Qabr ki chitthiyan [part 82]

जब पंडित अलोपीचन्द जी के घर को खोला गया ,तब एक रहस्य और खुला ,उनका छोटा बेटा' बलराज'भी अब इस दुनिया में नहीं रहा और अब वह पिशाच योनि को प्राप्त हो चुका है, तब रिश्ते में उसका भतीजा तुषार जो उसकी मुक्ति के लिए आया था ,उसकी कहानी जानना चाहता है ,आख़िर उसके साथ ये सब कैसे हुआ ?तब वह अपनी कहानी सुनाता है -उसके विवाह के लिए उसकी माँ ने लड़कियां देखना आरम्भ किया किन्तु किसी भी सभ्रांत परिवार से कोई भी, अपनी बेटी का विवाह मुझसे करना नहीं चाहता था। 


 बहुत दिनों तक तो मैंने प्रतीक्षा की किंतु कोई नहीं आया। अब मेरा क्रोध बढ़ता जा रहा था , मां भी अब बीमार रहने लगी थी, मैं उसकी ठीक से देखभाल भी नहीं कर पा रहा था क्योंकि मैंने कभी घर का कार्य, ऐसा कोई भी कार्य नहीं किया था, मैं समझ नहीं पा रहा था ,क्या करूं? मां की बीमारी देखूँ, लोगों की अवहेलना, मेरे क्रोध को बढ़ा रही थी। मैं वेश्याओं के पास जाने लगा था। घर पर आकर अपना क्रोध अपनी मां पर उतारता , जिस मां ने मुझे हर तरह से संभाला, प्यार दिया, मेरी गलतियों को क्षमा किया। 

एक दिन मैंने उसी मां पर हाथ भी उठा दिया। मुझे कुछ भी समझ नहीं आ रहा था मेरे जीवन का उद्देश्य क्या है ? आखिर 'मैं' चाहता क्या हूं ,मुझे करना क्या है ? बस मैं निरूद्देश्य आगे बढ़ रहा था, अपने क्रोध, ईर्ष्या, अपनी ताकत के शक्ति को, अपना सब कुछ समझ बैठा था।

 तब मैं एक दिन क्रोध में भरकर, पड़ोस के गांव से, चार महिलाओं  को महंगे पैसे पर उठा लाया, वह मेरे पैसे के लालच में मेरे साथ रहने के लिए तैयार हो गईं। मैं अपनी मां को दिखा देना चाहता था, तुम एक बहु चाहती थीं , मैं तुम्हारे लिए चार-चार ले आया हूँ किंतु मां यह सब नहीं देख पाई , क्योंकि उससे पहले की उनके' प्राण पखेरू 'उड़ चुके थे।

 मैं  उन महिलाओं को अपने घर लाकर अत्यंत खुश था जैसे मैंने कोई किला जीत लिया है। मां के चले जाने पर सारी संपत्ति मेरी थी, मैं उस घर का अकेला मालिक था, ना कोई रोक-टोक , ना किसी बूढ़े आदमी की सेवा, वे चारों मेरे सारे कार्य करती थी। मुझे बड़ा अच्छा लगता था, मेरी सेवा में हमेशा प्रस्तुत रहती थीं । किंतु मैं यह नहीं समझ पाया कि वह लालची औरतें , मेरा लाभ उठा रही थीं , मैं नशे में और भोग - विलास में इतना व्यस्त हो गया था कि अपनी धन संपत्ति की ओर भी मेरा ध्यान ही नहीं था। या यह भी कह सकते हैं कि उन्होंने कभी  इस ओर मेरा ध्यान जाने ही नहीं दिया क्योंकि अपनी मीठी बातों से मुझे बहलाये रहती थीं ,उनकी नज़रें मेरी संपत्ति पर थीं।

 एक दिन चारों ने, आपस में विचार- विमर्श किया। यह इस तरह तो सारी संपत्ति लूट देगा और जब इसके पास कुछ भी नहीं होगा तो हम फिर से सड़क पर आ जाएंगी। इसे तो अपने भविष्य का ख्याल नहीं है और न ही, हमारे लिए कुछ सोच रहा है। इससे तो बेहतर है ,इसके पास अभी जो भी संपत्ति है, उसको हम यहां से चुपचाप ले जाएं और अपना अच्छे से जीवन बसर करें !

