Mysterious nights [part 175]

पार्वती का हवेली में आने का उद्देश्य उनके दुःख में सम्मिलित होना ही नहीं वरन वो रूही को समझाना भी  चाहती थी। अब ये मौत का ताँडव बंद कर दे ! अपने पति के साथ सुखपूर्वक जीवन बिताये और मैं भी सुमित से प्यार करने लगी हूँ। 

तब रूही को पार्वती की बातों से, इस हवेली की सम्पत्ति के लालच की बू आती है और वो उससे कहती है -तूने ही तो मुझे इस सबके लिए उकसाया था और आज बड़ी ज्ञान दे रही है।  


और अब मैं ही, मना भी कर रही हूँ ,पार्वती ने जबाब दिया ,जब उसे लगता है ,रूही आसानी से मानने वाली नहीं है, तब उससे कहती है -तुम अपने जीवन के साथ जो करना चाहती हो करो ! किन्तु सुमित को कुछ मत करना साथ ही उसे चेतावनी भी देती है ,वरना वो जेल जाएगी किन्तु अब रूही पहले वाली शिखा नहीं रही ,वो भी उससे कह देती है -इस सबमें तुम भी बराबर की हक़दार हो ,मेरे साथ तुम भी जेल जाओगी। 

तब पार्वती को उस पर क्रोध आता है ,इससे पहले कि वो रूही को कुछ और कहती ,तब वो बोली -  न..न.. जोर से मत बोलो ! बाहर अभी रिश्तेदार आये हुए हैं। मम्मी -पापा भी हैं ,कहीं उन्हें पता न चल जाये ,दोनों बहनें  आपस में लड़ रही हैं।

बहनें ,'माय फुट ' तुम क्या समझती हो ?मैं तुम्हें बहन मानती हूँ। तुम मेरी बहन कैसे हो सकती हो ? न ही खून का रिश्ता है ,न ही रिश्तेदार हो। मौसाजी ! न जाने तुम्हें कहाँ से उठाकर ले आये ?और ज़बरन ही हमारे बीच घुस गयीं, किन्तु इतना समझ लो ! यदि अब तुमने कुछ भी गलत हरक़त की तो छोडूंगी नहीं,तुम्हारा सम्पूर्ण इतिहास इन लोगों को बता दूंगी आक्रोश में पार्वती ने कहा।   

 क्या, तुम मुझे धमकी दे  रही हो ? कहीं ऐसा तो नहीं, इस हवेली में प्रवेश करने का तुम्हारा ही तो कोई षड्यंत्र नहीं था , मुझसे दो हत्याएं करवा दीं और अब स्वयं सुमित के माध्यम से इस हवेली में प्रवेश करना चाहती हो, सुमित से विवाह करके इस हवेली की मालकिन बनना चाहती हो और मुझे धमकी देकर मेरा मुँह बंद करना चाहती हो।  

तुम, कुछ भी समझ सकती हो, वैसे उस समय मैं, तुम्हारी सहायता करना चाहती थी क्योंकि मैं चाहती थी किसी तरह तुम मौसा -मौसी की कोठी छोड़कर वहां से चली जाओ !अब तक वे मुझे ही अपनी बेटी मानते आये थे। मैं सोचती थी, मेरे मौसी और मौसा जी मुझे क़ानूनी तौर पर भी अपना लेंगे और मैं उस कोठी की मालकिन बन जाऊंगी, उनकी अकेली संतान मैं ही रहूंगी। अब तक ऐसा ही होता आया ,वे मुझे ही अपनी बेटी मानते थे  किंतु जबसे तुम ,वहां आ गईं, तुमने मेरा हिस्सा बांट लिया,प्यार ही नहीं ,सम्पत्ति में भी उन्होंने तुम्हें अपना वारिस बना दिया। तुमने सब अपने नाम करवा लिया। 

इस बात की जानकारी तो स्वयं रूही को भी नहीं थी ,उसने पार्वती के दर्द को महसूस किया और बोली -यह तुम क्या कह रही हो ? मैंने ऐसा कुछ नहीं किया है।मैं तो वैसे ही इन लोगों की सताई अपनी ही परेशानी में थी। मुझे डॉक्टर साहब की सम्पत्ति का भी कोई लालच नहीं है।   

तुम तो जैसे बहुत सीधी हो, तुम कुछ करती ही ,कहां हो ? तुमने कुछ किया भी नहीं मौसा और  मौसी जी ने  तुम्हें अपनी संपत्ति का अधिकारी भी बना दिया, तुम उनकी बेटी भी बन गई और अब यहां पर सबको मा रकर सम्पूर्ण  संपत्ति को अकेली  हड़प लेना चाहती हो ,तुम्हें कोई लालच नहीं है ,सबकुछ बिना मांगे ही तुम्हारी झोली में जो आ गिरता है।  

