बरसों से, ताराचंद जी ने, अपने सीने में एक राज़ छुपाया हुआ था, आज भी मजबूरी में, अपनी पत्नी शारदा जी को बता रहे हैं। आज तक यह बात उन्होंने कभी भी, अपने बच्चों और पत्नी को नहीं बताई थी किंतु आज जब शारदा जी ,अपने बेटे की ख़ातिर उनसे, उनके गांव के विषय में जानना चाहती थी, कि आखिर वह अपने गांव क्यों नहीं जाते हैं और उनके गांव छोड़ने का क्या कारण रहा ?
तब वो बताते हैं -कि सौतेले भाई और सौतेली माँ के षड्यंत्रों के कारण, मुझे वह घर छोड़ना पड़ा। जब मैं पढ़ -लिखकर, वापस अपने घर जाना चाहता था , तब मुझे पता चला कि मेरी 'मां' अब इस दुनिया में नहीं रही। मैं उस दिन बहुत रोया , जब छोटा था, मां बीमार रही और जब माँ स्वस्थ हुई , तब मैं भाई के षड्यंत्रों के कारण माँ से दूर हो गया, और अब मैं मन से मां के पास आना चाहता था, तो अब माँ मुझसे दूर हो गई।
अब पिता भी बीमार रहने लगे थे, परेशान वह भी थे किंतु पिता की मुझे इतनी चिंता नहीं थी। एक मन तो किया कि जाकर, पिता की सेवा करूं फिर सोचा -उनकी पत्नी और उनका एक बेटा और भी तो है या यह भी कह सकते हैं, पिता का मोह ,मुझे उस गांव में खींचकर नहीं ले जा सका। अपने लिए मैं, किसी से क्या उम्मीद रखता इसलिए मैं वापस शहर आ गया। मेरे पास पैसा नहीं था, मैंने छोटा-मोटा काम किया। पढ़ा लिखा था, जैसे-जैसे काम ढूंढता रहा, जिंदगी के अनुभव बढ़ते रहे, अकेला था, इतना कमा लेता था कि मैं अपनी पढ़ाई भी कर सकूं ,तब मेरी अच्छी नौकरी लगी और उसके पश्चात तो तुम मेरे जीवन में आ गई, और मेरा घर बस गया।
तब भी आपने, अपने घर जाने का नहीं सोचा।
किसके लिए जाता ? पिता जिंदा थे , तब ही नहीं गया , अब तो वहां मेरा अपना कहने को तो कोई भी नहीं था। मुझे पता था, बलराज अपनी मनमानी करता होगा। मेरी मौसी भी तो यही चाहती थी, कि वह संपूर्ण धन -संपत्ति की मालकिन बने। जब तक मैं छोटा रहा, तब तक मौसी ने, मुझे बहुत स्नेह दिया। अब तो सोच कर ही लगता है ,हो सकता है, उस घर में ''अपने पैर जमाने का'' उनका यह अपना तरीका हो ,जब उन्होंने सबका विश्वास जीत लिया तब ''अपना रंग दिखाया।''
किंतु अब हमें जाना होगा, यह बात हम विश्वास के साथ तो नहीं कह सकते, कि वह' पिशाच' उस गांव में होगा, या तुम्हारा ही कोई रिश्तेदार होगा लेकिन अपने भ्रम को मिटाने के लिए तो हमें जाना ही होगा क्योंकि पंडित जी भी तभी , सटीक रूप से बता सकते हैं कि किस बुरी आत्मा का प्रभाव, हमारे बच्चे पर पड़ रहा है और वह क्या चाहता है ?
चलो ! चलते हैं, अनिच्छा से पंडित ताराचंद जी ने जाने की अनुमति दे दी। अगले दिन तैयार होकर, वे सभी अपनी गाड़ी में बैठते हैं, और गांव के लिए रवाना हो जाते हैं। मन में अनेक अजीब- अजीब सी शंकाएं उठ रही थीं तभी जैसे, ताराचंद जी को कुछ स्मरण हुआ और उन्होंने पूछा -क्या हमारे साथ पंडित जी नहीं चलेंगे ?
