पंडित जी के घर के सामने पहुंचकर ,उन्होंने उन्हें आवाज़ लगाई - क्या पंडित दीनानाथ जी घर में हैं ?
कौन है ? भाई ! आ रहे हैं, अंदर से आवाज आई। कुछ ही देर में, रेशमी , बादामी रंग के धोती- कुर्ता में एक पंडित जी उनके सामने उपस्थित हुए , उन्हें देखकर , ताराचंद जी भी उन्हें पहचान गए किंतु बोले कुछ नहीं।
अब रामेश्वर ने कहा - पंडित जी !ये बहुत दूर से आए हैं, और आपसे मिलना चाहते हैं।
बताइए !आपकी क्या समस्या है ? आप मुझसे क्या सहायता चाहते हैं ? पंडित जी को , ताराचंद को देखकर इसलिए आश्चर्य हो रहा था कि क्या इन्हें इसी गांव में ही, किसी पंडित से मिलना था। इससे पहले भी और भी कहीं, इन्हें पंडित मिल सकते थे किंतु उन्होंने अपनी जिज्ञासा को, शांत रखा।
तब रामेश्वर बोला -तुम, अपनी समस्या पंडित जी को बता सकते हो।
पंडित जी दरअसल बात यह है, कि मेरा एक बेटा है ,तुषार ! लगभग 6 महीना से वह परेशान है, उसे रात्रि में डरावने सपने आते हैं। कोई गांव आता है ,कोई जंगल नजर आता है और वह डर जाता है।
जंगल और गांव में ऐसी डरने वाली, क्या बात है ? यह तो सामान्य सी बात है , पंडित जी ने अपनी बात कही।
पंडित जी ! यह सामान्य बात नहीं है ,उसे यह सपना बार -बार आता है। उसे न जाने, कहां से चिट्ठी भी आती है, उस चिट्ठी पर नाम और पता कुछ लिखा नहीं होता और कोई है, जो उससे सहायता मांगता है , वह अपनी मुक्ति चाहता है, कुछ समझ नहीं आ रहा, कि मेरे बेटे के साथ ऐसा क्यों हो रहा है ?
पंडित जी ने उन दोनों की तरफ देखा और ताराचंद जी से पूछा -आपके पुत्र का क्या नाम है ?
तुषार ! फिर उन्होंने अपना पंचांग खोला, तुषार की, उम्र की गणना की , उंगलियों पर कुछ हिसाब लगाते रहे,कुछ समय पश्चात, उनका चेहरा गंभीर हो गया। तब वह बोले - बहुत ही कठिन यात्रा है।
किसकी ? अचानक ही रामेश्वर ने पूछा।
इस बच्चे की, इसे किसी पिशाच को मुक्ति दिलानी है।
हां हां, वहां हमारे पंडित जी ने भी यही बात कही थी , आखिर ये ' पिशाच' कौन है ? जिसे मुक्ति दिलानी है यही तो समझ नहीं आ रहा है।
पंडित जी मुस्कुराए और बोले - आप पंडित जी का घर खोलने का समय आ गया है।
क्या मतलब ? दोनों ने आश्चर्य से उनकी तरफ देखा।
सब मालूम पड़ जाएगा, मुझे कुछ अनुष्ठान करना होगा और पंडित अलोपी चंद जी के घर के द्वार खोलने होंगे।
पंडित जी ! क्या गांव के लोग कुछ नहीं कहेंगे , सहमते हुए रामेश्वर ने पूछा।
नहीं, क्योंकि उनके परिवार के लोगों के सामने ही, उस घर को खोला जाएगा ?
उनकी बात सुनकर रामेश्वर और ताराचंद दोनों एक दूसरे को देखने लगे , पूजा के अनुष्ठान के लिए कुछ सामान ले आओ ! उन्होंने ताराचंद जी की तरफ देखकर कहा। अब यह पूजा कल प्रातः काल ही आरंभ होगी , तो क्या पंडित जी रात्रि में हमें यही ठहरना होगा ?
हां, जिस कार्य के लिए आए हो, वह कार्य पूर्ण करके ही जाना होगा, उन्होंने जवाब दिया ,साथ ही प्रश्न किया कार्य पूर्ण करना चाहते हो या नहीं ? तुम पंडित जी के बड़े बेटे हो ना.... ताराचंद के चेहरे पर नज़रें गड़ाते हुए पंडित जी ने मुस्कुरा कर पूछा।
ताराचंद ने अपनी नज़रें झुका लीं और बोले -पंडित जी ! आप तो सब जानते हैं, अब मैं आपसे क्या कहूं ?
