तेरे सभी सवालों का जबाब तुझे मिलेगा ,पहले तू ये बता, इतने दिनों से कहाँ था ? क्या कर रहा था ? इतने वर्षों से तुझे एक बार भी, अपने घर की याद नहीं आई। घर की बात तो छोड़ो ! क्या तुझे अपने पिता की याद भी नहीं आई। जब उनका अंतिम समय आ रहा था, बेचारे !तुझे बहुत याद कर रहे थे,तुझे याद करके रोते थे तुझे याद करते हुए, उनके प्राण निकले हैं ,रामेश्वर उसे एहसास दिलाना चाहता था कि उसने घर छोड़कर कितनी बड़ी गलती की थी।
अपने पिता की बात सुनकर ताराचंद जी को बहुत दुख हुआ ,उनकी आँखें नम हो आईं ,तब वे बोले -मैं यह सोच रहा था, उनके पास तो एक बेटा है, ही , मेरी इस गांव में बदनामी हो चुकी थी , तू तो जानता ही है, तेरे सामने ही तो सब कुछ हुआ था इसलिए मुझे यहां आना उचित नहीं लगा।
मैं सब जानता हूं, तूने कुछ भी नहीं किया था, वह तो सब बलराज का किया- धरा था और उसमें तेरी मौसी भी शामिल थी। यह तो मैं भी जानता हूं,कि वो कारस्तानी दोनों माँ -बेटे की थी , किंतु उस समय मेरे पास कोई सबूत भी नहीं था, मैं भी क्या करता ? चुपचाप सहन करके चला गया।
तू ,उससे लड़ भी तो नहीं सकता था, वह तुझसे कहीं अधिक बलशाली था, ऐसे समय में उसने, अपने गुंडे दोस्तों की फौज भी इकट्ठा कर रखी थी, तू उसका कुछ भी नहीं बिगाड़ सकता था।'' बुराई में बहुत ताकत होती है ,ये कलयुग है ,अच्छाई को बाहर आने में ही, बहुत समय लग जाता है ,तब तक तो जैसे जीवन या तो तहस -नहस हो जाता है ,या फिर बहुत कुछ बदल जाता है।'
यह बात तो मैं, जानता हूं इसी कारण मैं अपने पिता से मिलने न आ सका सोचा-' वे मेरे विरुद्ध कोई न कोई और षड्यंत्र रच देंगे। वैसे मेरी बेगुनाही का मेरे बाद में कैसे पता चला ?
तुझे मैं बचपन से देखता आ रहा हूं, हम साथ में पढे और बड़े हुए हैं, तो क्या मैं इतना भी नहीं समझ पाऊंगा ? वैसे मुझे बाद में पता चल गया था, वह लड़की बलराज ने ही बुलाई थी।
मेरी समझ में कुछ भी नहीं आ रहा है , आखिर वे लोग, चाहते क्या थे ?
इसमें न समझने वाली कोई बात ही नहीं है, तुझे बेइज्जत करके गांव से निकालना चाहते थे और वे अपने मकसद में कामयाब रहे। अब तू भोजन कर ले, फिर मैं, तेरी आगे की बातें सुनूँगा।
यार ! एक बात पूछनी थी ,यहां कोई पंडित मिल जाएंगा ?
तुम तो स्वयं पंडित के परिवार से हो, फिर किसी और पंडित की क्या आवश्यकता पड़ गई ?
पंडित परिवार से तो हूँ , किंतु जो कुछ भी मैंने अध्ययन किया था, वह मुझे ज्ञात तो है, किंतु यह विषय कुछ अलग ही है और उसे भी छोड़े हुए, बरसों हो गए। क्या तुम्हें पता है, अब बलराज कहां गया है ,उसका क्या हुआ ?सब कहां चले गए ? घर ऐसे ही सुनसान क्यों पड़ा है ? मुझे तो लगता है, आसपास के लोग भी यहां नहीं रह रहे।
हां, बहुत लंबी कहानी है , उसके बारे में भी बताऊंगा। चलो !वापस चलते हैं, घर वापस आकर, सबने एक साथ भोजन किया।
शारदा जी और उनका बेटा तुषार ! बोले- हमें गांव घूमने जाना है, क्या हम गांव में घूम सकते हैं ?
वो सोच रहे थे, कि इस बहाने से पिता के परिवार और उनके घर को भी देख लेंगे किंतु अब छुपाने वाली कोई बात ही नहीं रह गई थी। तब ताराचंद जी बोले -हमारा घर पास में ही है किंतु हम वहां नहीं जा सकते।
क्यों ? वहां क्या हुआ ?
