ़ता जा रहा था। उसने भी यह सोचकर उन्हें रखा हुआ था। बड़े -बुजुर्ग हैं, दो- चार साल में चल बसेंगे, तब इस मकान को बेचकर मैं अपना अलग एक अच्छा सा मकान बनवाऊंगा। यह सोचकर वह समय बिता रहा था। 

किंतु मजे की बात यह रही, 5 साल तो क्या ? राधेश्याम जी को 8 साल हो गए लेकिन वह टस से मस नहीं हुए , अब तो छोटे लड़के का लालच भी बढ़ गया था। यदि वह अपने माता-पिता को भाई के पास भेजता है, तो उस मकान में, बड़ा भाई भी हिस्सा मांगेगा ,उसका हिस्सा बनता भी था इसलिए उसने अब बहाना बनाया। इस घर को बेच देना चाहिए।

 राधेश्याम जी को यह बात पसंद नहीं आई, उन्होंने उससे कहा - यह घर हमारा है, हम इसको नहीं बेचेंगे।

 तब उनके छोटे बेटे अनमोल ने कहा -'आप हमें अपनी संपत्ति में क्या यह छोटा सा मकान भी नहीं दे सकते ,कितनी महंगाई हो गई है ?कल को इसी मकान में बेटियां भी अपना हिस्सा मांगेंगी  . सारी जिंदगी मैं तुम्हारी सेवा करता रहूं वह भी अपनी ससुराल में आराम से हैं और बड़ा भी अपनी मजे ले रहा है और मैं तुम लोगों की सेवा करते-करते इस मकान में ही बूढ़ा हो जाऊंगा।

 बात यहीं समाप्त नहीं हुई, उसने उनसे कहा - दिन पर दिन आप लोगों की उम्र भी बढ़ती जा रही है, कोई हारी - बीमारी, या परेशानी है, तो मैं अकेला क्या कर पाऊंगा ?यहां कोई आस- पड़ोस भी नहीं है। ऐसी जगह घर लेते हैं जहां पर मेरे न रहने पर भी, आप लोगों की सुरक्षा हो सके। ये बातें अब राधेश्याम जी के मन में आ गयी। ठीक ही तो कह रहा है ,हम क्या इस घर को छाती पर रखकर ले जायेंगे ?सब बच्चों का ही तो है ,तब इस घर से क्या मोह करना ? जब ये हमारे साथ है ,तो इसका फ़ल भी इसको  मिलना चाहिए। 

किसी भी बात को बार -बार कहते रहने से ,यदि वो सही न हो तो सही लगने लगती है।  माता-पिता को उनकी बात अच्छी लगी, अपने बेटे का दर्द उन्हें महसूस हुआ और उन्होंने कहा -अब हमें क्या करना चाहिए ?

 अनमोल का रोना काम आया, माता-पिता को लगा- हमारा बेटा वास्तव में ही बहुत परेशान है। तब उसने अपने माता-पिता को सुझाव दिया। आप इस मकान को अच्छे दामों पर बेच दो ! बहुत पुराना खंडहर भी हो गया है और कहीं सस्ता और अच्छा सा प्लॉट देखकर उस पर मकान बना लेंगे।  चार पैसे हमारे हाथ में भी होंगे और मकान भी बन जाएगा।

 राधेश्याम जी को, बेटे की यह बात पसंद आई और बोले -तुम सही कह रहे हो कहीं से अच्छी सी जमीन देखकर तो मकान बना ही सकते हो, और उस मकान के उन्होंने ग्राहक भी लगा दिए। अच्छे दामों में वह मकान चला गया। स्वयं राधेश्याम जी ने वह मकान बनवाया। अनमोल ने उस मकान के लिए जो जमीन ली थी वह अपनी पत्नी के नाम ले ली थी अब वह भी संतुष्ट थी । कि अब कोई उसके हिस्से का बंटवारा नहीं होगा। राधेश्याम जी ने मकान बनवाया, अच्छे से मकान भी बन गया और जेब में पैसा भी आ गया लेकिन बचा पैसा राधेश्याम जी ने अपने खाते में रखा।

