आज शारदा जी को, अपने पति ताराचंद जी को, सम्पूर्ण सच्चाई बतानी पड़ी। अब तक जो भी उनके और उनके बेटे के मध्य चल रहा था ,उसके विषय में उनके पति नहीं जानते थे किन्तु अब जो भी पंडित जी ने बताया ,उस आधार पर, अब उन्हें अपने पति से बात करना उनकी मजबूरी हो गयी। तब उन्होंने बताया - हमारे बेटे को कई दिनों से, अज़ीब और डरावने स्वप्न आ रहे हैं, पहले तो मैंने सोचा था -बच्चा है , ऐसे ही कोई डरावनी कहानी पढ़ी होगी, वह उसके मन में घूम रही होगी, इसलिए वह डर रहा है , लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं था।
यह एक-दो दिन की बात नहीं थी , इस बात को 15 दिन से ज्यादा हो गए कभी उसे अपने इर्द- गिर्द कोई साया महसूस होता है। उसके पास चिट्टियां आती हैं, न जाने कौन ? वो चिट्टियां देकर जाता है। उन चिट्ठियों पर कभी धूल ,कभी राख़ लगी होती थी। न किसी स्थान का नाम और न ही, किसी डाकखाने की मोहर लगी होती थी किंतु आपके बेटे को चिट्टियां मिल रही थीं ।
उन चिट्ठियों में क्या लिखा होता था ?
कोई है, जो उससे सहायता मांग रहा है , क्यों मांग रहा है? यह हम नहीं जानते। कैसे सहायता करनी है ?ये भी हम नहीं जानते।
यह बात सपनों और चिट्ठियों तक ही सीमित नहीं रही ,तब मैं अपनी पड़ोसन कामिनी जी के कहने पर पंडित जी से मिलने मंदिर गयी ,जैसे ही पंडित जी ने वो पत्र हाथ में लिया, वो पत्र जल उठा अपनी आँखें बड़ी -बड़ी करते हुए बोलीं।
कैसे ,
पता नहीं ,पंडित जी कह रहे थे ,ये चिट्ठी पवित्र नहीं है ,कोई आसुरी शक्ति है इसीलिए ये पत्र जला।
आसुरी शक्ति कैसी ? मैं कुछ समझा नहीं ,फिर क्या हुआ ?आश्चर्य से ताराचंद जी ने पूछा।
उनके कहने का मतलब था ,कोई साया है ,जैसे भूत या पिशाच !
ये तुम क्या कह रही हो ? कहते हुए उन्होंने चाय की खाली प्याली पास रखी, मेज पर रखी और बोले -ये तुम क्या बेकार की बातें लेकर बैठ गयी हो, आज के जमाने में भूत -प्रेत की बातों पर कौन विश्वास करता है ?ये सब कहानी -किस्सों में होता है , तुम्हारी पड़ोसन ने कहा और तुम उस पंडित से मिलने चल दीं।
जब घर में ,हमारी नजरों के सामने, कुछ अनहोनी बातें होने लगती हैं, तो विश्वास करना पड़ता है। अब ये बात विश्वास और अविश्वास की नहीं है ,ये हमारे बेटे के जीवन का प्रश्न है ,अब आप मेरी पूरी बात सुनिए !मुझे पंडित जी ने एक ताबीज दिया था, जो मुझे तुषार की बाजू में बांधना था। उस ताबीज को बांधने से तुषार को आराम लगा और उसे सपने भी नहीं आए ,मेरा मतलब है, सपने आये तो होंगे किन्तु डरावने नहीं ,वह ठीक था। पंडित जी ने ,मुझसे पहले ही कह दिया था -ताबीज़ कुछ समय के लिए तो इसको रोक सकता है ,किन्तु ये इसका स्थाई इलाज नहीं है ,हां कुछ दिनों के लिए यह उस आत्मा को रोक सकता है। वह तुषार का अहित नहीं चाहती है, सिर्फ उससे मुक्ति चाहती है।
जब वो अहित नहीं चाहती है ,तब वो उसे तंग क्यों कर रही है ? मैं ये बात नहीं मानता ,किन्तु तुम कहती हो तो विश्वास कर लेता हूँ ,आखिर ये आत्मा किसकी है ? क्या पंडित जी ने यह नहीं बताया ?
