तुषार, किसी अनुभवी पंडित की तरह,' पंडित दीनदयाल जी'' को आदेश दे रहा था, और वह भी उसका कहा मान रहे थे। यह सब क्या हो रहा है ? ताराचंद जी ने जानना चाहा-' कुएं में ऐसा क्या है ? और यह कौन है, जो मुक्ति चाहता है।' तभी रामेश्वर ने उन्हें रोक दिया और बोले - अभी चुपचाप बैठकर, आप देखते रहिए !क्या होता है ? उन दो-तीन लोगों के मध्य यह वार्तालाप चल रहा था किंतु गांव के अन्य लोगों को कुछ भी समझ नहीं आ रहा था, यह सब क्या हो रहा है ?
वो बोले -तू मुक्ति चाहता है या नहीं।
मैं, इस स्थान से मुक्ति चाहता हूं , उस व्यक्ति में जवाब दिया।
तेरे कर्मों के कारण ही, तुझे यह सजा मिली है, क्या तुझे अब भी अक्ल नहीं आई ? क्या तू अभी भी संभलना नहीं चाहता है। यहां से मुक्त होकर कहां जाएगा ? क्या तेरा कोई और आसरा है ? या अभी तेरे पाप कर्मों में कोई कमी रह गई है। क्या तुझे अभी भी अक्ल नहीं आई ? पिशाच और तुषार में वार्तालाप चल रहा था ,तुषार उसे समझा रहा था और पिशाच इंकार कर रहा था।
उन दोनों का वार्तालाप देखकर पंडित दीनदयाल ने तुषार से पूछा - गुरूजी !क्षमा करें !आखिर यह कौन है ? जिसे आप मुक्ति दिलाना चाहते हैं।
आप ही ,इससे पूछ लीजिए ! तुषार ने उस व्यक्ति की तरफ इशारा किया, और बोला - पंडित जी ! को अपना परिचय दो ! कुछ देर तक वह व्यक्ति शांत रहा और कुछ नहीं बोला - क्या चाहते हो ? अब अपना परिचय देते हुए शर्म आ रही है, लज्जा का अनुभव हो रहा है , जैसे कर्म तुमने किये थे ,उन कर्मों को करते हुए, तो लज्जा का अनुभव नहीं हुआ होगा । अब क्या जवाब नहीं दोगे ? कम से कम कुछ प्रायश्चित तो कर लो ! लोगों को भी एहसास हो जाएगा, कि ऐसे कर्म करके लोगों को कैसी सजा मिलती है ?और वह कैसे पिशाच योनि में आकर अपने ही घर में कैद हो जाता है।
सभी ने तुषार के मुख से, यह सब बातें सुनी तो आश्चर्य से एक दूसरे की तरफ देख रहे थे। इस कुएं में कौन कैद है ? क्या पंडित अलोपीचंद जी मरे नहीं थे , उन्हें मार दिया गया था ,क्या उन्हें कुएं में डाल दिया गया था ?वे इस तरह पिशाच योनि में कैसे ? अनेक प्रश्न सभी के मन में आ रहे थे, बताते हो या नहीं , कठोर शब्दों में तुषार ने कहा।
इतनी देर से जो वह व्यक्ति, हिल रहा था , उसका हिलना थोड़ा कम हुआ और शांत हो गया जैसे कुछ सोच रहा हो।
अब सोचने का समय निकल चुका है,तुषार ने दीनदयाल को पुकारा - पंडित जी ! इसको एक मार दीजिए !और उनके कहते ही पंडित जी ने तुरंत ही ,सरसों के कुछ दाने उसकी तरफ उछाल दिए ,उनकी मार से वह तड़प उठा और बोला - मैं किसी को नहीं छोडूंगा।
पहले अपने आप को तो बचा ले ! तुषार ने कहा और तुरंत ही, उसके ऊपर रोली उछाल दी। वह फिर से चीख उठा, जैसे उसका बदन जल रहा हो। इस कुएं में ही रहना चाहते हो या कुएं से बाहर निकलकर लोगों को परेशान करना चाहते हो, या फिर मुक्ति चाहते हो। इतने दिनों से मुझे पत्र लिख रहे थे, मुझसे अपनी मुक्ति चाहते थे , मैंने तो, तुम्हें कब का क्षमा कर दिया था किंतु अब क्षमा नहीं करूंगा। कहते हुए उन्होंने फिर से पंडित जी की ओर इशारा किया और पंडित जी ने मंत्र फूंक कर सरसों के दाने , उस व्यक्ति की तरफ उछाल दिए, वह फिर से चीख उठा।
