रूही नहाने के लिए ,स्नानघर में गयी और इधर गर्वित की नीद उड़ गयी। धुले -धुले बाल ,मासूम सा चेहरा ,इस सादगी भरे रूप में भी कितनी प्यारी लग रही है ? गर्वित उसे लगातार, तैयार होते देख रहा था। उसको इस तरह देखकर अपने को रोक न सका और बोला -रूही इधर आओ !
हम्म्म !क्या है ? रूही लापरवाही से बोली।
उसको अपनी तरफ न देखकर ,अचानक उसका विचार बदला और बोला -तुम कल कहाँ थी ?
उसका प्रश्न सुनकर रूही कुछ देर के लिए रुक गयी ,फिर गीले बालों को झटकते हुए बोली - यहीं तो थी ,मैं भला कहाँ जाउंगी ?इतनी बड़ी हवेली है ,अभी तो मैंने इसे देखा भी नहीं ,एक लड़की मुझे इस कमरे में छोड़ गयी ,तब से यहीं थी।
ऐसा कैसे हो सकता है ? तुम यहां थीं , तो मुझे दिखलाई क्यों नहीं दीं ?
क्यों ?जब तुम सुबह उठे थे, तो क्या मैं ,तुम्हें दिखाई नहीं दी थी या रात्रि की बातें कर रहे हो, रात्रि में तो, तुम्हें यही नहीं पता था कि तुम कहां हो और क्या कर रहे हो ? तुमने इतनी पी रखी थी।
इतनी भी नहीं पी थी , कि मैं अपनी पत्नी को न पहचान सकूं या अपने कमरे को न पहचान सकूं यदि मैंने पी हुई थी तो मैं किसी दूसरे कमरे में तो नहीं गया, यहीं पर आया था इसका मतलब यही है, कि मुझे इतना याद तो है, कि तुम इस कमरे में नहीं थीं।
तुम्हें कोई गलतफहमी हुई है, साड़ी की प्लीटों की तहों को ठीक करते हुए रूही ने कहा।
ऐसे कैसे हो सकता है ? गर्वित सोच रहा था - जब मैं यहाँ आया था, तो बिस्तर खाली था ,क्या सच में मैंने इतनी पी थी ? आज तक तो ऐसा नहीं हुआ। ख़ैर ! कोई बात नहीं,जो रात्रि में न हो सका ,सोचकर उसने अपना हाथ लम्बा किया और रूही को अपनी ओर खींच लिया।
छोड़ो ! यह क्या कर रहे हो, मुझे तुम्हारी मम्मी ने बुलाया है, तुम्हारे घर की कुछ रस्में हैं वे भी तो निभानी हैं , कहते हुए रूही अपने को छुड़ाने का प्रयास करने लगी।
तभी बाहर से कविता की आवाज आई -भाभी ! क्या तैयार हो गई ?
हां, आती हूं , कहते हुए वह दरवाजे की तरफ लपकी , मन ही मन सोच रही थी - आज तो मैंने इसकी शराब का बहाना ले दिया किंतु शाम को क्या होगा ? मन ही मन सोच रही थी और घबरा भी रही थी, कविता के पीछे चलते-चलते, वह एक बड़े से हाल में पहुंच गई वहां पर बहुत सारी महिलाएं बैठी हुईं थीं। सभी अनजान थी ,उनमें से किसी को भी रूही नहीं जानती थी। शिखा को इतना समय ही कहां मिला था ? उसने पर्दा किया हुआ था किंतु रूही ने पर्दा नहीं किया था।
उसको बिना पर्दे के देख कर दमयंती ही बोलीं -बहु पर डालो !हमारे यहाँ बहु पर्दे में होगी तभी तो मुँह दिखाई होगी ,अब तो तुम्हारा मुँह सभी ने ऐसे ही देख लिया अब क्या मुँह दिखाई करनी ?
तभी एक महिला हंसकर बोली -मुँह दिखाई तो अब भी होगी क्योंकि हमने बिना पर्दा हटाए ही, मुँह तो देखा ही है।
रूही बोली- यदि मैंने पर्दा हटा दिया,तब किसी को कैसे पहचानूँगी ?
तुम्हें किसी को पहचानने की जरूरत नहीं है, जितना कहा जाए, उतना करो ! दमयंती जी ने उसे घूरते हुए कहा। रूही देख रही थी, इनके तेवर आज भी ऐसे ही हैं ,ये तनिक भी बदली नहीं है।
रूही बोली- अब तो इन सब ने मुझे पहले ही बिना पर्दे के देख लिया है,अब क्या करूं ?