मैं जानता था, एक न एक दिन तुम जरूर आओगे, स्वयं नहीं आए तो मजबूरी तुम्हें की खींच लाई। कल के लिए पूजा की व्यवस्था करना और सबसे पहले, अपने बेटे को ही, उसे पूजा में शामिल करना उसका जन्म भी इसी उद्देश्य से हुआ है।
तभी, ताराचंद जी को शहर वाले पंडित जी की बात स्मरण हो आई, और पूछा- पंडित जी ! क्या यह सभी अनुष्ठान आप अकेले ही कर लेंगे।
नहीं, मुझे कुछ पंडित और बुलवाने होंगे, बहुत बड़ी शक्ति से जो लड़ना है। वैसे वह शक्ति अब लड़ाई नहीं चाहती, वह पश्चाताप कर रही है।
अगले दिन, सभी सामान और पांच -छह पंडितों को लेकर पंडित जी भी पंडित अलोपी चंद जी के घर के दरवाजे पर एकत्रित हो गए।
यह कैसा अनुष्ठान हो रहा है ? यह देखने के लिए गांव के अन्य लोग भी वहां पर इकट्ठा हो गए। पंडित जी के घर का द्वार खोला जा रहा है, जो इतने वर्षों से बंद है। धीरे-धीरे गांव के सभी लोगों को पता चल गया था कि पंडित जी का बड़ा बेटा, गांव में आ चुका है। उस अनुष्ठान को करते हुए ,उन्हें लगभग आधा घंटा हो गया था। उसके पश्चात, मुख्य द्वार खोला गया। मुख्य द्वार खोलते ही, सभी पीछे हट गए। एक अजीब सी गंध थी, जो वहां के वातावरण में फैली हुई थी। धूल, मिटटी , गंदगी सब जमा था। पंडित जी अपनी धूनी रमाते हुए आगे बढ़ रहे थे और दूसरे पंडित गंगाजल को छिड़कते हुए उनके पीछे आ रहे थे। धीरे-धीरे उस मकान में वे आगे बढ़ने लगे। तब पंडित जी ने तुषार को आगे किया गया, अभी तक वो पीछे ही था , शायद यह सब देखकर, वह डर न जाये किंतु वह आश्चर्यचकित होकर उस घर को, चारों तरफ से देख रहा था।
यह कैसा हो गया है ? अचानक ही तुषार बोला और आगे बढ़ चला। बढ़ते हुए वे मकान के पिछले हिस्से में भी गए ,तब तुषार कुएं के समीप जाकर बोला -अब इसकी मुक्ति का समय आ गया है , पंडित जी यहीं अनुष्ठान करवाइए ! तुषार ऐसे बोल रहा था, जैसे कोई बड़ा व्यक्ति उन्हें आदेश दे रहा है।
जी, पंडित जी भी उनका कहना ऐसे मान रहे थे, जैसे वे जानते हैं कि तुषार कौन है ? इस समय तुषार अपने आपे में नहीं था, वह कुछ और ही बन चुका था। आश्चर्य से, अन्य सभी लोग भी देख रहे थे, वह किस तरह से पूजा पाठ और अन्य कार्यों में अपना सहयोग कर रहा है ? इस कुएं के पास यहीं पर धूनी रमाकर, सभी पूजा करने वहां बैठ गए। अचानक ही भीड़ में से एक व्यक्ति बोला -मैं इस कुएं से मुक्त होना चाहता हूं, इस योनि से नहीं और वह आदमी झूमने लगा।
तभी तुषार बोला -जीवन भर पाप किया ,अभी भी तुम्हें अकल नहीं आई।
मैं, स्वतंत्र रहना चाहता हूँ।
तू तो पहले भी स्वतंत्र था ,तुझे किसने रोका था ? तुषार ने कठोर शब्दों में जबाब दिया और गांव के पंडित जी को उसे मंत्रों में बांधने का आदेश दिया और पंडित जी भी तुरंत ही काम पर लग गये।
मुझे छोड़ दो !मुझे जाने दो ! वह व्यक्ति चिल्लाया।
इतने दिनों से मुक्ति मांग रहा था और अब मैं आया हूँ, तो फिर से अपनी हरकतों पर आ गया ,यदि तू आसानी से नहीं मानेगा ,तो अब तुझे वो दंड मिलेगा तू सोच भी नहीं पायेगा।
