अपने गांव पहुंचने पर, जब ताराचंद जी ''पंडित अलोपीचंद जी'' के, घर के विषय में जानना चाहते हैं, तो वहां बैठे लोग, चुप हो जाते हैं। शायद वे उस परिवार के विषय में, कुछ बताना नहीं चाहते थे। या उसके विषय में बात ही नहीं करना चाहते थे। ताराचंद जी अभी असमंजस में ही खड़े थे कि किससे, अपने परिवार के विषय में पूछा जाए ?
तभी एक लड़का, आकर उनसे पूछता है - क्या आप यह नहीं जानते हैं , कि पंडित अलोपी चंद्र जी अब इस दुनिया में नहीं हैं।
जी नहीं ,तुम कौन हो ? क्या इसी गांव के रहने वाले हो ? ताराचंद जी उस लड़के को पहचानने का प्रयास करते हुए पूछते हैं।
जी हाँ , मैं इसी गांव का रहने वाला हूं , पंडित जी से ,चार घर दूर मेरा घर है।
तब मन ही मन, ताराचंद जी ने अंदाजा लगाया , हो सकता है, यह रामेश्वर का बेटा हो , किंतु उन्होंने इस विषय में उस लड़के से कुछ नहीं कहा और बोले -यह बात में बिल्कुल नहीं जानता, किंतु उनके परिवार में और लोग तो होंगे।
हां, उनके दो बेटे थे ?
क्या मतलब ? अब नहीं हैं।
उनका एक बेटा तो बरसों पहले गांव छोड़कर भाग गया था और दूसरा न जाने कहां गायब हो गया है ? अब उनकी हवेली में कोई नहीं रहता , और न ही, उधर कोई जाता है। उस घर को देखकर लगता है, जैसे वहां पर भूतों का वास है।
ताराचंद जी को ,उसके मुख से अपनी पत्नी और अपने बेटे के सामने ,उसका यह कहना कि उनका एक बेटा भाग गया, अच्छा नहीं लगा किन्तु शांत रहकर उन्होंने पूछा - उनकी पत्नी ! ताराचंद जी ने जानना चाहा , वह भी न जाने, कबकी मर खप गई ?
नहीं, उनकी दूसरी पत्नी उन्होंने जानना चाहा।
लड़के ने उन्हें बड़े गौर से देखा और पूछा -उनके परिवार के विषय में बहुत कुछ जानते हो , सबको गहरी नजरों से ताड़ते हुए पूछा - तुम लोग कहां से आए हो ?
अभी तो बताया ,हम उनके दूर के रिश्तेदार हैं किंतु बरसों से, उनकी ना कोई चिट्ठी न फोन इसीलिए आज बच्चों को लेकर सीधे उनसे मिलने चला आया। तुम्हारा नाम क्या है ?
मेरा नाम 'नंदकिशोर' है, एक बात कहे देता हूं, आपका यहां आना व्यर्थ ही रहा ,उनका अब यहां कोई नहीं रहता, जैसे आए हैं ,वैसे ही वापस चले जाइए ! आप उस घर में जा भी नहीं सकते क्योंकि अब लोग कहते हैं ? ऐसे ख़ाली घर में भूत- प्रेत नाचते हैं , वह बरसों से बंद पड़ा है।
ताराचंद जी ने अपनी पत्नी की तरफ देखा, जैसे वह पूछना चाह रहे थे, कि अब क्या किया जाए ? इससे पहले कि वह कुछ कहते ,वो उस लड़के से बोली -बेटा !नंदकिशोर ! यहां कहीं ठहरने की कोई जगह है। हम बहुत दूर से आए हैं ,थके हुए हैं। हमें यह सब मालूम नहीं था।
शहरों की तरह यहां कोई धर्मशाला या होटल नहीं है, मैं, अपने घर में पूछ कर आता हूं। कहते हुए वह आगे बढ़ गया , तभी तुरंत वापस लौटा और बोला -आप लोग, भी मेरे साथ चलिए ! हो सकता है, घर में जगह न देखकर, वे लोग, कोई और जगह बता दे ! मैं बार-बार चक्कर नहीं काटुंगा। वे लोग, उस लड़के के पीछे-पीछे चल रहे थे। एक बड़े से घर के करीब आकर वे सभी रुक गए। तब वह लड़का बोला -आप लोग यहीं रुकिए ! मैं अंदर बात करके आता हूं। ताराचंद जी समझ गए, यह वही गली है , जिसमें मेरा बचपन बीता है , जब तक वह लड़का आता है, तब तक सोचते हुए ,वो उन चार घरों को छोड़कर ,आगे देखने चले गए किंतु वह गली सुनसान पड़ी थी।वहां पर अजीब सी दहशत छाई थी।
उस लड़के ने आवाज देकर उन्हें बुलाया -आईये ! मेरे पिता से बात कर लीजिए !
