गर्वित, अपने कमरे में आता है और रूही से जानना चाहता है, कि कल तुम कहां थीं ? तब रूही उसे बताती है कि मैं कल घबरा गई थी और अलमारी में छुप गई थी क्योंकि तुम्हारे भाइयों की नजर मुझ पर है। गर्वित ,रूही को आश्वासन देता है कि कोई भी तुम्हारी बिना इच्छा के, तुमसे कुछ नहीं कहेगा। रूही जानती थी, कल तो मैंने इसके ज्यादा पीने का बहाना बना दिया था किंतु आज वह इतनी पीकर नहीं आया है। गर्वित उससे बात करता है।
रूही, शिखा बनकर उससे बात करती है और फिर बेहोश हो जाती है। रूही के बेहोश होते ही, गर्वित घबरा जाता है, और उसे आवाज लगाता है रूही !रूही ! उठो ! तुम्हें क्या हुआ है ? तब वह अपने घर वालों को आवाज लगता है, कुछ समझ नहीं आ रहा,रूही को क्या हुआ है ? तब उसे पुकारता है -रूही, उठो ! उसके मुंह पर पानी के छींटे मारता है और कुछ देर पश्चात, परिवार के अन्य सदस्य भी वहां आ जाते हैं।
क्या हुआ, क्यों परेशान है?आते ही दमयंती जी ने पूछा , उन्हें लग रहा था, जैसे मैंने सोचा था, वही हुआ अवश्य ही'' शिखा का भूत'' इसके ऊपर आया हुआ है। मुँह पर पानी के छींटों से रूही उठती है और गर्वित से पूछती है -''तुम यह क्या कर रहे हो ? और ये लोग यहां क्यों आए हैं ?''
तुम अचानक ही बेहोश हो गई थीं इसलिए मैंने, इन लोगों को बुलाया है तुम्हारी हालत देखकर मैं घबरा गया था।
क्यों, मुझे क्या हुआ है ? मैं बिल्कुल ठीक हूं ,रूही ने जवाब दिया। आप लोग भी जाकर आराम कीजिए ! इनको, मेरी व्यर्थ में ही चिंता सताने लगती है, उन लोगों के चले जाने के पश्चात गर्वित ने, रूही से कहा -क्या तुम जानती हो ? ,अभी थोड़ी देर पहले तुम, मुझसे क्या कह रही थीं ?
क्या कह रही थी ? अभी तो तुम कह रहे थे- ' मैं बेहोश हो गई थी, बेहोश होने वाला आदमी, क्या कह सकता है ?'कहकर रूही मुस्कुराई।
तुम्हारे बेहोश होने से पहले की बात कर रहा हूँ ? क्या तुम, आज से पहले भी कभी बेहोश हुई हो ?तभी उसे स्मरण हुआ रूही जब यहाँ हवेली देखने के लिए पहली बार आई थी,तब भी बेहोश हो गयी थी ,तब बोला - मुझे लगता है ,हवेली में कुछ तो ऐसा है ,जिसके कारण तुम बार -बार बेहोश हो जाती हो।
क्या मतलब ?तुम कहना क्या चाहते हो ? मुझे बार -बार बेहोश होने का शौक चढ़ा है ,मुझे नहीं मालूम, ये सब मेरे साथ क्यों हो रहा है ? तभी थोड़ी अलसाते हुए बोली - मुझे थोड़ी थकावट महसूस हो रही है, मैं अब सो रही हूं।
गर्वित, मन ही मन सोच रहा था, इससे किस तरह से प्रेम भरी बातें करें ? आज हमारी 'सुहागरात 'पर ही न जाने क्यों ये अड़चन आ रही है ? तब वह बोला - तुमने आज भोजन बनाया है ,इसलिए थक गई होगीं , तुम आराम कर लो ! बाहर भी तो नहीं जा सकता ,घर वाले न जाने क्या अर्थ निकालें ? कह कर उसके बराबर में ही, लेट गया। वह चाह कर भी, उसे छू नहीं पा रहा था और मन ही मन सोच रहा था -क्या सच में ही' शिखा का भूत' इस पर आया होगा ? वरना रूही को क्या मालूम? हमने शिखा के साथ , कैसा व्यवहार किया है ? हो सकता है, यदि मैं इसे छूँ... तो शिखा फिर से इसके अंदर प्रवेश कर जाएगी।
रूही ने मुस्कुरा कर गर्वित की तरफ देखा और उसकी तरफ से पीठ करके लेट गई ,तभी उसे एक शरारत सूझी। उसने गर्वित की कमर पर अपना हाथ हौले -हौले फेरना आरंभ कर दिया । गर्वित अभी सोया नहीं था ,उस समय रूही की हरकतों के कारण, वह पहले ही डर गया था।
