Qabr ki chitthiyan [part 72]

 ताबीज को बांधे हुए ,तुषार को दो दिन हो गए थे ,अब तुषार को कोई परेशानी नहीं थी। अब वह निश्चिंत हो गया था। उनके स्कूलवाले ,बच्चों की परीक्षाओं से पहले, बच्चों को स्कूल की तरफ से सैर के लिए , बाहर 'ऐतिहासिक' और कुछ' दर्शनीय स्थलों' पर ले जाना चाहते हैं, उन बच्चों में तुषार भी था।  शारदा जी को, जब इस बात का पता चलता है ,तब वो थोड़ा परेशान होती हैं , हालांकि शारदा जी अपने बेटे को भेजने के   लिए, मना कर रही थीं। शारदा जी क्या बात है ? आप अपने तुषार को इस ट्रिप पर क्यों जाने देना नहीं चाहती हैं ?

मैडम ! आजकल वैसे ही पढ़ाई का दबाब बच्चों पर बना हुआ है ,उन्होंने बहाना बनाया। 


 

ये बात तो ठीक है किंतु यह भी तो हम ,बच्चों के लिए ही कर रहे हैं ,जिस दबाब की बात आप कर रहीं हैं ,उससे बच्चों को थोड़ी देर के लिए छुटकारा मिलेगा। जो बच्चा पढ़कर या रटकर स्मरण नहीं कर पाता वो देखकर जल्दी सीखता है ,वे स्मृतियाँ काफी समय तक बनी रहती हैं, इसीलिए बच्चों को ऐसे स्थानों पर ले जाया जाता है। 

शारदा जी निरुत्तर हो गयीं ,तब तुषार से बोलीं -अपने उस ताबीज़ का ध्यान रखना ,अपनी अध्यापिका के साथ ही रहना ,इधर -उधर मत जाना। 

हाँ ,मैं अपने दोस्तों के संग ही तो रहता हूँ ,चिढ़ते हुए तुषार ने जबाब दिया। 

इस तरह तुषार की मैडम के कहने पर उन्होंने उसे स्कूल वालों  के साथ भेज तो दिया किन्तु वे उसके लिए चिंतित थीं।  

ताबीज़ बंध जाने के कारण ,अब तुषार को भी कोई डर नहीं था। अपनी कक्षा के छात्रों के साथ घूमने के लिए चला गया, उन्होंने कई ऐतिहासिक स्थल देखे थे , बाग -बगीचों में घूमते हुए ,वे लोग आगे बढ़ रहे थे , रास्ते में एक बहुत सुंदर बगीचा था। वह बगीचा अपनी बनावट के लिए वहां के माली के द्वारा उनकी काट- छांट करके उसको बड़े अच्छे तरीके से सजाया गया था इसलिए वह बगीचा, बहुत प्रसिद्ध था , उस बगीचे में विभिन्न प्रकार के फूल और वनस्पतियाँ थीं। बच्चों को उस बगीचे में टहलने में बहुत अच्छा लग रहा था। अध्यापिका भी थोड़ा निश्चिंत हो गई थीं  कि बच्चे इस बगीचे से बाहर कहीं नहीं जाएंगे। 

उस बगीचे में आने जाने के लिए पांच मार्ग बने हुए थे और बच्चों के खाने के लिए ,छोटे -मोटे सामान के लिए तीन-चार दुकानें भी खुली हुई थीं। बच्चे जहां भी स्थान मिल रहा था, वहीं घूम रहे थे। तुषार भी यहाँ -वहां टहल रहा था।  तुषार ने देखा एक बहुत ही सुंदर जगह थी , वहां पर विभिन्न प्रकार के फूल खिले हुए हैं , फूलों से लदी , वहाँ एक गुफा सी नजर आई , वह उसे देखते हुए आगे बढ़ता रहा , उसके साथ, उसके दो एक मित्र और भी थे। आगे बढ़ते- बढ़ते और भी तरह के सुगंधित पुष्प उन्हें दिखाई देने लगे। वह स्थान बहुत ही अच्छा लग रहा था, उस स्थान पर एक विशेष प्रकार की भीनी -भीनी खुशबू महसूस हो रही थी। चलते हुए न जाने, कितने आगे बढ़ गए? तभी दूर उन्हें एक कुआं दिखलाई दिया। वे तीनों मित्र आगे बढ़े और कुएं में झांकने लगे।