ताराचंद जी उसे देखते ही, पहचान गए ,वह रामेश्वर ही था किंतु उससे कुछ नहीं कहा। उसने पूछा -आप पंडित जी के रिश्तेदार हैं , इतने दिनों से कहां थे ? जो आज आए हैं।
उनके विषय में हमें कुछ मालूम नहीं था वरना हम यहां नहीं आते, अनजान बनते हुए ताराचंद जी ने रामेश्वर को जवाब दिया।
आप लोगों ने आने में बहुत देर कर दी, बेचारे बहुत ही परेशान थे, ''दुखी आत्मा'' चल बसे।
अब क्या किया जा सकता है ? क्या एक रात के लिए हम यहां ठहर सकते हैं ? यहां कोई अभी तक धर्मशाला नहीं बनी है, है भी तो वह बहुत बड़ी है ,उसमें बारात ठहरती है ,साफ -सफाई भी नहीं है।मेरे घर में, एक कमरा खाली है, उसमें आप लोग रह सकते हैं। यहां पर ज्यादा सुविधा तो नहीं होगी किंतु यही प्रयास रहेगा कि तुम लोगों को किसी तरह की परेशानी ना हो। वैसे यहां रुक कर अब करेंगे ही क्या ? अब उस परिवार का कोई भी सदस्य यहां नहीं रहता।
हां, मुझे आपके बेटे ने बताया।
फिर आप यहां रुकना क्यों चाहते हैं? वह बार-बार ताराचंद जी पर अपनी नज़रें गड़ा देता, ताराचंद जी को डर था, कहीं यह मुझे पहचान न जाए। तब उसने शारदा जी और तुषार से कहा -बेटा !आराम से बैठो ! तुम्हारे लिए खाने का प्रबंध किया गया है। मैं तुम्हारे पिता को, अलोपीचंद जी का, घर दिखाकर लाता हूं।
ताराचंद जी मन ही मन सोच रहे थे, अब जाकर क्या होगा ? वहां पर तो कोई भी तो नहीं है , फिर भी वे , रामेश्वर के साथ उठकर चल दिए। घर से बाहर निकले ही थे , तभी रामेश्वर बोला -क्या तुझे एक बार भी अपने पिता की याद नहीं आई ? तू कहाँ रह गया था ?एक बार तो आकर देख लेता ,मरते -मरते भी तुझे याद कर रहे थे।
ये आप कैसी बातें कर रहे हैं ?तब भी ताराचंद जी ने अनजान बनने का प्रयास किया।
तू किसकी आंखों में धूल झोंक रहा है ? तेरे बच्चे तेरे साथ थे, इसलिए मैंने तुझे न पहचानने का अभिनय किया। तू क्या समझता है, मैं, तुझे भूल गया। मैं तुझे पहचान तभी गया था ताराचंद !
ताराचंद जी ने रामेश्वर की तरफ देखा और बोले -रामेश्वर ! क्या तूने मुझे पहचान लिया। तेरा पड़ोसी होने के साथ-साथ , तेरे बालपन का दोस्त भी तो हूं , क्या तुझे नहीं पहचानूँगा ?आ गले लग जा !कहकर उन्होंने उसे कसकर बाजुओं में भर लिया।
यदि तूने मुझे पहचान ही लिया था तो फिर न पहचानने का अभिनय क्यों किया ?
क्या करता ? अभी मैं नहीं चाहता हूं कि गांव वालों को इस बात की खबर हो, पहले मैं यह जानना चाहता हूं तू इतने वर्षों के बाद, यहां कैसे आया ?
यह घर ही मुझे खींच लाया है।
क्या मतलब ?
मेरा बेटा, जिसने कभी इस गांव को नहीं देखा , यह गांव उसके सपनों में आता है , कोई है, जिससे मदद चाहता है। उसे चिट्टियां भेजता है। कुछ भी समझ नहीं आ रहा, उसके साथ क्या हो रहा है ? क्या मेरे पिता को मुक्ति नहीं मिली ? क्या उनकी आत्मा भटक रही है ? वह अपनी मुक्ति चाहते हैं। क्या बलराज ने पिता के पूरे संस्कार नहीं किये ? आखिर बलराज कहां गया ? अनेक प्रश्न मेरे मन में उमड़ रहे हैं। उसका परिवार उसके बच्चे सब कहां हैं ?
