ताराचंद जी बरसों से, अपने हृदय में, एक घाव को छुपाए हुए थे। आज तक उन्होंने शारदा जी से भी, इस विषय में कुछ नहीं कहा था किंतु बेटे की खातिर, वो , आज उन्हें अपनी कहानी बताते हैं -ताराचंद जी एक शालीन, सभ्य ,धनाढ्य परिवार के लड़के थे, उनके पिता अलोपी चंद जी ! बहुत अच्छे इंसान थे। धन, सम्पत्ति की कोई कमी नहीं थी। ईश्वर के सेवा भाव में, और लोगों की सेवा में ,अपना समय व्यतीत करते थे। वर्षों से ,वो अपने घर एक नन्ही किलकारी की उम्मीद कर रहे थे, किंतु विवाह को 14 वर्ष बीत गए ,उनके कोई संतान नहीं हुई। इस बात को लेकर वो अक्सर बहुत चिंतित रहते थे , क्या उन्हें, संतान का मुख देखे बिना ही मरना पड़ेगा ?इतनी सम्पत्ति का कोई तो वारिस होना चाहिए।
इस कारण बहुत से ऋषि, ब्रह्म ऋषियों की सेवा करते थे, ताकि उनके आशीर्वाद से उन्हें संतान की प्राप्ति हो। एक दिन ,एक बहुत बड़े संत उनके द्वार पर आए , ताराचंद जी ने, उनका बहुत सेवा भाव किया, आदर सत्कार किया। उससे प्रसन्न होकर उन ऋषि ने, ताराचंद जी को आशीर्वाद दिया -'' तुम्हें शीघ्र ही एक सुंदर पुत्र की प्राप्ति होगी। किस्मत का खेल है ,सोचकर मुस्कुराये और बोले - माता या पुत्र में से एक ही, तुम्हारे साथ रह सकेगा।
ताराचंद जी ,बड़े असमंजस में पड़ गए, यह खुशी की खबर है या दुख का समाचार ,कुछ समझ नहीं आ रहा था किन्तु वे अपने सेवा भाव में पहले की भाँति ही लगे रहे। एक दिन उनकी पत्नी ने उन्हें सूचना दी कि वो मां बनने वाली है, यह बात जब उन्हें पता चली तो उन्हें खुशी हुई और साथ ही दुख भी हुआ और वो अपनी पत्नी को लेकर परेशान रहने लगे। नियत समय पर उन्हें पुत्र की प्राप्ति हुई, किंतु साथ ही उनकी पत्नी को किसी बीमारी ने घेर लिया ,वह दिन पर दिन कमजोर होती जा रही थी। अब उनकी पत्नी को, अपनी संतान की चिंता सताने लगी कि मेरे जाने के पश्चात, उसे कौन रखेगा ? कौन संभालेगा ?
मैं चली गई तो... कहीं इसके पिता दूसरा विवाह न कर लें। पता नहीं, सौतेली मां उसके साथ कैसा व्यवहार करेगी ,इसीलिए उन्होंने निर्णय लिया कि वो अपने घर पर , अपनी ही छोटी बहन को , अपने पति की दूसरी पत्नी बनाकर ले आएंगी।
यह तुम कैसी बात कर रही हो ?भला ऐसा भी कहीं होता है , पंडित अलोपी नाथ जी ने कहा था।
मैं बीमार सी रहती हूं, बच्चे की ठीक से देखभाल भी नहीं कर पा रही हूँ , आप मेरी बहन से विवाह कर लीजिए ! वह इस घर में आ जाएगी तो मैं भी निश्चिंत हो जाऊंगी,वो सब संभाल लेंगी।पंडित जी इस बात के लिए नहीं माने ,तब मेरी माँ ने मेरी मौसी को अपने घर में बुला लिया ,सोचा -जब पंडित जी ,उसका व्यवहार और उसकी सुंदरता देखेंगे तो विवाह के लिए स्वतः ही मान जायेंगे।
कुछ दिनों के पश्चात ,मेरी मौसी यानि रेवती जी वहां आ गयीं और आते ही घर के सभी काम सम्भाल लिए ,मेरी माँ के साथ -साथ अब पिता को भी अच्छा लगने लगा। तब उन्होंने भी इस विवाह के लिए सहमति दे दी। मेरी माँ ने अपने जीते जी, अपने पति का विवाह अपनी बहन से करवा दिया। अब उनकी छोटी बहन रेवती उस घर में पंडित जी की दूसरी पत्नी बनकर रहने लगी । उसने कुछ दिनों तक तो ,अच्छे से घर को संभाला और मेरी देखभाल भी की।
मैं धीरे -धीरे बड़ा हो रहा था, मेरे पिता मुझ में अपने संस्कार डाल रहे थे। मैं शुरू से ही साधु -संतों की सेवा करता था और पूजा -पाठ में विशेष ध्यान रखता था। इस बीच मेरी मौसी यानी मेरी दूसरी मां गर्भवती हो गई , जैसे ही उन्हें मां बनने की बात पता चली, धीरे-धीरे उनका व्यवहार, मेरे प्रति बदलने लगा। वह मौसी से अब सौतेली मां बन गई और उसने एक बेटे को जन्म दिया। अब मैं ,जब भी उनके पास जाता तो वह मुझे डांटकर भगा देती थी, और मेरी माँ से भी लड़ने लगी थी।