 एक दिन मैं नशे में धुत था,अपनी योजना के तहत उसने ही मुझे उस दिन ज्यादा पिलाई थी।  मैंने चंपा से कहा -मेरे लिए कुएं से जल निकाल दो ! मुझे स्नान करना है ,किंतु वह बोली -आज मैं थोड़ा व्यस्त हूं , आप स्वयं जल निकाल लीजिए ! मैं कुएं से जल निकालने और नहाने के लिए, कुएं समीप ही बैठ गया था।

 तब  कृष्णा मेरे करीब आई और बोली -लाइए !मैं आपकी कमर मल देती हूं। वैसे मैं लगभग नहा चुका था किंतु उसके आने पर मैं खुश हो गया, और मैंने दोबारा पानी निकालने के लिए कुएं में जैसे ही आगे बढ़ा, उसने तुरंत ही मुझे कुएं में धक्का दे दिया। इस बात का तो मुझे यकीन ही नहीं था कि वह ऐसा कुछ करेगी। मैंने आवाज़ लगाई, चारों कुएं के समीप आकर खड़ी हो गई  और हंसते हुए बोलीं  -अरे रे !हमारे तो स्वामी तो  कुए के अंदर गिर गए , उन्होंने पहले ही सारा धन एकत्र कर लिया था और दरवाजा बंद करके इस घर से बाहर निकल गईं ।

 मैं कई दिनों तक, इस कुएं में पड़ा चीखता -चिल्लाता रहा किंतु किसी ने भी ,मेरी कोई आवाज नहीं सुनी, मैंने इस कुएं से निकलने का प्रयास भी किया किंतु असफल रहा। मैं धीरे-धीरे मृत्यु की ओर बढ़ रहा था, तब मुझे एहसास हुआ, कि मैंने जीवन में कितने बुरे कर्म किए हैं ?और ये सब भी मेरे लिए धोखेबाज निकली यह मेरे बुरे कर्मों का ही तो नतीजा है। मैं धीरे-धीरे मौत की गोद में सो गया,और प्रेत योनि में प्रवेश कर गया किंतु उन्होंने न जाने क्या किया था ? मैं इस कुएं से बाहर भी नहीं निकल पा रहा था। 

तभी तुषार बोला -उन्होंने तुझे कच्चे सूत  से जो बांध दिया था। बाहर निकल कर भी तू क्या करता ? लोगों के साथ छल और लोगों को परेशान ही करता, अच्छा हुआ ,उन्होंने तुझे बांध दिया। तब भी तुझे अकल नहीं आई , और जब मैं तुझे यहां मुक्ति दिलाने के लिए आया हूं , तू  अब भी चाहता है कि मैं स्वतंत्र होकर,बाहर रहूं । क्या इस पिशाच योनि में तू खुश है। इससे तुझे खुशी मिलती है , फिर तू मेरा पीछा क्यों कर रहा था ? क्या इस कुएं से बाहर निकालने की मुक्ति चाहता था। इस योनि से मुक्त होकर तू ,पुनः अच्छे कर्मों के लिए, क्यों नहीं सोचता है ? फिर से मानव योनि में जन्म ले और अच्छे कर्म कर..... ताराचंद जी अपने बेटे के मुख से ऐसी बातें सुनकर, अचंभित रह गये। वह किसी अनुभवी पंडित की तरह , उससे बातें कर रहा था,उसके चेहरे पर कोई भय नहीं था। 

 दीनदयाल जी से ताराचंद जी ने, पूछा - क्या यह ? मेरा बेटा तुषार ही है। 

ताराचंद जी मुस्कुराए और बोले -जब कोई संतान कष्ट में होती है, तो सबसे ज्यादा कष्ट किसे होता है किसे  दुख पहुंचता है ? 

माता-पिता को, रामेश्वर बोला। 

तो क्या ये .....ताराचंद जी की बात अधूरी ही रह गयी।  

हां, यह तुम्हारे पिता 'अलोपीचंद जी' ही हैं , जो मृत्योपरांत भी ,अपने बेटे को सही राह दिखाने आये हैं। वे  तुम्हारे लिए अत्यंत परेशान थे, दुखी थे, अपने अंतिम क्षणों में तुमसे मिलना चाहते थे किंतु तुम उन्हें नहीं मिले, उन्हीं दिनों तुम्हारी पत्नी गर्भ से थी। तब तक उनका यह नश्वर तन इस संसार में नहीं रहा, किंतु उनकी आत्मा तुम्हें ढूंढते हुए , तुम्हारी पत्नी के गर्भ में पहुंच गई और तुम्हारी संतान बनकर पैदा हुए। किंतु वह अपने पिछले जन्म को भूल चुके हैं।  इस' पिशाच की मुक्ति' मेरा कहने का मतलब है, तुम्हारे भाई बलराज ! को मुक्ति दिलाना चाहते थे। वह चाहते थे कि उसका, अच्छे से अंतिम संस्कार हो। यह घर खुले और उसकी मौत की सच्चाई सबको मालूम हो। वह इस घर में ही नहीं बल्कि कुएं में ही, भटक रहा था आज भी अगर पंडित जी ऐसा कार्य नहीं करते तो किसी को मालूम ही नहीं चलता, कि अब इस दुनिया में 'बलराज 'नहीं रहा।

 जब लोगों को पता चलता है , तब उसका अच्छे से अंतिम संस्कार होता है । इसके लिए उसके पिता की आत्मा ,तुषार के अंदर प्रवेश कर गई।  इस समय वह, आपका बेटा 'तुषार' नहीं है , वो एक पिता के रूप में अपना कार्य कर रहे हैं। पंडित अलोपीचंद जी, स्वयं अपने बेटे की मुक्ति के लिए यहां आए हैं। 