बालपन में वे बच्चे कुएं में आवाज लगाने लगे -हैलो ! उनकी आवाज लौटकर आई ,हैलो ! बच्चों को अच्छा लगा और वे इस क्रिया को बार -बार  दोहराने लगे ,जैसे -तुम्हारा नाम क्या है ?वापस जबाब आता ,तुम्हारा नाम क्या है ?तब वे हँसते।

 उन्हें देखकर जैसे ही तुषार ने भी कुएं में झाँका , उसे अजीब सा करंट लगा और वह पीछे हट गया और बोला -इस कुएं में कुछ है। 

कुछ भी नहीं है ,आओ !देखो ! यहाँ तुम्हें कुछ दिख रहा है और बोला -इससे पूछो ! तुम्हारा क्या नाम है ? अभी भी तुषार घबरा रहा था किन्तु उसके दोस्त उसके साथ थे। तभी उसे लगा जैसे उसे, किसी ने अपनी तरफ खींच  लिया हो और वो कुएं में गिर पड़ा। पानी में गिरकर उसकी हालत खराब होने लगी उसने बहुत हाथ -पांव मारे किन्तु कुएं से कैसे निकले ? उसका दम घुटने लगा ,वो चिल्ला रहा था -मुझे बचाओ !किन्तु उसके दोस्त उसे देखकर हंस रहे थे। अचानक ही उसके मित्रों की आवाज बदल गई और वह बोले -तुम आ रहे हो ना..... उन्हें देखकर तुषार ऊपर भी नहीं आ पा रहा था और न ही वे उसकी सहायता कर रहे थे।  तुषार बुरी तरह डर गया और वहीं चीखकर बेहोश हो गया।

 सभी बच्चों को वापस जाने के लिए इकट्ठा  किया जा रहा था ,अध्यापिका का आदेश आया ,अब सभी बच्चे चलकर अपनी बस में बैठ जाएँ। तब तुषार के कानों में कुछ स्वर सुनाई दिए ,-तुषार उठ ! वापस चलना नहीं है ,क्या ?तुषार ने धीरे से अपनी आँखें खोलीं , उसने देखा ,उसके दोस्त उसे पुकार रहे हैं। 

तीन बच्चे गायब थे, उन्हें ढूंढा जाने लगा ,सभी इधर -उधर उन्हें ढूंढ़ रहे थे ,तभी पेड़ों के झुरमुट में से तीनों  निकलकर बाहर आये। उन्हें देखकर सभी ने राहत की सांस ली, और उनसे पूछा  -तुम लोग कहां चले गए थे ? इससे पहले कि वह कुछ जवाब दे पाते अध्यापिका ने उन्हें डांटते हुए कहा -शीघ्र ही बस में बैठो ! अभी तक तुषार जैसे नशे में था या किसी नींद से जागा हो वह समझ नहीं पा रहा था कि उसके साथ क्या हुआ था ? वह तो कुएं में गिर गया था। तब उसने अपने कपड़ों को देखा, वह तो सब सूखे हुए थे फिर वह कुएं से बाहर कैसे आया ? कुछ भी समझ नहीं पा रहा था, तब उसने अपने दोस्तों की तरफ देखा, और उनसे पूछा - मैं बाहर कैसे आया ?

उसका कोई भी दोस्त, उसकी बात नहीं समझ पाया, तब पूछा -तू ये  क्या कह रहा है ? तू ठीक तो है।

हां, वही तो मैं, पूछ रहा हूं , मैं तो कुएं में गिर गया था। 

किसने कहा ? उसके दोस्त ने आश्चर्य से पूछा। तुम कुएं के नजदीक गए थे और न  जाने तुम्हें क्या हुआ ? तुम एक तरफ को गिर पड़े , तब से तुम्हें हम जगा ही रहे थे। मन ही मन तुषार सोच रहा था , तो क्या वो  मेरा एक सपना था ? क्या मैं सो गया था ? लेकिन मेरी सांसे अटकी हुई थीं , मेरा दम घुट रहा था , यह घटना गलत कैसे हो सकती है ? तभी उसने अपने ताबीज को टटोला, उसकी बाजू के अंदर बांधा हुआ ताबीज ना जाने कहां गिर गया था ? तब उसे एहसास हुआ, उस शक्ति ने अपना असर दिखाया था, तभी मुझे उस कुएं के पास वह करंट लगा था। मन ही मन घबरा रहा था, कहीं मेरे साथ कोई और दुर्घटना न हो जाये। वह चुपचाप बस में खड़की के समीप बैठकर बाहर की तरफ देखने लगा। 

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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