 अनमोल तो सोच रहा था कि बाकी बचा हुआ, पैसा भी मुझे मिल जाएगा, लेकिन राधेश्याम जी ने वो धन अपनी सम्पत्ति के रूप में अपने ही खाते में रखा।  अब अनमोल को यह चिंता सताने लगी किस तरह से, उनसे वह पैसा हड़पा जाए ? अनमोल कभी अपने माता-पिता से कहता -सारी जिंदगी में ही तुम लोगों को ढ़ो रहा हूं। बेटियों के खर्चे भी मैं ही कर रहा हूं, मेरा क्या है ? मेरा कारोबार भी ठीक से नहीं चल रहा है बीमार रहता हूं। बच्चों की पढ़ाई भी है। अनेक खर्चों का रोना रोता। 

 अब तो राधे श्याम जी ने बेटियों का आना-जाना भी कम करवा दिया। उनसे कहा -अपने घर पर ही रहकर अपने घर को संभाले, यहां आने की कोई आवश्यकता नहीं है, एक तरह से उनका आना-जाना तुड़वा दिया। बहुत दिनों पश्चात राधेश्याम जी बीमार हो गए ,सबको लग रहा था। अब तो 75 के पार कर चुके हैं, अब तो राधेश्याम जी चले ही जाएंगे। उनके बड़े बेटे ने इंश्योरेंस कर रखा था, सारा खर्चा हुआ और राधेश्याम जी  कुशल अपनी पत्नी सहित फिर से परिवार में हंसने खेलने लगे।

 कई बार तो उनके बेटे अनमोल को उन पर क्रोध आता, किंतु अब उसे लगता, मेरे बेटे भी यही सब देख रहे हैं, कल को ये भी मेरे साथ ऐसा व्यवहार करेंगे, तो क्या होगा ? यह सोचकर वह अपने बेटों के सामने उन्हें कुछ नहीं कहता था।

 राधेश्याम जी अपने पोतों  के साथ हंस -खेलकर अपना समय व्यतीत कर रहे थे उन्हें देखकर खुश हो रहे थे कि मेरा परिवार फल -फूल रहा है लेकिन उम्र के साथ -साथ उनकी जिज्ञासाएं भी बढ़ती जा रही थी, अब राधेश्याम जी सोचने लगे - काश! कि मेरे एक पोते की शादी हो जाए ,अब उनके मन की जिज्ञासा इतनी प्रबल हुई उन्होंने सोच लिया मैं तब तक नहीं मरूंगा जब तक मेरे  किसी पोते का विवाह नहीं हो जाएगा।

 समय बितता जा रहा था, बच्चे, बड़े हो रहे थे ,बड़े, बूढ़े हो रहे थे और समय के साथ, अनमोल को भी महसूस होने लगा था , इन्हें हम नहीं रख रहे हैं बल्कि इन्होंने हमें रखा हुआ है। देर - सवेर बच्चों को संभालते हैं, घर की सुरक्षा रहती है। पत्नी जब घर से बाहर चली जाती है तो माताजी सारा घर संभालती हैं  पोतों को भी अपने दादा-दादी से प्रेम हो गया था। 

आप धीरे-धीरे घर में प्यार -अपनापन बढ़ने लगा था ,या ये भी कह सकते हैं ,समय के साथ ज्ञान बढ़ रहा था।  जिंदगी की ऊंच- नीच, अच्छाई बुराई से, अनमोल परिचित हो गया था। उसे अब अपने पिता का साथ रहना बुरा नहीं लगता था। इस बीच एक बार और राधेश्याम जी बीमार हुए उम्र बढ़ने के साथ-साथ बीमारियां भी बढ़ रही थी, तब भी उनमें बहुत हिम्मत थी,लोगों को लगा ,शायद राधेश्याम जी अब चले जायेंगे।  बेटे ने और पोतों ने मिलकर उनकी बहुत सेवा की, अब राधे श्याम जी कुर्सी पर बैठे रहते थे किंतु अपने परिवार को देखकर प्रसन्न रहते हैं और जब-जब घर वालों को लगता, कि अब तो राधेश्याम जी चले जाएंगे, किंतु पोते के विवाह की चाहत में, राधेश्याम जी नहीं गए। 

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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