बस की खिड़की के क़रीब बैठा तुषार ,अपने साथ हुई,उस कुएं वाली घटना को सोच रहा था ,अभी वह उस घटना से उबर नहीं पाया था। उसके लिए वो कोई सपना नहीं वरन उसने, उसे महसूस किया है। अभी तक ऐसा लग रहा है , जैसे उस घटना को उसने जीया है। बस अपनी रफ़्तार से आगे बढ़ रही थी। बच्चे अपने -अपने में व्यस्त थे,कोई अंताक्षरी खेल रहा था ,कोई चुटकुला सुना रहा था किन्तु तुषार शांत बैठा हुआ और थोड़ा घबराया हुआ भी था।
तभी उसने बाहर का नज़ारा देखा तो लगा, जैसे वह फिर से कोई स्वप्न देख रहा है। उसके सामने वही जंगल और दूर किसी गांव के छोटे -छोटे घर दिख रहे थे। उसने उस गांव का नाम जानना चाहा किन्तु बस की रफ़्तार इतनी तेज़ थी वो उस गांव के नाम को पढ़ न सका। उसका मन किया कि वह किसी बहाने इस बस को रुकवा दे किन्तु यही सोचकर डर गया कुछ गलत हो गया तो..... हो सकता है ,ये भी मेरा भ्र्म ही हो। अध्यापिका ने पूछा ,यह बस क्यों रुकवाई ,तो उनको क्या जबाब दूंगा ?
अपनी उलझनों में उलझा हुआ, तुषार जब घर पहुंचा, उसकी मम्मी ,उसका चेहरा देखते ही समझ गई अवश्य ही कोई घटना हुई है तब उन्होंने उससे पूछा -क्या हुआ ?
घबराकर तुषार रोने लगा और बोला - मम्मी !मेरा ताबीज कहीं खो गया है।
ताबीज़ खोया नहीं है बल्कि उस शक्ति ने अपने प्रभाव से उसे, तुमसे दूर कर दिया है ताकि वह तुम्हारे समीप आ सके ,जब तुम चले गए थे तो तुम्हारे जाने के पश्चात पंडित जी का फोन आया था ,उन्होंने, मुझे पहले ही आगाह कर दिया था। अब थोड़ा आराम कर लो !शाम को, पंडित जी से मिलने चलेंगे ,उन्होंने वहीं बुलाया है।
शाम को जब शारदा जी और तुषार, मंदिर में पहुंचे तो पंडित जी उन्हीं की प्रतीक्षा करते हुए मिल गए। उनके पहुंचने पर पंडित जी ने बोले - यह कोई छोटी-मोटी शक्ति नहीं है, मेरा अंदाजा सही था, वह एक पिशाच है, किंतु तुम घबराना मत !वह तुम्हें कोई हानि नहीं पहुंचाएगा,उन्होंने तुषार की तरफ देखते हुए कहा - वह सिर्फ़ तुमसे संपर्क बनाना चाहता है, क्योंकि वह कहीं फंसा हुआ है।
पिशाच भी कहीं फंसते हैं ,उसमें तो इतनी शक्ति होती है ,वह कहीं भी पहुंच सकता है फिर वो कहाँ है ?
किसी गहरे, अँधेरे स्थान में ,उसमें शक्ति तो बहुत है किन्तु उसने, अपने जीवन में इतने पाप किये हैं ,उनका उसे पछतावा है।वो अपने गलत कर्मों के कारण ही ,पिशाच तो बन गया है किन्तु अब वो पिशाच बनकर रहना नहीं चाहता और स्थान से मुक्ति चाहता है। तुम्हारे ही परिवार का कोई सदस्य है जो अब पिशाच बन चुका है।
कौन हो सकता है ?शारदा जी ने और तुषार ने एक -दूसरे की तरफ देखा किन्तु उनके पास कोई जबाब नहीं था।
मुझे लगता है, तुम्हारे पिता के परिवार से या उनके ख़ानदान में ऐसा कोई हो ,उनका जो भी गांव है, वहां तुम लोगों को एक बार जाना चाहिए।
अब उस गांव में हमारा क्या होगा ? वे [ताराचंद ] तो बरसों पहले वह गांव छोड़ चुके हैं,शारदा जी ने कहा -मैंने तो एक बार भी उस गांव को नहीं देखा।
किंतु तुम्हारे पति के पूर्वजों की जड़ें अभी भी वहीं हैं , वो उनसे जुड़े हुए हैं, उनका रक्त संबंध है ,वे , उनकी प्रतीक्षा कर रहे हैं ,उन्हें जाना चाहिए।
पंडित जी, हमें वहां जाकर क्या करना है ? आप भी हमारे साथ चलिए ! आज तक मेरे पति ने उस गांव के विषय में हमें ,कभी कुछ नहीं बताया। न ही, अपने परिवार के लोगों के विषय में कुछ बताया।
