कुमार, यामिनी से मिलकर अपने देश वापस तो लौट आया था, लेकिन उसके व्यवहार से लग रहा था, जैसे अभी भी वह वहीं पर है ,प्रेम की भाषा में कहें तो...''उसका दिल और इश्क़ वहीं पर रह गया है।''यहाँ आकर ठीक से घुल मिल नहीं पा रहा था। मधुलिका के फोन पर जो तस्वीर आई थीं , कुमार के व्यवहार को देखकर अब उसे एहसास होने लगा था - कुमार वहां पर किसके साथ था? कहीं भी तस्वीरें सच्ची तो नहीं, क्योंकि कुमार, अब मधुलिका के साथ वैसा व्यवहार नहीं कर रहा था, जैसे पहले करता था। हालांकि वह दिखला देना चाहता था कि अभी भी वह एक जिम्मेदार पिता, और उस घर का बेटा है किंतु मधुलिका के प्रति अब उसके प्रेम में कमी जो आ गयी थी ।
जब मधुलिका रसोई घर से काम समेट कर अपने कमरे में आई , कुमार को भी ,मधुलिका के आने की आहट सुनाई दी थी , किंतु वह चुपचाप करवट लिए इसी तरह लेट रहा। पहले तो जब भी वो ,कमरे में आती थी, कुमार तुरंत उठकर बैठ जाता था और उससे दिन भर की बातें करता , प्रेम भरी बातें करता,उससे शिकायतें करता वो ,उसे समय नहीं देती है। उसकी बातों से ,उसके प्यार अपनेपन से मधुलिका की तो, जैसे दिनभर की थकान उतर जाती किंतु आजकल वह सच में ही थक जाती है और कुमार से उम्मीद करती, कि कुमार , उसके लिए कम से कम दो बोल प्यार के तो बोलेगा, किंतु वह तो सो गया।
मधु ने कुमार की तरफ देखा ,शांत रही , मन नहीं माना, पूछ ही बैठी - क्या सो गए ? धीरे से अपने हाथ को उसकी पीठ पर ले गई।
कुमार समझ रहा था, मधुलिका उसकी कमी महसूस कर रही है किंतु अब ,उसको यह एहसास क्यों नहीं हो रहा है ?कि मधुलिका को उसकी जरूरत है बल्कि उससे पीछा छुड़ाने के लिए ,उसने अपनी आंखें और कसकर बंद कर लीं। कुमार के तन में कोई हरकत न देखकर, मधुलिका ने अपना हाथ पीछे खींच लिया।
कुमार के व्यवहार से , मन से वह आहत से हो गई क्योंकि वह जानती थी ,वो अभी सोया नहीं है। वह भी , चुपचाप सोने का प्रयास करने लगी। उसके प्रश्नों के जवाब, किसके पास थे ? क्या सचमुच कुमार किसी और के साथ..... इसकी वह कल्पना भी नहीं कर पा रही है। वह लड़की कौन हो सकती है ? जिसके लिए कुमार मेरे प्यार को ठुकरा रहा है। क्या जीवन में कभी ऐसा पल भी आता है, जब दो लोग एक दूसरे से बेइंतहा प्यार करते हैं और फिर धीरे-धीरे उस प्यार में, उसे बंधन महसूस होने लगता है, प्यार नजर नहीं आता।
वह अल्हड़पन, वह खिलखिला कर हंसना, एक दूसरे की प्रतीक्षा करना, यह सब एक समय पर न जाने क्यों खो जाता है ? क्या हम अपनी जिम्मेदारियों में इतने व्यस्त हो गए हैं, कि हम उस प्यार को जगा नहीं पा रहे है, वह कहीं सो गया है या फिर कहीं खो गया है ?