वह तो बरसों से बंद पड़ा हुआ है अब वहां कोई नहीं रहता।
सब लोग कहां चले गए ? तुषार ने पूछा।
तुम्हारे दादाजी और दादी अब इस दुनिया में नहीं रहे , और जो मेरा भाई रहता था वह भी न जाने कहां चला गया है ?
अब हम क्या करेंगे ? चिंतित स्वर में, शारदा जी ने पूछा।
जो करने के लिए आए हैं, वह कार्य तो करेंगे ही, इसमें हमारी सहायता, मेरा यह दोस्त रामेश्वर करेगा।
शारदा ने , रामेश्वर की तरफ देखा और उससे पूछा - क्या आप इनको पहचान गए ?
हां भाभी जी ! मैं तो आते ही इसको पहचान गया था ,अपने घर में वापस कौन आएगा ?उस घर का वारिस ! उस घर की औलाद ही आ सकता है, मजबूरी में ही सही, किंतु आये तो हो। न जाने, नियति तुमसे क्या करवाना चाहती है ?
तब यहां पर कोई पंडित मिलेगा ?शारदा ने भी वही प्रश्न किया।
पंडित तो यहां है, उनसे बात भी करनी होगी, क्योंकि आप लोगों के उस घर में और उसके आसपास अब कोई नहीं रहता।
क्यों ?ऐसा क्या हो गया, शारदा और ताराचंद जी ने एक साथ पूछा।
जब पंडित जी का देहांत हो गया, उससे पहले ही बलराज बहुत ही, अत्याचारी हो गया था, छोटी-छोटी बातों पर लड़ना -झगड़ना कुश्ती करना, इसका एक समूह था जिसमें आठ -दस लड़के थे, जो सभी कमजोर लोगों को सताते थे, पंडित जी के पास पैसा बहुत था, तुम तो यहां थे, नहीं , अब उस सम्पूर्ण धन -संपत्ति का अधिकारी बलराज ही हो गया था। उसकी मां उसको हमेशा बढ़ावा देती रहती थी लेकिन अब वह मां की भी नहीं सुनता था। पैसा इतना अधिक था और उस सब का उत्तराधिकारी वही हो गया था, जिसके कारण वह नशा भी करने लगा था और वेश्यावृति भी करने लगा था। उस धन को लुटा रहा था। पंडित जी ! कहां तो एक संतान के लिए परेशान थे ,अब दो-दो संतानें हो गई थीं , तब भी उस संपत्ति का कोई सही वारिस उन्हें नहीं मिला था। एक उस संपत्ति को त्याग कर चला गया और दूसरा दोनों हाथों से उसे बर्बाद कर रहा था। यह दुख , दिन- प्रतिदिन उन्हें कमजोर करता जा रहा था।
जब उसकी मां ने उसे रोकना चाहा, तब उसने अपनी मां पर भी हाथ उठा दिया। वह यह तो चाहती थी कि मेरा बेटा, इस धन संपत्ति का अधिकारी हो किंतु यह नहीं चाहती थी कि वह बुरी आदतों में व्यसनों में पड़ जाए। जब वो, उसे समझाने लगीं और रोकने लगीं , तब उसने अपनी मां पर भी हाथ उठा दिया। तब उन्हें एहसास हुआ कि उन्होंने, तेरे साथ बदसलूकी करके कितना बड़ा अपराध किया है ?
तब उन्होंने सोचा, क्यों न इसका विवाह कर दिया जाए ? लेकिन ऐसे लड़के को कोई भी अपनी लड़की देने के लिए तैयार नहीं था। जो वेश्यावृत्ति में लिप्त हो और नशा करता हो। उनका बेटा बलराज अब बेकाबू हो चुका था। वेश्यावृत्ति में इतना लिप्त हो गया था , इस गुस्से से वह दूसरे गांव से न जाने कहां से ? तीन -चार महिलाएं लेकर घर में आ गया।
क्या मौसी जी ने उसे कुछ नहीं कहा ? शारदा ने पूछा।
वह क्या कहतीं बीमार रहने लगी थी , अब उनके शरीर से कुछ भी कार्य नहीं होता था। कोई पड़ोस का आकर उन्हें भोजन दे जाता तो खा लेती थीं वरना भूखी पड़ी रहती थीं। बेटा, रात- दिन घर से बाहर रहता, उसे न ही, अपनी सुध थी और न ही, अपनी मां की और इसी के चलते एक दिन उनकी मृत्यु हो गई।
