Zeenat [part 19]

ईद पर 'ज़ीनत 'की फूफी 'रुकैया बेग़म' मिलने के लिए उनकी हवेली में तशरीफ़ लाती हैं , किन्तु' ज़ीनत ' को देखकर उन्हें लगता है ,बच्ची बड़ी हो रही है और इसकी हरक़तें तो अभी बचकानी हैं ,तब वो उसे अपने क़रीब बुलाती हैं और उससे कहती हैं -क्या तुम्हारी अम्मी ने तुम्हें इतना भी नहीं सिखलाया कि अपने से बड़ों को सलाम करते हैं। 

नहीं ,फूफीजान !मैंने सलाम किया था ,आपने सुना नहीं।  


अच्छा ,मैं, क्या बूढी हो गयी हूँ ? जो मुझे सुनाई नहीं दिया। तब वे उससे बोलीं -'ज़ीनत 'यहाँ आओ ! 

जी फुफीजान ! मचलते हुए ' ज़ीनत 'उनके करीब आई ,ज़ीनत समझ रही थी ,शायद अब फूफी मुझे डाँटेंगी किन्तु उन्होंने उसका हाथ पकड़ा और मुस्कुराते हुए पूछा - तुम्हारी अम्मी ने तुम्हारी फूफी के लिए क्या -क्या पकवान बनाये हैं ? 

पता नहीं ,मैं तो सुबह से ही तैयार हो रही थी ,ये कपड़े मेरे अब्बू मेरे लिए लाये हैं ,अच्छे हैं ,न... कहकर बाहर भाग गयी।  

उनकी आवाज़ सुनकर तुरंत ही ज़ीनत की अम्मी सलमा दौड़ते हुए ,वहां आई और घबराते हुए पूछा -क्या हुआ ?आपा !क्या, ज़ीनत ने कुछ किया है ?

  भाभीजान ! तुमने अपनी इस लड़की को कुछ  सिखाया है या नहीं उनकी तरफ घूरते हुए रुकैया ने पूछा। 

क्या हुआ ?क्या उससे कोई गुस्ताख़ी हो गयी है ?उन्होंने घबराते हुए पूछा,बच्ची है ,उसे माफ़ कर दीजिये।  

अब लड़की स्यानी होती जा रही है ,समझाते हुए रुकैया बोलीं - माशाअल्लाह !रूप भी अच्छा निखरता जा रहा है, कहते हुए उन्होंने कल्पना में ही उसकी बलाएँ लीं और बोलीं -अब उसे कुछ सिखाओ ! उसे दूसरे घर जाना है। यहाँ अपने अब्बू के घर में ही थोड़े ही रहेगी। उसे पढ़ने भेजा है या नहीं.....   

तभी बाहर से, उनके भाईजान आ जाते हैं। आते ही अपनी बहन को देखकर खुश होते हैं और पूछते हैं -रुकैया ! तुम कब आईं ?

भाईजान !अभी तो आकर बैठी हूँ ,अभी तो मेरी सांसें अभी भी उखड़ी हुई हैं ,भाईजान ! ईद मुबारक़ !

तुम्हें भी ,कहकर वहीँ बैठ जाते हैं और पूछते है। तुम दोनों की आपस में क्या गुफ़्तगू चल रही थी  ?

उन्हें देखकर सलमा पहले ही, 'ज़ीनत ' को ढूंढते हुए उसका हाथ पकड़ कर अंदर ले जाती है और रुकैया और उसके भाईजान ,वे लोग वहीं बैठकर बातें करने लगते हैं। 

 बस वैसे ही ,मैं भाभी से कह रही थी ,अब अपनी 'ज़ीनत 'बड़ी हो रही है।उसे कुछ सिखाया है या नहीं ,उसे अपनी ससुराल भी जाना है। 

रुकैया !तुम भी क्या बात कर रही हो ? अभी वो बहुत छोटी है दस बरस की तो है। 

भाईजान !लड़कियों को बढ़ने में समय नहीं लगता ,एक दो बरस में ही देख लेना अपनी ज़ीनत भी ताड़ की तरह हो जाएगी। 

और तुम सुनाओ !तुम्हारे साहबज़ादे अहमद क्या कर रहे हैं ?

अहमद का नाम लेते ही ,रुकैया के चेहरे पर जैसे नूर आ गया और बोली -भाईजान !वो तो अब स्कूल जाता है। बाहरवीं ज़मात में है ,अहमद के अब्बू कह रहे थे -उसे डॉक्टर जो बनाना है।  

अम्मी ! मैंने फूफी को' सलाम' किया था ,मुँह बनाते हुए ज़ीनत ने कहा। 

जानती हूँ ,मेरी बच्ची, गलती नहीं करेगी ,पर तुम बुरा न मानना ,वो तुम्हारी फूफी हैं ,तुम्हारे अच्छे के लिए समझा रही हैं। उनके लिए शीर और पान लेकर जाओगी  ! तो वो खुश हो जाएँगी। 

'दस्तरख़ान 'सजा दिया गया है ,कहकर आयशा वहां से चली गयी। 

'दस्तरख़ान' पर  खाना परोस दिया गया। खाना ,खाने के बाद वे लोग, एक साथ बैठीं ,तब वो बोलीं -क्या लड़की को अभी तक कुछ सिखाया है या नहीं। 

तभी' ज़ीनत 'मुस्कुराते हुए आती है और कहती है -लीजिये ! फूफीजान ! पान खाइये ! ज़ीनत की यह अदा रुकैया को पसंद आई और उससे पान लेकर मुँह में डालते हुए पूछा - यह पान किसने बनाया ? 