दमयंती जी ने उसकी तरफ देखा, और बड़े प्यार से बोलीं -अभी और भी लोग आएंगे उनके लिए तो पर्दा कर लो ! उन दोनों सास -बहू की बात सुनकर सभी महिलाएं हंसने लगी।
अब रूही ने,चुपचाप पर्दा कर लिया, कुछ महिलाओं ने पूछा - बहु को गाना बजाना आता है या नहीं।
दमयंती जी बोलीं -यह तो शहर में रहने वाली लड़की है , इसे कहां कोई गाना आता होगा ? अभी वह यही शब्द कह रही थीं -तभी उन्हें गाने के स्वर सुनाई दिए, जिन्हें सुनकर वह चौक गईं,रूही बिल्कुल शिखा की तरह ही गाना गा रही है, और गाना भी वही था ,जो शिखा अक़्सर तेजस की याद में गुनगुनाया करती थी - ''तुम मुझे भूल भी जाओ !ये हक़ है तुमको ! मेरी बात और है,मैंने तो मोहब्बत की है।''
ये कैसे हो सकता है ? एक पल को उनकी आत्मा जैसे काँप गई ,उन्हें लगा, जैसे शिखा वहां बैठी हुई गा रही है। उन्होंने सोचा ,कहीं रूही की आत्मा,शिखा के अंदर तो प्रवेश नहीं कर गई है। वे उसे बहुत से ध्यान से देख रही थीं । सभी ने रूही के रूप रंग और उसके गाने की ,प्रशंसा की किन्तु हँसते हुए पूछा -तुम्हारा तो अभी -अभी विवाह हुआ है ,फिर ये दर्द भरा गाना क्यों गाया ?किन्तु रूही ने इस बात का उन्हें कोई जबाब नहीं दिया।
मुंह दिखाई की रस्म के पश्चात, दमयंती जी बोली -बहु !अब तुम अंदर जाकर आराम करो ! कुछ देर पश्चात खाने की रस्म भी करनी होगी। बहुभोज बनेगा, तुम्हें खाने में क्या बनाना आता है ?
मेरे पापा के यहां पर नौकर लगे थे, रसोईया खाना बनाता था, मैंने कभी खाना नहीं बनाया रूही ने स्पष्ट जवाब दिया।
कोई बात नहीं है, यहां भी रसोईया लगा है बस तुम हाथ लगा देना, दमयंती जी ने कहा। दमयंती जी के जाते ही, रूही रसोई घर में चली गई , रसोईया अभी भी वही था, तब रूही उससे बोली - मैं आज कोफ्ते बनाऊंगी आप मेरी मदद कर दीजिएगा। कौन, कितना और कैसे खाता है ? कहकर काम में लग गयी।
रसोईया रूही का मुंह देख रहा था, मन ही मन सोच रहा था -चेहरा अलग है, किंतु एकदम पहले वाली बहू की तरह व्यवहार कर रही है। उन्होंने भी पहली बार कोफ्ते ही बनाएं थे और खीर बनाई थी। अभी वह यह सोच ही रहा था तभी, रूही ने दूसरी तरफ खीर के लिए दूध भी चढ़ा दिया।
रसोईये के हाथ कांप गए और उसके हाथ से बर्तन छूट गया और वह डर गया कहीं इसमें शिखा का भूत तो नहीं आ गया।
क्या करते हो ? आराम से काम कीजिए ,रूही ने चुपचाप फिर भी कहा , रसोईए ने, किसी से कुछ नहीं कहा और चुपचाप काम करता रहा किंतु मन ही मन काँप रहा था ,कहीं इस बहुरानी के अंदर शिखा का भूत तो नहीं आ गया।
खाना बनने के पश्चात रसोईए से कहा गया -भोजन परोसो ! जैसे ही भोजन परोसा गया, सभी चौक गए ,इस खाने का स्वाद और खाद्य पदार्थ ऐसे ही थे, जैसे शिखा ने बनाए थे, स्वाद भी वही था। सभी एक दूसरे को देख रहे थे, यह क्या हो रहा है ?और वे सभी समीप ही खड़ी रूही की तरफ देखने लगे और रुही उन्हें देखकर मुस्कुरा रही थी।
अब तक इस ओर किसी का ध्यान नहीं गया था ,अब वे रूही की, शिखा से तुलना करके देख रहे थे। कद -काठी भी वैसी ही है,आवाज भी मिलती -जुलती है। तब तक गर्वित भी भोजन के लिए आ चुका था। रूही को इस तरह मुस्कुराता देखकर, गर्वित डर गया और उसने पूछा -रुही ! तुम ठीक तो हो।
