आज घर की बहु की पहली रसोई थी ,रूही ने वैसे तो दमयंती जी से कहा था -उसे खाना बनाना नहीं आता और उसके पश्चात भी,रसोई में वैसा ही खाना बना दिया ,जैसा कभी शिखा ने बनाया था। सभी को आश्चर्य हो रहा था ,रूही ने शिखा की तरह ही भोजन बनाया है ,यहाँ तक की रसोइया भी, उसे देखकर घबरा गया था। गर्वित जब भोजन करने आता है ,तब गर्वित, रूही को मुस्कुराते देख ,उसे आश्चर्य होता है ,ये यहाँ किसी को जानती भी नहीं ,फिर भी इस तरह मुस्कुरा रही है ,जैसे यहाँ से और यहाँ के लोगों से परिचित हो। तब वो उससे जानना चाहता है ,क्या तुम ठीक हो ?
क्यों,मुझे क्या हुआ ? हां, मैं ठीक हूं , आपस में सभी चर्चा करने लगे, ''कान लगाकर रूही ने सुना'' तब उसे एहसास हुआ कि ये लोग क्यों डर रहे हैं, उन्हें लग रहा था, जैसे -मेरे अंदर' शिखा का भूत' आ गया है , यह सब देखकर और सुनकर रूही को बहुत अच्छा लगा, उसने सोचा, क्यों ना इसी तरह का खेल, खेल लिया जाए।' जब आदमी स्वयं अपनी मदद करना चाहता है ,तो ईश्वर भी उसकी सहायता करने लगता है ,रास्ते स्वयं ही खुलने लगते हैं। ऐसा ही कुछ रूही को भी एहसास हुआ।' वो चुपचाप वहां से चली गयी ,सोच रही थी -पारो ने तो मुझे ऐसी किसी योजना के विषय में बताया ही नहीं था।
घर में ,सारा दिन सभी के चेहरे गंभीर रहे ,शाम के समय दमयंती जी उसके पास आई और उसे ध्यान से देखने लगीं।
अपनी वाणी में मिठास घोलते हुए ,रूही ने पूछा -मम्मीजी ! आप मुझे इस तरह क्यों देख रहीं हैं ?क्या कुछ कहना चाहती हैं ?
उन्हें कुछ सूझ नहीं रहा था ,इससे कैसे बात की शुरुआत की जाये ?तब हिचकिचाते हुए बोलीं - रूही !क्या तुम ठीक हो ?
जी...
यहाँ, हमारी हवेली में तुम्हें केेसा लग रहा है ?
बहुत अच्छा लग रहा है ,ऐसा लग रहा है ,जैसे इसे मैं बहुत पहले से जानती हूँ किन्तु याद नहीं ,इसे कब देखा ? सोचने का अभिनय करते हुए कहा।
रूही की बात सुनकर वो थोड़ा सहम गयीं ,सम्भलते हुए बोलीं - तुम तो कह रहीं थीं ,मुझे भोजन बनाना आता ही नहीं ,फिर तुमने कोफ़्ते और खीर कैसे बनाई ?
रूही सोचने लगी और बोली -ये तो मुझे भी नहीं मालूम ,कैसे बनी ?बस दिल किया और बना दिया। अब तो दमयंती जी और ज्यादा ड़र गयीं और बोलीं -तुम ऐसा करो !तुम आराम करो !मैं बाद में बात करती हूँ कहकर चली गयीं। उनका डर देखकर रूही को अच्छा लगा और उनके जाते ही जोर -जोर से हंसने लगी।
दमयंती जी गर्वित को पास बुलाकर बोलीं -जरा संभल कर रहना , मुझे लगता है, इस पर हवा का असर है।
कैसी हवा ? गर्वित ने पूछा।
ऊपरी हवा !
यह क्या होती है ? कुछ भी ना समझते हुए गर्वित ने पूछा।
मुझे लगता है , इस लड़की पर शिखा का भूत आया है , इसीलिए थोड़ा संभल कर रहने के लिए कह रही हूं, तूने देखा नहीं, उसने दोपहर में, ऐसा ही भोजन बनाया, जैसा शिखा ने बनाया था और ऐसे ही परोस रही थी जबकि वह मुझसे कह रही थी- मुझे भोजन बनाना आता ही नहीं,मैंने अपने घर कभी भोजन नहीं बनाया।
नहीं मम्मी ! आप व्यर्थ में ही परेशान हो रही हैं, ऐसा कुछ भी नहीं है, डॉक्टर साहब के घर, कुछ तो खाना बनाना सीखा ही होगा।
दमयंती जी ने पूछा -तो क्या इसने कोफ्ते बनाने ही सीखे थे ?