उन्हीं के परिवार में कोई है, जिसकी आत्मा भटक रही है और वो अपने परिवार से ही सहायता चाहते हैं।
वो तो मैं समझ रही हूँ ,किन्तु इसके लिए मेरा ही बेटा क्यों ? मेरे पति को तो इसका आभास भी नहीं है। अब इस बात का तो वहीँ जाकर पता चलेगा किन्तु आप लोगों को अब देर नहीं करनी चाहिये ,पंडित जी ने कहा।
शाम को शारदा जी, पंडित ताराचंद जी से, जो तुषार के पिता हैं ,वो, उनसे पूछती हैं - सुनिए ! आपका गांव कहां है ? आज तक आपने ,हमें अपने गांव के विषय में कभी कुछ नहीं बताया।
ताराचंद जी आराम से, बिस्तर पर लेटे हुए, दिनभर की थकान, उतार रहे थे, उन्होंने शारदा जी को इस तरह अपने गांव के विषय में पूछते देखा, तो कुछ समझ नहीं पाए और बोले -यह बात आज क्यों उठ रही है ? आज तक तो तुमने इस विषय में कभी कोई प्रश्न नहीं किया।
अब बात ही कुछ ऐसी हो गई है, हमें इस विषय में जानना तो होगा ही।
तुम कहना क्या चाहती हो ? मैं कुछ समझ नहीं पा रहा हूं ? अब गांव गए हुए भी, मुझे बरसों हो गए हैं।
वहां अब आपके परिवार के लोग तो होंगे ही..... आपका कोई रिश्तेदार, कोई भाई- बंधु तो होगा।
रहने दो ! इन सब बातों से कुछ नहीं होता , मेरा वहां कोई नहीं है, जैसे उनके मन का दर्द छलक आया हो।वे इस विषय में कोई बात करना ही नहीं चाहते थे।
किन्तु अब शारदा जी, उस बात को उठा रहीं थीं ,पहले तो गांव में, जमीन - जायदाद बहुत हुआ करती थी क्या आपके पिता के पास कोई संपत्ति नहीं थी ?
आज तुम ये कैसी बातें लेकर बैठ गयी हो ? हमारी संपत्ति थी किंतु मुझे उस संपत्ति का मुझे कोई लालच नहीं है, तुम आज इस बात को क्यों पूछ रही हो ? उसी सम्पत्ति ने सब बर्बाद कर दिया ,सब रिश्ते..... कहकर वो एकदम शांत हो गए ,क्या तुम उस सम्पत्ति में हिस्सा चाहती हो ?मुझे, तुमसे ऐसी उम्मीद नहीं थी ,इतने वर्षों बाद तुम ये बात उठाओगी।
आप मुझे गलत समझ रहे हैं ,आज तक आपसे कभी पूछा है।
तो आज क्यों ?कहते हुए उन्होंने कहा -एक कप चाय पिला दो !
शारदा जी चाय बनाने चलीं गयीं और ताराचंद जी मन ही मन सोच रहे थे ,आज इसे क्या हुआ ?अवश्य ही कोई बात तो है ,शारदा जी चाय लेकर आईं और उनके करीब आकर बैठ गयीं और बोलीं -क्योंकि बात अब आपके या मेरे लालच की नहीं ,किन्तु आपके परिवार की है। देखिए !आप तो जानते ही हैं ,मेरा कोई बड़ा ख़ानदान नहीं था ,न ही कोई सम्पत्ति ,पापा एक छोटी सी नौकरी करते थे और न ही, हम किसी गांव से जुड़े हैं ,जुड़े भी हों ,तो आपके बेटे ही तरह ही, मुझे भी नहीं मालूम ,हमारा भी कोई गांव था।
माना कि आपको कोई लालच नहीं है किंतु आपके ही परिवार में कोई तो है , जो हमारे बेटे को तंग कर रहा है। शारदा जी ने अब उनसे यह बात छुपाना उचित नहीं समझा।
कौन तंग कर रहा है ? तुम्हें कैसे मालूम ? हमारे ही गांव का कोई व्यक्ति है।उसका क्या नाम है ?मुझे बतलाओ !
सबसे पहले आपको ये बता दूँ ,वह कोई व्यक्ति नहीं, वो कोई आत्मा है,शारदा जी के इतना कहते ही ,ताराचंद जी सोफे से जैसे उछल पड़े।
तुम्हारा दिमाग फिर गया है, पता नहीं ,क्या-क्या अनाप-शनाप बोल रही हो ? मुझे विस्तार से संपूर्ण बात बताओ ! आखिर हुआ क्या है ?