पंडित जी !आप किन बातों में लग गए ? तुषार ने पूछा - आप एक कथा का आयोजन करवाइये ! जब तक यह पिशाच योनि से मुक्त नहीं हो जाता, तब तक ये कथा चलेगी।

 जी, कह कर दीनानाथ जी ने अपने लोगों को भेजा और कथा के लिए अन्य सामग्री और सामान मंगवाया। 

पंडित जी जब तक, आप का सामान नहीं आ जाता है तब तक मेरी कुछ समस्याओं का समाधान कर दीजिए, ताराचंद जी ने उनसे कहा ।

 देखिए ! आपकी जो भी, समस्याएं हैं ,वे  इस कथा के पश्चात  स्वतः ही पूर्ण हो जाएंगीं , क्योंकि पंडित अलोपीचंद जी ! अपने कुछ कार्यों के लिए यहां आए हैं , और जब वह कार्य पूर्ण हो जाएगा तो वह स्वतः  ही यहां से चले जाएंगे। आपका बेटा आपके पास सही -सलामत रहेगा। मैं उसके जन्म का समय, सुनते ही समझ गया था कि पंडित जी की अभी कोई ख्वाहिश बाकी है।

 पंडित जी वो, पत्र आना ,वो पत्र कैसे हमारे बेटे को मिलते थे ? आपका बेटा स्वतः ही वह पत्र लिखता था। उस समय उसे स्मरण ही कहाँ रहता था, कि वह स्वयं पत्र लिख रहा है , और स्वयं ही किसी के माध्यम से वह पत्र लेता था लेकिन जब वह पत्र लेता था, तब वह तुषार ही होता था, और जब पत्र लिखता था तब वह पंडित अलोपीचंद होता था, जो मुक्ति चाहता था, अपनी इच्छाओं से , और अपने बेटे की पिशाच योनि से।

 एक सप्ताह तक वह कथा चली, उस कथा के पढ़ने और सुनने से, वह घर पवित्र हो गया, बलराज जो कच्चे सूत से बंधा हुआ था, मुक्त होकर अब कुंए से बाहर आ गया था, उसने तुषार को नहीं, अपने पिता को देखा, और उनसे क्षमा याचना की और बोला -मैं नहीं जानता था पिताजी !आप मुझसे इतना प्रेम करते हैं। मृत्यु भी, आपकी इच्छा शक्ति को रोक नहीं पाई। आप स्वयं मुक्त नहीं हुए क्योंकि आप स्वयं चाहते थे -'कि मेरी मुक्ति हो।  उसके क्षमा याचना करते ही , बलराज लुप्त हो गया और तुषार भी बेहोश हो गया।

 माता-पिता परेशान हो गए ,आखिर हमारे बच्चे को क्या हुआ है ?

पंडित दीनानाथ जी ने कहा -परेशान होने की कोई आवश्यकता नहीं है, अब वो भी मुक्त हो गए हैं, आपका पुत्र स्वस्थ है, इतने दिनों से, इतनी बड़ी शक्ति को वह संभाले हुए था इसीलिए उसका कमजोर तन यह सब सहन नहीं कर पाया था। जब वह उठेगा तो पूर्णतया स्वस्थ होगा उसे कुछ भी मालूम नहीं होगा ? कि आखिर यहां हुआ क्या था ? अब आप इस घर की, साफ सफाई करवा कर इस घर में रह सकते हैं। यह घर आपका है, आप जब चाहे आ सकते हैं और जब चाहे जा सकते हैं। इस घर से कोई चीख - पुकार सुनाई नहीं देगी। कहते हुए उन्होंने गंगाजल से उस घर को पुनः पवित्र किया और चले गए। गांव के लोगों के लिए यह एक बहुत बड़ा आश्चर्य था। यह किस्सा आज भी, लोग अपने बच्चों को सुनते हैं, ताकि वह बुरे कर्मों से बचें।

 यह कहानी तो यहीं समाप्त होती है। किंतु कहानी कभी समाप्त नहीं होती, एक नए चरित्र के साथ, एक नए किरदार के साथ एक नई कहानी उभर कर आती है। कुछ कहानियां'' कब्र के नीचे दफन'' हो जाती हैं, जिनको कोई नहीं जानता , और जब वह बेचैन होती हैं , तब  फिर से ''कब्र में से एक चिट्ठी'' आती हैं, अपनी एक नई कहानी सुनाना चाहते हैं। किरदार बदल जाते हैं, समय बदल जाता है, युग बदल जाते हैं ,कहानी चलती रहती हैं। पहले कागजों पर चिट्ठियां आती थीं किन्तु अब कम्प्यूटर का युग आ गया है। किस्सा हवेली का हो ,या फिर ''पिशाच मुक्ति ''कोई न कोई  चिट्ठी  भेजता है और एक नई कहानी जन्म लेती है। जो कभी दीवारों से ,कभी समय से ,कभी कागज पर लिखकर तो कभी किसी के लहु से जबाब मांगती है। 

 

 

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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