कोई आत्मा तो है, जो अब पिशाच बन चुकी है और वह मुक्ति चाहती है, परेशान है।
तब तुमने यह कैसे सोच लिया? कि वह मेरे ही परिवार का कोई सदस्य होगा, या मेरे ही परिवार में किसी को मुक्ति नहीं मिली होगी, यह बात ताराचंद जी को बुरी लगी थी।तुम्हारे परिवार से या वो आत्मा तो कोई भी हो सकती है।
यह मैंने नहीं सोचा, यह मुझे पंडित जी ने बताया -क्योंकि हमारे बेटे तुषार को स्वप्न में कोई गांव दिखता है ,वह भी जंगलों के पास है। अब ऐसे जंगल के पास कोई गांव तो मेरा नहीं है ,इसलिए मैंने आपसे पूछा, मैं इसका इलाज स्वयं ही ढूंढ रही थी इसीलिए मैं ये बात ,आपको बताना भी नहीं चाहती थी लेकिन अब हमें आपकी सहायता की जरूरत है ,आपको बताना ही होगा कि आपका गांव कहां है ? और वहां क्या हो रहा है यह जानकारी तो लेनी ही होगी।
क्यों ?क्या पंडित जी ने पूजा में पता नहीं लगाया ? वह तो पता लगा सकते थे।
हां, उन्होंने ध्यान लगाया है, कोई साया है , जो किसी गहन अंधकार में है , यह संदेश दक्षिण दिशा से आते हैं। अब आप बताइये !आपका गांव कहाँ है ?इतनी बड़ी दुनिया में पंडितजी कैसे ढूंढ़ सकते हैं ,अभी उन्हें संदेह है।
क्या मैं उन चिट्ठियों को पढ़ सकता हूं ? ताराचंद जी ने विश्वास से कहा।
आप उन्हें कैसे पढ़ेंगे ? उसमें लिखे शब्द दो दिनों के पश्चात स्वतः ही मिट जाते हैं, किंतु मैंने उन्हें पढ़ा है इसलिए मुझे विश्वास है। इससे पहले की कोई बड़ी दुर्घटना हो, हमें पहले ही उसका हल निकालना होगा। पंडित जी हमारे साथ चलेंगे। जब से उन्होंने ध्यान लगाया है ,उन्हें कुछ चीजें महसूस हो रही हैं। अब आप हमें बताएंगे !आप अपने गांव क्यों नहीं जाना चाहते हैं ? यह हमारे बच्चे के जीवन का प्रश्न है।
शारदा जी की बात सुनकर ताराचंद जी एकदम से खामोश हो गए, उन्हें ऐसा लग रहा था जैसे उन्हें यह बात बताने के लिए विवश किया जा रहा है। तब वे बोले -जब मैं 20 साल का था तभी मैंने अपना गांव छोड़ दिया था। बाहर काम किया, और अपनी पढ़ाई की। मेरे बाहर जाने से,मेरी माँ को बहुत दुख हुआ था , उसने मुझे थोड़ा पैसा भी दिया था। उसके पश्चात मेरी नौकरी लग गई, और इस बीच तुम मुझे मिल गईं।
आप इस बीच एक बार भी अपने गांव नहीं गए ,शारदा ने जानना चाहा।
एक बार गया था , किंतु रास्ते से ही वापस लौट आया क्योंकि जिसके लिए मैं वापस जा रहा था वह तो अब जिंदा ही नहीं थी, वो मेरी मां थी। तब से मैंने , फिर उस गांव में कभी कदम नहीं रखा।
आपने अपना घर क्यों छोड़ा ?
छोड़ता नहीं तो क्या करता ?मजबूरी थी।
कैसी मजबूरी ?
मेरे माता -पिता के कई वर्षों तक कोई संतान नहीं हुई , मेरा घर बहुत बड़ा है और मेरे पिता के पास बहुत पैसा था। किसी भी चीज की कोई कमी नहीं थी, किंतु मेरे पिता को एक ही बात की चिंता सताती रहती थी, यह सब धन, जो मैंने कमाया है ,इस संपत्ति का वारिस कौन होगा ? इसीलिए वे साधु -संतों की बहुत सेवा करते थे ताकि किसी के आशीर्वाद से तो उन्हें संतान प्राप्ति हो।