ऐसा, आज पहली बार हुआ है ,जो वो डरा हुआ है। अब तक वो लोग ही, लड़कियों को डराते आये हैं ,उस परिवार के लड़कों को देखकर लड़कियाँ छुप जाना पसंद करती थीं। ये बात अवश्य है ,इस गांव की किसी भी लड़की पर बुरी नज़र नहीं डाली ,डाली भी हो तो किसी को कुछ पता नहीं चला वरना ठाकुर ख़ानदान की गांव में जो साख़ बनी हुई है ,वह कब की ध्वस्त हो जाती ?किन्तु गांववाले भी सब जानते हैं ,''ठाकुर अमर प्रताप सिंह ''के लड़के कैसे रहे हैं ?अब पोतों का भी यही हाल है। कहते हैं , न...'' जब तक अपने घर पर आंच न आये, पड़ोसी खुश रहता है ''इसी प्रकार गांव वालों को भी क्या ?जब तक उनके घर की बहु -बेटियां बची हुई हैं ,तब तक उन्हें ठाकुर ख़ानदान से कोई परेशानी नहीं ,वे लोग कुछ भी करें ,उन्हें कोई फ़र्क नहीं पड़ता।
रूही के इस तरह छेड़ने से ,गर्वित पलट कर देखता है और उससे पूछता है - तुम' रूही' हो ! जैसे उसे पहचानने का प्रयास कर रहा है।
यह क्या सवाल हुआ ? मैं तुम्हारी पत्नी हूं, मेरा नाम 'रुही' है, क्या तुम मेरा नाम भी भूल गए और आज तो हमारी 'सुहागरात 'है ,वह उसे जानबूझकर उकसा रही थी किंतु अभी गर्वित उससे दूरी बनाए रखना चाहता था हालांकि रूही के मन में 'बदले की भावना' तो प्रबल थी किंतु इतने दिनों से, उसके अपने पति से दूरी बनी रही। गर्वित के करीब होने से ,उसके तन की ज्वाला भड़क रही थी। गर्वित अभी भी सहमा हुआ था लेकिन रूही कभी उसके गले में अपनी बाहें डाल, उसके बेहद करीब आती ,कभी रूही की साँसे और उसकी धड़कने गर्वित को महसूस होतीं ,गर्वित को समझ नहीं आ रहा था ,पता नहीं ,ये ऐसी हरकतें क्यों कर रही है ?
रूही ,के इशारे,समझकर भी ,न समझने का प्रयास कर रहा था, किन्तु रूही के बार-बार उकसाने से वह भी तैयार हो गया। धीरे-धीरे उसका डर कम हुआ,वह रूही को अपनी बाहों में भर लेना चाहता था। तभी रूही बोली - तुम इतना झिझक क्यों रहे हो ? तुम मुझे छू सकते हो, क्योंकि तुमने, मुझसे विवाह किया है किंतु औरों का क्या ?
मैंने सबसे, पहले ही मना कर दिया था ,कि तुम्हारी इच्छा के बग़ैर कोई तुम्हें छू भी नहीं सकता ,गर्वित ने ये भी नहीं सोचा , इसे यहाँ आये हुए, अभी दो ही दिन तो हुए हैं ,फिर इसे ये सब कैसे पता चल गया ?
फिर तुम्हारी रस्मों का क्या होगा ?रूही ने पूछा।
वह तो तुम्हारी इच्छा पर निर्भर करता है, धीरे-धीरे गर्वित उसके प्यार में खोने लगा, तभी अचानक रूही बोली - तुम लोगों ने मेरी इच्छा, पहले कभी जाननी ही नहीं चाही, अचानक ही उसकी आंखें ऊपर को चढ़ गईं और गर्वित घबरा गया। मुझे तो चार-चार लोगों से'' सुहागरात'' मनाने की आदत है ,कहते हुए जोर-जोर से हंसने लगी। तुम क्या समझते हो ? तुम मुझे जिंदा जलाकर, सुख- चैन से, इसके [रूही ]साथ जी सकोगे, मैं कभी भी ऐसा नहीं होने दूंगी। इस हवेली का सर्वनाश कर दूंगी। तुम लोगों को भी नहीं छोडूंगी कहकर गर्वित को जोरदार धक्का दिया,गर्वित अभी रूही के व्यवहार को समझने का प्रयास कर ही रहा था,तभी रूही के धक्के के कारण धड़ाम से पलंग से नीचे गिर पड़ा ,रूही हंसी और बोली -तुम्हारी ''सुहागरात'' मैं मनवाउंगी ,और कूदकर पलंग पर बैठ गयी,कुछ देर तक गहरी -गहरी स्वांसे लेती रही और कुछ देर बाद उसकी गर्दन एक तरफ को लुढ़क गई।
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