मेरी माँ का इलाज़ अभी भी चल रहा था , एक बार मेरी मां को एक साधु ने एक फ़ल दिया, उसका चमत्कार देखो ! उस फल को खाकर मेरी मां धीरे-धीरे स्वस्थ हो रही थी। यह बात भी मेरी सौतेली मां को बर्दाश्त नहीं हुई, ख़ुशी होने के बदले उन्हें उन पर क्रोध आया। वो तो सोच रही थी -कि जब मेरी मां मर जाएगी तो उस घर और संपत्ति पर एकमात्र उनका ही अधिकार होगा। मेरे पिता यानी पंडित अलोपीनाथ जी के अब दो-दो वारिस हो गए थे। मैं अपने पिता के साथ ब्राह्मणों की और साधु संतों की सेवा करता और वेद- पुराण इत्यादि ग्रंथों का अध्ययन करता।
दूसरी तरफ मेरा सौतेला भाई,अपनी मां के लाड -प्यार के कारण बिगड़ रहा था, उसे बात-बात पर क्रोध आता था , सामान उठाकर फेंक देता था, शास्त्रों का अध्ययन करना तो दूर.... साधु -संतों को देखते ही उनसे चिढ़ जाता था। उनकी सेवा करना तो दूर उन्हें तंग करता , उनका उपहास उड़ाता था। मेरी सौतेली मां ने उसे कभी डाँटा नहीं, बल्कि जब पिता उसे डांटते तो, वो उसका समर्थन करती,कहती -इनकी सेवा से क्या होगा ? यहाँ आकर मुफ़्त की रोटियां तोड़ते हैं।
दिन पर दिन बलराज बिगड़ता जा रहा था किसी की कोई बात नहीं सुनता था। अपने नाम की तरह ही बल का धनी था ,उसकी कद काठी देखकर ,कोई भी स्त्री उस पर मोहित हो सकती थी।
मेरी मां मुझे समझाती, शांत रहने के लिए और अध्ययन करने के लिए कहती , अब वह भी अपनी बहन का विवाह अपने पति से करवाकर पछता रही थी। वह पंडित जी से भी कुछ नहीं कह सकती थी क्योंकि यह विवाह उसने ही जबरन करवाया था।
अब माँ स्वस्थ तो हो गई थी किंतु बिल्कुल ठीक नहीं हुई थी ,दिन प्रतिदिन मेरा सौतेला भाई बिगड़ता जा रहा था लोगों को तंग करना, झगड़ा मोल लेना, यही उसका कार्य था अब तो वह गांव में लड़कों का एक समूह बनाकर घूमता,लोगों से झगड़ा करने लगा था और मेरी सौतेली मां यानी मौसी भी उसका ही साथ देती थी। कई बार वे मुझे ही गलत ठहरा देते थे। मैं कुछ भी नहीं कर पा रहा था ,जब मैं लगभग 20 वर्ष का हुआ तो पिता ने सोचा इसका विवाह कर देना चाहिए तब मेरी सौतेली मां ने पूरे घर में कोहराम मचा दिया और झगड़ा इतना बढ़ गया कि मैं गांव छोड़कर आ गया।
ऐसी क्या बात हो गई थी ?जो आपको अपना ही गांव छोड़ना पड़ा। तुम्हारी मौसी तो ऐसे स्वभाव की थी उसे तो सब जानते होंगे, फिर आपने ऐसा निर्णय क्यों लिया ?
क्योंकि उसने मेरे विरुद्ध षड्यंत्र रचा था, किसी गांव की अन्य लड़की से, उसने मेरा संबंध बताया था जबकि उनके अपने बेटे का संबंध उस लड़की से था। उस समय मैं अपने को सही साबित न कर सका गांव वालों ने भी मुझ पर दोषारोपण किया इसलिए मैंने गांव ही छोड़ दिया।
गांव छोड़कर क्या लाभ हुआ ?इस तरह तो लोगों ने समझा होगा ,आप ही गलत थे ,वहीं रहकर अपने को सही साबित करते।
कोई भी, कुछ भी समझता किन्तु उस समय गांव के हालात ये हो गए थे ,मैं चाहकर भी परिस्थितियों को बदल नहीं सकता था।
तब तुम्हारे भाई का क्या हुआ?
मैं नहीं जानता, जब मैं एक बार अपनी मां से मिलने के लिए गांव जा रहा था तभी गांव के कुछ लड़कों ने बताया था कि वह व्याभिचारी हो गया है वेश्याओं के साथ रहता है ,तुम्हारी मां मर चुकी है और पिता भी उसकी हरकतों से परेशान होकर बीमार रहने लगे हैं। तब मेरा वहां जाना मुझे उचित नहीं लगा इसलिए मैं फिर कभी गांव गया ही नहीं, उसके बाद वहां क्या हुआ ?मैं कुछ भी नहीं जाता किंतु इतना तो अवश्य जानता हूं मेरे भाई ने पिता की सम्पूर्ण सम्पत्ति को लुटा दिया होगा।
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