वह तो मैं नहीं जानता ,
इसीलिए तो कह रही हूं, थोड़ा संभल कर रहना और अपने भाइयों से लड़ने की कोई आवश्यकता नहीं है, मैं सब संभाल लूंगी। तुम जाकर, अपने कमरे में देखो ! अब वह क्या कर रही है ?कहकर जैसे ही वो आगे बढ़ीं।
तभी गर्वित ने उनसे पूछा -मम्मी ! क्या आपने रूही को और कुछ भी बता दिया ,उसका इशारा इस हवेली की मुख्य रस्म के विषय में था।
नहीं ,वो अब कहाँ भागी जा रही है ,धीरे -धीरे बता दूंगी कहकर आग बढ़ गयीं ,मन ही मन सोच रहीं थीं - वो [सुनयना देवी ] गयीं तो गयीं ,ये सारी सिरदर्दी मेरे लिए ही छोड़ गयीं ,उनका ये नियम हवेली के लिए श्राप बन गया है।
आज गर्वित ने इतनी ज्यादा शराब नहीं पी थी, वह जानना चाहता था, कल रूही कहां चली गई थी ? गर्वित ने जैसे ही कमरे में प्रवेश किया, रूही उसे अपने सामने देखकर मुस्कुराने लगी, उसका इस तरह मुस्कुराकर देखना गर्वित को बड़ा अजीब लग रहा था, इस तरह से तो उसने इसे मुस्कुराते पहले कभी नहीं देखा था। तब गर्वित रूही से बोला -आज हमारी' सुहागरात' है , कल तो तुम न जाने कहां चली गई थी ?
मैं कल, कहीं क्यों जाऊंगी ? मुझे बहुत डर लग रहा था, ऐसा लग रहा था-जैसे मुझे चार-चार लोग घेरे खड़े हैं , मुझे मार देना चाहते हैं, मुझे वो अपनी -अपनी तरफ खींच रहे हैं , मैं बहुत डर गई थी, और अलमारी में छुप गयी थी। तब अचानक उसने अपनी गर्दन घुमाई और हंसने लगी। तुम भी तो उस भीड़ में शामिल थे,न... हमारी'' सुहागरात'' तो बहुत पहले मन चुकी है ,क्या तुम्हें स्मरण नहीं ,कहते हुए उसकी तरफ बढ़ी और बोली -भूल गए ,क्या ? कहते हुए अपने वस्त्र उतारने का उपक्रम करने लगी। अचानक ही रोने लगी -मुझे छोड़ दो !मैंने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है ?तुम्हारे भाई, मुझे नोच खाएंगे। कहते हुए उससे, लिपट गयी और बोली -मुझे बचा लो ! मुझे बचा लो !
क्या तुमसे मिलने कोई आया था ? गर्वित ने पूछा।
तुम कौन हो ?देखो !वो सभी मुझे किस तरह घूरकर देख रहे हैं ,मुझे बिलकुल भी अच्छा नहीं लग रहा ,एकदम से मासूम होकर बोली।
मैंने, उनसे मना कर दिया है, कोई भी तुम्हारी बिना इच्छा के तुम्हें छू नहीं पायेगा।
क्या ,तुम भी नहीं ?
हाँ ,किन्तु मैं तो तुम्हारा पति हूँ।
तो क्या हुआ ?इच्छा तो इच्छा होती है। वैसे तो मेरे चार -चार पति थे किन्तु किसी ने भी मुझे बचाया नहीं ,न ही किसी ने मेरी रक्षा की, बिल्कुल द्रोपदी की तरह उसके पांच पति थे किन्तु जब उस पर संकट आया ,वे भी नाकारा और विवश हो गए।
गर्वित परेशान हो गया और समझने का प्रयास करने लगा ये रूही है ,या फिर शिखा ! तब उसे अपनी मम्मी की बात स्मरण हो आईं ,तब गर्वित ने पूछा -तुम कौन हो ? शिखा शांत रही कुछ नहीं बोली। तुम अपना नाम बताओगी !उसे झिंझोड़ते हुए गर्वित ने फिर से उससे प्रश्न किया।
तुम भी मुझे मार दोगे , तुम उन सबसे कम नहीं हो ,तुम तो उनमे शामिल थे ,कहते हुए शिखा जोर से चीखी और बेहोश हो गयी।
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