नहीं, उन्होंने कहा है-' यदि यह बात सत्य लगती है, तुम्हें लगता है कि वहीं पर कुछ हुआ है, पहले तो तुम वहीं के किसी पंडित से संपर्क करना और यदि बात नहीं बनती है , तब मुझे फोन कर देना मैं आ जाऊंगा।
हमें कैसे पता चलेगा ? कि वहां कुछ ऐसा भी है।
वह सब पंडित जी ने मुझे समझा दिया है।
गाड़ी चलाते हुए, ताराचंद जी के मन में अनेक विचार आ जा रहे थे। सोच रहे थे - न जाने भाई कैसा होगा ? अब तो उसका परिवार बस गया होगा। मौसी, कैसी होगी ? अभी भी वह अपनी सौतेली मां को मौसी ही कहते थे, अब तो काफी बूढी हो गई होगीं । मुझे पहचान भी पाएंगे या नहीं , तभी मन में विचार आया, यदि किसी ने हमें घर में ही नहीं घुसने दिया तो क्या होगा ? तब हम कहां जाएंगे ? मन में घर जाने की, एक उमंग भी थी और साथ ही एक डर भी समाया हुआ था।
जैसे ही वो लोग ,गांव के नजदीक पहुंचे, दूर एक घना जंगल दिखलाई दिया। उस जंगल को देखते ही, तुषार चहक उठा। यह वही जंगल है।
तुम ऐसा कैसे कह सकते हो, तुम तो यहां पहली बार आए हो ? तुम्हें भ्र्म हुआ होगा क्योंकि ऐसे जंगल तो यहां आस-पास बहुत सारे है, लोगों ने बाग भी लगाए हुए हैं, उसके पिता ने बताया । उनकी बात सुनकर तुषार शांत हो गया।
ताराचंद जी मन ही मन सोच रहे थे -बरसों बीत गए ,आज भी इस गांव की सड़कें वैसे की वैसी ही हैं कहीं कोई तरक्की नहीं हुई है। जंगल, से कुछ दूरी पर एक पगडंडी वाला रास्ता बना हुआ था और एक टूटी -फूटी सड़क भी थी, उस सड़क पर ताराचंद जी ने, अपनी गाड़ी बढ़ा दी। गाड़ी हिलती -डुलती आगे बढ़ रही थी, क्योंकि सड़क पर कहीं गड्ढे थे, तो कहीं मोटे-मोटे पत्थर थे। एक दो आते -जाते लोग उन्हें देख रहे थे, किंतु वे लोग, ताराचंद जी से अनजान थे और ताराचंद जी उन सब से अनजान थे।
पापा !आपका ये गांव कैसा है ? काफी पुराना लगता है , तुषार ने कहा।
किंतु तुम्हारे लिए कोई नई बात नहीं है ? तुम तो यहां कई बार आ चुके हो। तुषार आश्चर्य से अपने पिता को देख रहा था, तब वह मुस्कुरा कर बोले -सपनों में तो यहाँ आए ही हो। उनकी बात का आशय समझ कर, दोनों मां -बेटा हंसने लगे।
तभी गांव के बाहर एक पेड़ देखकर, तुषार चहक उठा - हां, यह वही गांव है। गांव में थोड़ा आगे जाकर ताराचंद जी ने गाड़ी रोक दी। गाड़ी से उतरने से पहले, शारदा जी ने, अपने पर्स में से एक नींबू निकला जो पंडित जी ने उन्हें दिया था और उसे निकालकर उन्होंने उसे जमीन पर रखा । तब उस पर उन्होंने पैर रखा, और आगे बढ़ीं , जैसे ही वो आगे बढ़ीं , वह नींबू काला पड़ गया।
ताराचंद जी ने वह सब देखा, तो पूछा -यह सब तुम क्या कर रही हो ?
तब उन्होंने बताया -कि पंडित जी ने मुझे एक नींबू मंत्र फूंक कर दिया था और कहा था -यदि वह काली शक्ति यहां होगी, तो यह नींबू काला पड़ जाएगा, इसके पश्चात ही, जमीन पर कदम रखना। गांव के लोग उन्हें देख रहे थे। उन्हें लग रहा था, जैसे शहर से कुछ लोग आए हैं।
गांव काफी बदल चुका था, ताराचंद जी को समझ ही नहीं आ रहा था कि उन्हें अब किधर जाना चाहिए ? तब एक पेड़ के नीचे कुछ बुजुर्ग, बैठे हुए हुक्का गुड़गुड़ा रहे थे। ताराचंद जी उनके पास गए और उनसे पूछा -पंडित अलोपीचंद जी का घर किधर है ?
उनकी बात सुनकर, सभी लोग खामोश हो गए, किसी ने कोई जवाब नहीं दिया। कुछ देर पश्चात एक लड़के ने उनके समीप आकर पूछा - पंडित अलोपी चंद जी को आप क्यों पूछ रहे हैं ? क्या आप उनके कोई रिश्तेदार हैं ?
जी,हम बहुत दूर से आए हैं।