रिश्ते रूखे और बेजान से नजर आने लगते हैं, खामोशियों के मध्य वह प्यार छुपा हुआ है, क्या हमारा रिश्ता नीरस हो गया है, हमारे रिश्ते में वह गहराई नहीं रही, क्या वास्तव में ही कोई लड़की इसकी ज़िंदगी में आ चुकी है ? जो मेरे प्यार को छीन रही है या फिर बरसों पुराना हमारा प्यार उबाऊ हो गया है ? उसने हिसाब लगाया और सोचा -इतने बरस भी नहीं हुए। अपने आप से न जाने कितने प्रश्न किए ,कुछ के जबाब भी दिए।
पुनः पलट कर कुमार की तरफ देखा किंतु वह तो निश्चिंत सोया हुआ था। मधुलिका का परिवार है, उसके ससुर हैं, पति है और बेटा भी है, किंतु मन में उदासी समा गई है। यह सब वह क्यों कर रही है, किसके लिए कर रही है ? नकारात्मकता धीरे-धीरे उसके अंदर प्रवेश कर रही थी, जो उसे अंदर ही अंदर तोड़ने लगी थी लेकिन हर औरत, एक बार तो जरूर प्रयास करती है कि उसका रिश्ता फिर से वही ताजगी ले आए। उसका घर परिवार सुख- शांति से बना रहे। ऐसा ही प्रयास मधुलिका ने भी किया।
अगले दिन प्रातः काल उठते ही, मधुलिका ने कुमार का मनपसंद नाश्ता बनाया। कुमार का सब सामान पहले से ही तैयार कर दिया था। इतनी जल्दी सब तैयारी देखकर कुमार ने पूछा -क्या आज कहीं जाने की तैयारी हो रही है ?
अरे ! आप भूल गए ,मंकु के इम्तिहान करीब हैं ,उसके स्कूल जाना है।
उस दिन तो गए थे ,परेशान होते हुए कुमार ने जबाब दिया। इनका हर महीने का किस्सा हो गया,बुदबुदाया।
किन्तु मधु ने सुन लिया ,तब बोली -उस मीटिंग को दो माह हो चुके हैं ,कुछ ध्यान भी रहता है या नहीं। आज ठीक 9:00 बजे हमें बच्चों की ''पेरेंट्स मीटिंग ''में जाना है।
अपने बेटे के लिए तो कुमार कुछ भी कर सकता है, पति -पत्नी का रिश्ता चाहे कैसा भी हो ? यह अपने बेटे की आंखों में आंसू नहीं देख सकता था अपने बेटे के लिए वह हमेशा ही तत्पर रहा है। अध्यापिका ने बेटे की अच्छी प्रशंसा की, कुमार भी बेहद खुश था और अध्यापिका ने मधुलिका की भी,बहुत प्रशंसा की- कि वह अपने बेटे की कितने अच्छे तरीक़े से उसकी परवरिश कर रही है ?
कुमार मन ही मन सोचने लगा- यह बात तो सही है, ये जब से मेरे साथ है तब से मेरे घर को अच्छे से संभाल रही है, किंतु यह बात उसने मन में ही रखी, बाहर नहीं आने दी। बच्चों को दोनों ही स्कूल में छोड़ आए थे तब रास्ते में मधुलिका ने कुमार से पूछा -जयपुर के बाद आप दिल्ली गए थे न.... और अब विदेश !
कुमार ने एकदम से मधुलिका की तरफ देखा और पूछा -यह सब तुमसे किसने कहा ?क्या मेरे पीछे जासूस लगा रखे हैं ?
मुझसे कौन कहेगा ? मैं तो सारा दिन घर पर ही रहती हूं ,मुझे क्या मालूम ?लेकिन मैं जानना चाहती थी आपका व्यापार कहां- कहां तक फैला है ?रही बात जासूस की... अभी तक तो मुझे आप पर विश्वास रहा है ,जासूस की आवश्यकता महसूस नहीं हुई।
तब ,आज अचानक इस तरह क्यों ?कुमार ने पूछा -आज तक तो तुमने कभी इस बात का जिक्र नहीं किया, न ही कभी पूछा।
जिंदगी में कई बातें,कई घटनाएं , कई बार अचानक ही हो जाती हैं। मधुलिका ने रहस्यमई तरीक़े से जवाब दिया आपने देखा नहीं, शिल्पा के साथ क्या हुआ था ?क्या कभी किसी ने सोचा था, कि शिल्पा के साथ ऐसी स्थिति भी हो सकती है।
तुम, दूसरे के जीवन से अपनी तुलना मत करो !
मैं तो यही तमन्ना करती हूँ ,मेरे जीवन में कभी ऐसा भूचाल न आये ,कहते हुए उसने कुमार की तरफ देखा जैसे पूछ रही हो -तुम इस बात का दावा करते हो।
