Mysterious nights [part 157]

रूही कपड़े सुखाने के लिए छत पर जाती है ,जहाँ गौरव पहले से ही बैठा हुआ था ,रूही ,गौरव से देवर होने के नाते हंसी -मज़ाक करती है। अच्छा ,अभी मैं चलती हूँ ,कहते हुए फुर्ती से उठी ,तभी उसके पैर का बिछुवा उसकी बनारसी साड़ी के डिजाइन के फंदों में फंस गया ,उससे उलझकर वो गिरने ही वाली थी ,उसे तुरंत ही गौरव ने अपनी बांहों में थाम लिया और उसकी साड़ी में से बिछुवे को निकालने का प्रयास करने लगा।उसकी नजर जब रूही के पैरों पर गयी ,उसने एक गहरी स्वांस ली और बोला -तुम्हारे पैर बहुत सुंदर हैं ,रूही  मुस्कुराकर रह गयी। 


सीना फुलाते हुए गौरव बोला - अभी भी हम पति-पत्नी के रूप में ही मिल सकते हैं , तुम कहो तो... आज की रात्रि तुम्हारे नाम...  मैं ही आऊं या तुम आओगी इशारा करते हुए गौरव ने पूछा -या अभी भइया  के साथ ही रहना चाहती हो। 

 मैं, तुम्हें बुला तो लूं किंतु वो नाराज हो जाएंगे,  उन्होंने, मुझसे पहले ही कह दिया है - मेरा कोई भी भाई, तुम्हारी तरफ देखे , यह मुझे बर्दाश्त नहीं ....

अच्छा !उसने ऐसा कहा ,तुम हो ही इतनी खूबसूरत किसी का भी दिल बहक जाये, फिर अकड़ते हुए बोला - उसके  कहने से क्या होता है ?तुम उसकी बपौती नहीं हो ,हमारी हवेली की तो रस्में ही यही है, जिसको जी चाहे ,तुम उसे अपना सकती हो। हम देखने में चार ज़िस्म,किन्तु एक जान हैं ,और अब तुम हम चारों की जान बन जाओगी।  हम तो तुम्हें कब से अपना बनाये बैठे हैं ? वह उसके और करीब आया और जैसे ही उसे छूने का प्रयास किया एकदम से जैसे उसे करंट लगा। एक  जोरदार झन्नाटेदार तमाचा उसके गाल पर पड़ा। आप रिश्ते में मेरे देवर लगते हैं, क्या अपनी भाभी के साथ ऐसा व्यवहार करना, आपको शोभा देता है। तुमने मुझे  छूने का प्रयास भी कैसे किया ? मैं गर्वित को तुम्हारी इस ओछी हरक़त  विषय में बताउंगी। 

अचानक रूही के इस तरह के व्यवहार से ,गौरव चौंक गया ,अरे तुम भी अजीब हो , अभी तो तुम स्वयं ही मुझे लाइन दे रही थी, गौरव अपनी सफाई में बोला तुरंत ही उसका अहम जाग उठा -तुम्हारी इतनी हिम्मत तुमने मुझ पर हाथ उठाया। आज तक किसी का साहस नहीं हुआ, कोई मुझे छू जाये और तुम तो एक औरत हो।कहते हुए उसने रूही का हाथ पकड़कर मरोड़ दिया।तुम जैसी न जाने कितनी आईं और कितनी गयीं ?  

औरत हूँ, तो क्या हुआ ?तुम कुछ भी करोगे !तुमको  देवर समझकर तुमसे मज़ाक क्या कर लिया ? तुमको मुझे छूने का अधिकार मिल गया।

चुप रह, छिनाल !हमें कोई ऐसा वैसा मत समझना। तुझे छेड़ने और छूने का अधिकार तो हमें पहले ही मिल गया है ,हमारे यहाँ विवाह एक से होता है और पत्नी सबकी होती है। समझी !कहकर उसका हाथ छोड़ तो दिया किन्तु एक बड़ा झटका लगाया जिसके कारण रूही सम्भल न सकी और वहीं पर गिर पड़ी।    

तुम्हारा  दिमाग तो ठीक है, तुम  मेरे लिए  इस तरह की शब्दों का प्रयोग नहीं कर सकते। तुम्हारी हिम्मत भी कैसे हुई ? मेरे लिए इस तरह के शब्दों का प्रयोग करने की। तभी रूही ने, गर्वित को आवाज़ लगाई और बोली - सुनिए ,देखिए !  इधर आपके भाई मेरे साथ कैसा व्यवहार कर रहे हैं ?

