Qabr ki chitthiyan [part 79]

 मां के देहांत के पश्चात, वह उन चार महिलाओं को लेकर घर में आ गया। उसके पास बहुत पैसा था, उसने उनसे विवाह तो नहीं किया था, किंतु वह उसकी पत्नी की तरह रहने लगी थीं। रात दिन उसकी सेवा करतीं। कोई नृत्य करके उसे खुश करती कोई भोजन बनाकर उसे प्रसन्न करती तो कोई उसको शयन कक्ष में प्रसन्न करती। इस तरह से चारों, उसके धन के लालच में, उसके साथ रह रही थीं। गांव के लोगों ने कहा कि उसका इस तरह बिन विवाह के, गांव में रहना उचित नहीं है या तो वह इन लड़कियों से विवाह कर ले। या फिर यह गांव छोड़कर वह चला जाए , इस तरह उसे गांव में नहीं रहने देंगे किंतु वह इतना क्रूर था , उसके सामने आने का किसी का साहस भी नहीं होता था।


एक दिन अचानक न जाने क्या हुआ ? उसके घर का दरवाजा बंद हो गया और खुला ही नहीं , आस -पड़ोस के लोगों ने देखा, उसके घर के दरवाजे बंद थे, न ही कोई वहां से आवाज आ रही थी। मन ही मन उन्होंने सोचा - उचित ही है, ब्राह्मण परिवार का होकर भी, इसने यहां पर गंदगी मचाई हुई है, अच्छा ही है, इसके द्वार बंद ही रहें किंतु यह एक-दो दिन की बात नहीं थी बल्कि उसके घर के द्वार को बंद हुए एक सप्ताह हो गया।

 अब लोगों ने सोचा -शायद वो , इस घर को छोड़कर कहीं चला तो नहीं गया है क्योंकि उसकी कोई भी स्त्री वहां पर दिखलाई नहीं दे रही थी, न ही, उसके घर से कोई आवाज आ रही थी। धीरे-धीरे लोग, उसके न रहने पर शांत रहने लगे और मन ही मन खुश थे। अच्छा हुआ, वह गांव छोड़कर चला गया। वैसे किसी से  कुछ भी कहकर या बात करके नहीं गया था। बात करके भी किससे जाता ? जो उसके अपने थे, वो  तो रहे नहीं, आस - पड़ोस से उसने कभी नाता ही नहीं रखा था।

 दिन ,महीने में बीते और महीने, साल में, इस तरह कई साल बीत गए , उसका कोई पता नहीं चला न ही ,किसी ने जानने का प्रयास किया, किंतु अब तुम्हारे घर से, रातों को डरावनी- डरावनी आवाजें आने लगीं। लोगों ने समझा, यह घर बरसों से खाली पड़ा है, ऐसे घर में भूतों का वास हो जाता है।भय के कारण उस घर को खोलकर देखना भी नहीं चाहते थे, दिन -प्रतिदिन घर गंदा हो रहा था।

 क्या दिन आ गए थे ? जिस ब्राह्मण के घर में, बिना नहाए ,बिना सफाई के कभी भोजन नहीं पकता था , आज वहां पर धूल लौट रही थी, जिस आंगन में, ब्राह्मण -संत भोजन करते थे,मंत्र उच्चारण होते थे , वह रसोई आज बिखरी पड़ी थी, यह समय का ही खेल तो है। 

फिर क्या लोगों ने यह जानने का प्रयास भी नहीं किया , कि इस घर में से ऐसी आवाज़ें क्यों आ रही है ?

कौन'' ओखली में सर देता''? भाभी जी ! बलराज को पता चल जाता , तो वैसे ही नहीं छोड़ना, और फिर कोई किसी के घर क्यों जाना चाहेगा ? किसी को कोई लालच थोड़े ही था  किंतु अब रातों को लोग डरने लगे थे, किसी कभी किसी के रोने की आवाज आती है ,कभी किसी के चीखने - चिल्लाने की आवाज आती। अड़ोसी- पड़ोसी अब घबराने लगे थे और फिर धीरे-धीरे सभी, अपने-अपने घर छोड़कर दूसरी जगह रहने चले गए। इसीलिए यह गली आज भी सुनसान पड़ी है ,मेरा घर यहां से पांचवें नंबर पर आता है मुझे इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ा और ना ही, मुझे कोई आवाज सुनाई दी , इसलिए मैं अभी तक यहां पर रह रहा हूं। 

हमें तो यह घर खोलना ही होगा, तभी तो पता चलेगा कि आखिर भाई कहां गया ? और घर खाली पड़ा है तो इसकी साफ- सफाई भी करवानी होगी। 

वो तो आपकी बात ठीक है, लेकिन यह बरसों से बंद पड़ा है इसलिए इसे खुलवाने से पहले, किसी बड़े से या किसी समझदार से परामर्श ले लेना चाहिए। 

तभी तो मैं आपसे पूछ रहा था, किसी पंडित जी का घर बताइए ! जो हमें यह सब समझा सके, बता सके कैसे और कब इस घर को खोलना है ?

वहां बैठा, तुषार यह सब बातें सुन रहा था किसी का ध्यान भी उसकी तरफ नहीं था , अचानक ही तुषार बोला -मैं आ गया हूं न.... यह घर भी खुलेगा और सभी कार्य होंगे, और मुक्ति भी होगी। 

यह तू, किसकी बात कर रहा है ? ताराचंद जी ने पूछा। 

क्या तुम जानते नहीं हो ? हम यहां किस लिए आए हैं ? हमारा उद्देश्य पूर्ण होगा ? मुक्ति होगी। तुषार सामने बैठा हुआ था, किंतु वह सामने की दीवार की तरफ देख रहा था जैसे सामने की दीवार पर कोई, उसे दिख रहा है या उससे बातें कर रहा है। वह तो जैसे दीवार के पार ही, कहीं गहराई में देख रहा था। 

घबराकर शारदा जी ने तुषार को हिलाया, और उसे पुकारा - तुषार ! तुषार ! अपने आप में आया और बोला -आप लोग क्या कह रहे थे ? अब हम कहां जाएंगे और हमें क्या करना है ? रामेश्वर ने देखा, अवश्य ही इसके सामने कोई शक्ति है, जो इसे अपनी तरफ खींचती है और यह उससे बातें करता है। इससे पहले की बात और बिगड़े , तब वह ताराचंद जी से कहता है - आओ चलो ! पंडित दीनानाथ जी के यहां जाते हैं। 

रामेश्वर और ताराचंद जी पंडित जी के घर की तरफ प्रस्थान करते हैं, तब रास्ते में ताराचंद जी,रामेश्वर से कहते हैं -  इस स्थिति में ,बेटे को लगभग 6 महीने से ऊपर हो गए हैं , कुछ समझ नहीं आ रहा, कोई चिट्ठी देकर जाता है, उसमें अपनी सहायता, अपनी मुक्ति के लिए प्रार्थना करता है। कभी इसे सपने आते हैं जिनमें यह डर जाता है। अभी हमारे गांव के जंगल को देखकर कह रहा था -यही वह जगह है , यही  तो मुझे सपने में दिखाई देती है। गांव के बाहर जो पीपल का पेड़ है, उसे भी देखते ही पहचान गया। इसका मतलब कोई इसे यहां की तरफ खींच रहा था। अब वह कौन है ?यह तो जानना होगा , जहां तक मुझे लगता है, कहीं हमारे पिता ही तो नहीं हैं  जो तुषार से कोई अधूरा कार्य करवाना चाहते हैं। 

अब यह तो पंडित जी के पास जाने पर ही पता चलेगा,रामेश्वर बोला। 

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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