देखो ! मेरा ऐसा कोई भी इरादा नहीं है, अनजान बनते हुए रूही ने कहा।

 जब इस परिवार में कोई भी वारिस ही नहीं रहेगा तब उस संपत्ति का मालिक कौन होगा ? उन सब की विधवा ! यानि तुम ! हर जगह सहानुभूति पाकर तुम बेचारी बन जाती हो ,किंतु अब मैं यह सब नहीं होने दूंगी ,लाओ मुझे वह, पाउडर वापस कर दो ! और अब इस हवेली में कोई हत्या नहीं होगी। कुछ दिनों के पश्चात सुमित स्वयं ही अपने घर वालों से, मुझसे विवाह की बात करने वाला है।तुम्हें गर्वित के साथ क्या करना है ?तुम्हारी, तुम जानो ! अब तो इनके परिवार की कोई ऐसी रस्म भी नहीं हो पाएगी। तुम उस गर्वित की पत्नी हो और मैं सुमित की बनना चाहती हूँ ,बस, बात यहीं पर खत्म होती है। संपूर्ण संपत्ति के हम दो ही अधिकारी होंगे।

तुमने मुझसे हत्याएं करवाईं ,यदि तुम्हें विवाह करके इस हवेली में आना ही था ,तब ये सब स्वांग क्यों ? पहले ही आ जातीं। 

तुम कुछ ज्यादा ही सोचने लगी हो, किन्तु तुम्हें बता ही देती हूँ ,यदि मैं यहाँ आती तो मुझे भी उन रस्मों का हिस्सा बनना पड़ जाता ,इससे पहले मुझे सुमित भी कहाँ मिला था ?

तभी बाहर से मिसेज तारा जी की आवाज आई दोनों बहनें क्या कर रही हो ?अभी तक तुम्हारी बातें समाप्त नहीं हुईं ,बेटा ,पारो !हमें वापस घर भी तो जाना है। 

मौसी जी !अभी आई ,कहकर पार्वती ने रूही से कहा -देखो !सच्चाई क्या है ?तुम भी जानती हो और मैं भी.... अब इस सच्चाई को यहीं दबा देते हैं ,तुम्हें तो हवेली का कोई लालच ही नहीं है किन्तु मुझे तो इसके सुख भोगने हैं। अभी मैं जाती हूँ ,एकांत में बैठकर सोचना ,मान लो !तुमने दो हत्याएं और कर भी दीं तो इस सबसे क्या हासिल होगा ?कहकर वो कमरे से बाहर आ गयी।  

मन ही मन रूही सोच रही थी ,इसका अर्थ है, तुमने, मेरे माध्यम से अपना रास्ता साफ कर लिया , यह सोचकर रूही को बहुत दुःख हुआ ,जिस पर भी मैंने विश्वास किया ,उसने ही धोखा दिया। और अब वो  पार्वती की सच्चाई जानती है। उसने एक गहरी स्वांस ली और अपनी आँखें मूंदकर पलंग के सिरहाने पर सिर टिकाकर बैठ गयी। वो सोच रही थी ,मेरी ज़िंदगी कहाँ से कहाँ जा रही है ?उसने सच ही तो कहा -अब तो मैं भी अपराधी हो गयी ,तो क्या मैं अपने अपराधियों को क्षमा कर देती ? इस तरह तो अपराध और बढ़ते रहेंगे। जब तक अपराधियों को उनके किये की सज़ा न मिलेगी ,उनका तो हौसला और बढ़ जायेगा। 

क्या सोच रही हो ?कमरे के अंदर प्रवेश करते हुए गर्वित ने पूछा। 

रूही ने अपनी आँखें खोलीं ,एक नजर गर्वित की तरफ देखा और बोली -कुछ भी तो नहीं ,तुम बहुत दिनों पश्चात आये ,कहाँ चले गए थे ?

अपने किये गए ,पापों का प्रायश्चित करने गया था ,रूही ने उसकी तरफ देखा किन्तु आज उसे गर्वित एकदम शांत नज़र आ रहा था। जैसे उसका जीवन ठहर सा गया है ,गर्वित उसके समीप आकर पूछता है -तुम तो ठीक हो ,किसी ने कुछ कहा तो नहीं ,ख़ैर !कोई कहेगा भी कैसे ? अपने पापों को जो पाल रहे थे। कुछ ज्यादा ही भार बढ़ गया। आज गर्वित को देखकर ,रूही को लगा ,ये पहले वाला गर्वित नहीं रहा ,बेहद शांत और गम्भीर जो हो गया है। 

  

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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