गर्वित सीढ़ियों से चढ़ते हुए ऊपर आया, उसे देखते ही रूही रोने लगी और बोली -आपके भाई कैसे हैं ? मेरे साथ अनुचित व्यवहार कर रहे थे और जब मैंने डाँटा तो इन्होंने मुझे गाली दी! आपको मालूम है ,मेरे पापा को जब यह सब पता चलेगा तो क्या होगा ? एक डॉक्टर की बेटी को'' छिनाल'' कहकर बोल रहे हैं।

तू डॉक्टर की बेटी है ,तो क्या ?तुझे सिर पर चढ़ा लें ,तूने मुझ पर हाथ उठाया ये तूने अच्छा नहीं किया। आना तो तुझे नीचे होगा ,गौरव को विश्वास था ,उसका भाई उसे कुछ भी नहीं कहेगा।  

किन्तु उसकी सोच के विपरीत ,गर्वित चिल्लाया - गौरव ! तू ऐसी बातें कैसे कर सकता है ? क्या अपनी सभी मर्यादाएं भूल गया है ?

भाई ! तुम जानते नहीं, ये ही मुझे उकसा रही थी ,और अब'' दूध की धुली'' बन रही है।क्या आपने इसे बताया नहीं ,ये तुम्हारी ही नहीं ,हम भी जब भी चाहे ,इसका मजा लूट सकते हैं। 

क्या तू पागल हो गया है ?मैंने परसों ही कहा था कोई भी, बिना इसकी इच्छा के इससे बात भी नहीं करेगा। 

 चुपकर !गौरव चिल्लाया ,जब से यह आई है तू इसका' पिछलगू' बन गया है। कायदे से देखा जाए तो यह हमारी भी पत्नी है , इस पर तेरा ही अधिकार नहीं है और आज की रात मैं  इसके साथ सोऊंगा। गौरव ने  गुस्से से कहा। तू इसे कुछ भी सुख नहीं दे पाया, तभी तो आज यह मेरे पास आई है। 

चुप रहो !तुम ! अभी हमारी 'सुहागरात ' भी नहीं हुई और तू इसके साथ सोने की बात कर रहा है। 

क्या कह रहा है ?ये तीन दिनों से यहाँ है ,तुम इसे छू भी नहीं पाए ,अवश्य ही तुममें ही कोई कमी है ,हँसते हुए गौरव ने गर्वित का मज़ाक उड़ाया ,आज मैं इसके साथ 'सुहागरात 'मना लूंगा ,तू अपना इलाज़ करा। मैं तेरी जगह होता तो इसे यूँ ही इधर -उधर भटकने के लिए नहीं छोड़ता ,कहते हुए आगे बढ़ा और रूही का हाथ पकड़कर खींचते हुए बोला -चलो !आज तुम्हारे साथ 'सुहागदिन 'मनाते हैं। पति सुख मैं तुम्हें दूंगा ,इधर -उधर भटकने की जरूरत नहीं। ये दो दिनों से वैसे ही बहला रहा है, इसीलिए तो मेरा शरीर देखकर ये  अपना आपा खो बैठी कहते हुए ,बाजू उठाकर अपनी मसल्स दिखाने लगा।  

चुप करो ! अगर मेरी इच्छा के बगैर इसे छुआ भी तो, मुझसे बुरा कोई नहीं होगा ,क्रोध से गर्वित ने कहा। 

 इसे छुऊंगा भी और इसके साथ सोऊंगा भी, देखता हूं ,तू क्या कर लेता है ,दोनों भाइयों में झगड़ा शुरू हो गया। रूही ने अपनी बाजू छुड़ाने के लिए गौरव के हाथ में बड़ी जोर से काटा ,जैसे ही उसका हाथ ढीला हुआ  वो दौड़कर नीचे आ गई और हांफते हुए दमयंती से बोली -मम्मी जी !आप देखिए न.... दोनों भाई, किस बात के लिए लड़ रहे हैं ?

हमारे घर में आज तक ऐसा कभी नहीं हुआ कि भाई-भाई आपस में लड़े, ऐसा क्या हो गया ?जो वो लड़ रहे हैं सोचते हुए दमयंती सीढ़ियों से ऊपर जाने लगी और बड़बड़ाती भी जा रही थी -उम्र बढ़ती जा रही है ,किन्तु ये अभी तक बड़े नहीं हुए बच्चों की तरह लड़ रहे हैं ,मैं अकेली क्या -क्या सम्भालूं ? सीढ़ियों से चढ़ते हुए अब दमयंती जी की साँस फूल गयी थी किंतु अब वहां जाकर देखना तो पड़ेगा ही ,क्या कर रहे हैं ?

रूही,चुपचाप रसोई घर में चली गई। 

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

Post a Comment (0)
Previous Post Next Post