तब तुषार बोला - अब सच्चाई बताता है या नहीं, कहते हुए एक छड़ी की मार उसे दी और बोला -काश !मैंने यह मार तुझे जीते जी दी होती।
अभी बताता हूं, तब वह बोला -मैं'' बलराज'' हूं, उसके इतना कहते ही, सबका आश्चर्य से मुंह खुला का खुला रह गए , यह पिशाच और कोई नहीं स्वयं' बलराज' है, वह इस योनि को कैसे प्राप्त हुआ ? हम लोग तो सोच रहे थे, कि वह घर छोड़कर चला गया है लेकिन यह सब कैसे और कब हुआ ? इसका अर्थ है, इतने दिनों से जो हम किसी की चीख़ - पुकार सुन रहे थे। वह यही था। किसी को कुछ भी समझ नहीं आ रहा था।
जैसे-जैसे लोगों को पता चल रहा था कि पंडित जी का घर खुल चुका है और वहां पर पूजा हो रही है ,लोगों की भीड़ इकट्ठा हो रही थी। यह चर्चा भी, गांव में ''आग की तरह फैल गई'' कि पंडित जी का दूसरा बेटा ''बलराज'' भी मर चुका है।
तब वह आगे बोला - मेरे पास पैसे की कोई कमी नहीं थी मुझे पैसा कमाना नहीं था ,मुझे तो उस पैसे को लुटाना था ,मेरी मां ने मुझे, कभी मेरी गलतियों पर डाँटा नहीं बल्कि मेरा समर्थन किया। मेरा बड़ा सौतेला भाई ''ताराचंद'' हमेशा पूजा पाठ में लगा रहता था, पिता के रास्ते पर चल रहा था , उसे देखकर मुझे उससे ईर्ष्या होती थी, क्रोध आता था, वह मेरी तरह क्यों नहीं है ? या अच्छा बनने का अभिनय कर रहा है। कभी मेरी मां ने मुझे यह नहीं समझाया- कि बेटा यह बात गलत है क्योंकि उन्हें भी, इस घर की संपत्ति का लालच था। वो भी चाहती थीं , कि मेरा बेटा ही, इस संपत्ति का अकेला वारिस बने।
इसीलिए हम दोनों मां -बेटे ने एक योजना बनाई ,जब ताराचंद के विवाह के लिए लड़कियां ढूंढी जा रही थी तब मैं कुछ अधिक पैसे देकर, एक वेश्यालय से, एक लड़की को ले आया और लड़की को सिखा- पढ़ा दिया कि उसे क्या करना है ? जिसके कारण लड़की ने ताराचंद पर इल्जाम लगाया-'' कि इसने, मुझसे शादी का वादा किया था और अब मुझे धोखा देकर आ गया है।'' हमारा उद्देश्य सफल रहा, और ताराचंद को हम गांव से बाहर निकालने पर सफल हुए। अपनी योजना पर हम प्रसन्न थे।
तब माँ ने, मेरे लिए लड़की देखनी आरंभ किया, किंतु उन दिनों मैं नशा करने लगा था और आसपास के लोगों में अपने लड़ाई- झगड़े, दादागिरी के कारण, प्रसिद्ध हो चुका था। एक बिगड़ा हुआ व्यक्तित्व ! इसी कारण किसी भी गांव के सभ्य परिवार के लोग , अपनी लड़की को मुझसे ब्याहना नहीं चाहते थे। यदि कोई भूला -भटका आ भी जाता , मेरे विषय में सुनते और चुपचाप चले जाते। यह देखकर मुझे चिढ होने लगी थी ,मुझे लगता था मेरे पास बहुत धन है ,सुंदर बदन है कोई इंकार नहीं करेगा किन्तु इसके विपरीत जब लोगों का व्यवहार देखता तो क्रोध आता था, और सोचता था मैं तो बलशाली हूं, मेरे पास पैसा भी बहुत है, देखने में भी सुंदर और स्वस्थ हूं, फिर कोई अपनी लड़की मुझसे क्यों नहीं बहाना चाहता ?