अपनी आयशा ने.... कहकर वहां से जाने लगी ,कितनी प्यारी लग रही है ?सोच रही हूँ ,इसे अपने अहमद के लिए.... भाभीजान !बताओ !इनकी जोड़ी कैसी रहेगी ?

आपा !आपने तो मेरे दिल की बात कह डाली ,दोनों की जोड़ी बहुत ही अच्छी लगेगी कहते हुए, अपनी ज़ीनत की तरफ देखा और उसकी गर्दन के पीछे काज़ल का टीका लगाया। 

हाँ ,जब तक अपना अहमद डॉक्टर बन जायेगा ,तब तक ये भी पंद्रह बरस की हो जाएगी। तब दोनों की शादी कर देंगे। अब तो रुकैया अपने को इस घर की बेटी नहीं वरन उसमें लड़के की माँ होने का गुरुर आ गया था तब वो सलमा से बोली -कम से कम इसे खाना बनाना और परोसना सीखाना चाहिए। क्या तुम जानती नहीं ?''दूल्हे के दिल का रास्ता पेट से होकर जाता है।  जब उसे ये अच्छे-अच्छे पकवान बनाकर खिलायेगी, तभी तो उसे प्यार करेगा।  

परेशान होते हुए ,सलमा बोली - मैं कोशिश तो करती हूँ ,ये कुछ सीखे किन्तु तुम्हारे भाईजान !कहते हैं -सीख़ जाएगी, अभी बच्ची है। 

उन्हें कहने दो !मर्दों को क्या पता होता है ,हम औरतों को क्या -क्या करना पड़ता है ?अभी बेटी का लाड़ उन्हें यह सब करने को मना कर रहा है किन्तु तुम तो उसकी अम्मी हो ,ये काम माँ का होता ,बेटी को गृहस्थी में कैसे निकालना है ?

यह बात उनके भाई ने सुन ली ,तब उनसे रुका नहीं गया और बोले - रहने दो ! आपा ! ये रसोई घर में जाकर क्या करेगी ? खानसामे क्यों लगे हैं ? भोजन वह तैयार करेंगे, अब इस छोटी सी उम्र में उसको चूल्हे की आग के समीप कैसे भेज दूँ ? कहीं जल -जला गयी  तो' लेने के देने पड़ जायेंगे।' 

क्या भाईजान !क्या हम किसी की बेटी नहीं थे ?हमने भी तो काम किये हैं ,हमें तो कुछ नहीं हुआ ,आप ख़्वामहखाह डर रहे हैं। 

रुकैया !तुम ये सब छोडो !क्या मैं अपनी बिटिया को ऐसे -वैसे खानदान में ब्याह दूंगा। किसी के घर की रानी बनेगी ,वो सुंदर ही इतनी है, वह तो मेरी बच्ची को देखकर ही उस पर लट्टू हो जाएगा ,उसे तो खाने  की जरूरत ही नहीं पड़ेगी,इसे देखकर ही उसकी भूख मिट जाया करेगी, कहकर वो हंसने लगे ।

'ज़ीनत' अभी बारहवें  वर्ष में लगी है ,किन्तु अब उसकी खूबसूरती ,मौहल्ले के लड़कों के दिलों पर राज करने लगी है। यह बात उसके अब्बू से भी नहीं छुपी और अब उसको पर्दे में रहने के लिए मज़बूर होना पड़ा। बाहर गली -मोहल्लों में उसके खेलने पर पाबंदी लगाई गयी।

 अब 'ज़ीनत 'भी समझने लगी ,उसमें कुछ तो बात है जो सभी की नज़रें उसको ढूंढती हैं। बाहर जाती तो बुरखा पहनकर जाती। धीरे -धीरे उसके मोहल्ले की साहबज़ादियों ने उसे एहसास करा दिया ,वो हुस्न की मलिका बनती जा रही है इसीलिए मोहल्ले के लड़कों की नज़रों में ,उसके लिए मोहब्बत का पैग़ाम नजर आता है। यह सब सुनकर ज़ीनत को जैसे गुदगुदी सी होती और वो अपने को घंटों आईने में निहारती। सलमा भी अपनी बेटी को इस तरह देखती, खुश होती किन्तु साथ ही उसे ड़र लगता ,कहीं उनकी बेटी के क़दम बहक न जाएँ।

 

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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