डॉक्टर अनंत को इस बात का दुःख हुआ ,जब मैंने,उन लोगों से , इस बात से इंकार कर दिया था कि हमारी बेटी, ससुराल नहीं जाएगी ,तब उसे इस तरह चुपचाप जाने की क्या आवश्यकता थी ? हमसे मिलकर और हमें बताकर भी नहीं गयी। हम तो उसके भले के लिए ही तो सोच रहे थे।
,देखा मौसाजी !पैसा अच्छे -अच्छों की नियत खराब कर देता है। अब आपकी बिटिया ने देखा होगा, उनके पास कितना पैसा है ? तब यहाँ से चुपचाप भाग गयी।
यह तुम क्या कह रही हो ? तारा जी नाराज होते हुए बोलीं -उसे पैसे का कोई लालच नहीं , यदि उसे पैसे का लालच होता, तो अब से पहले ही इतने कष्ट क्यों झेलती ?उसे पहले भी तो ,बिन मांगे बहुत कुछ मिल जाता।
इतने कष्ट सहकर ही तो, उसे अकल आई होगी तभी उसने सोचा -ऐसी जिंदगी से तो वही जिंदगी बेहतर है।ठोकर खाकर ही तो अक़्ल आती है।
तुम भी न.... कुछ भी बोलती रहती हो, उसको, उनके धन से कोई लालच नहीं है।
तभी तो मैं कह रही हूं, जब उसे धन से कोई लालच नहीं है, तो फिर वह भागी ही क्यों ? जबकि वह जानती है कि हम लोग, सभी उसके भले के लिए कर रहे हैं। पारो को लगा, मेरे मौसा और मौसी को, रूही पर पूर्णतया विश्वास है, तब वह बोली - जब आप लोगों को उस पर इतना विश्वास है , तब आप यह भी समझ लीजिए ! कि यह भी हमारी योजना का एक हिस्सा था। उसकी ससुराल वालों को लगना चाहिए कि रूही, गर्वित से बहुत प्रेम करती है, और उससे इतना प्रेम करती है कि उसके लिए वह अपने घर- परिवार को छोड़कर आ गई।
यह तुम ,हमसे क्या बता रही हो ? कभी तुम कुछ कहती हो तो कभी कुछ और कहने लगती हो।
वही कह रही हूं, जो सच्चाई है, उन दोनों को मैंने ही भगाया है ताकि उसके ससुराल वालों को लगे, कि वह उनके बेटे से अत्यधिक प्रेम करती है और उसके लिए कुछ भी करने के लिए तैयार है। बाकी अपना काम वो खुद कर लेगी। जो कार्य वह वहां रहकर कर सकती है, वह कार्य यहां रहकर नहीं कर सकती, उसको इतनी हिम्मत तो रखनी ही होगी, शायद तुम सही कह रही हो, किंतु अभी थोड़ी देर पहले तो तुम, हमें उसके विरुद्ध भड़का रही थीं ।
हां भड़का रही थी, लेकिन आप में से कोई भी भड़का ही नहीं,मैं आप लोगों के विश्वास की जाँच कर रही थी, कहते हुए ,वह हंसने लगी।
यह लड़की भी न जाने क्या कहती है? क्या करना चाहती है , इसका कुछ पता ही नहीं चलता ? मुस्कुराते हुए ताराजी बोलीं।
अब वह अपने घर चली गई है, असली संघर्ष तो उसका, वहीं से शुरू होगा और वह किस तरह उन लोगों से बदला लेती है यह उस बात पर निर्भर करता है कि वहां का वातावरण कैसा है ?और उस वातावरण में अपने को कैसे संभालती है ? जो गलतियां वह पहले कर चुके हैं ,वह गलत कार्य अब तो नहीं करेंगे, संभल कर ही चलेंगे। मैंने चुपके से उसे एक फोन भी दे दिया है ताकि वह वहां की सभी हरकतें, हमें बताती रहे और हम उसकी सहायता कर सकें। देखने और सुनने में पारो की योजना, पूर्णत सुरक्षित थी। रूही को अब कोई कोई डर नहीं होगा, निश्चिंत होकर डॉक्टर अनंत और तारा जी अपने - अपने कार्यों में व्यस्त हो गए। घर पर बहुत काम फैला हुआ था।
पारो बोली -कुछ दिनों से मैं भी अपने काम पर नहीं गई हूं आज मैं भी अपने काम पर चली जाती हूं।
रूही और गर्वित दोनों ही घर के लिए रवाना हो जाते हैं क्योंकि घर में दमयंती जी , वैसे ही परेशान हो रही थीं सब लोग आ गए थे और बहू- बेटे अभी तक नहीं आए थे। नई नवेली दुल्हन के स्वागत की तैयारी में जो कमी थी। सभी जगह साफ-सफाई और सजावट की जा रही थी हवेली को अच्छे से सजाया जा रहा था। गांव वालों को भी निमंत्रण दिया गया था। ऐसे ही मौके पड़ते हैं, जब गांव वालों को दिखाया जाता है कि हमारे यहां की महिलाओं का कितना मान -सम्मान किया जाता है वरना इन लोगों को गांव वालों से कोई मतलब नहीं रहता है उन्हें अपने काम के लिए बुला लेते हैं और जो कोई भी हवेली की बातों में दिलचस्पी लेने का प्रयास भी करता है तो उसको हवेली के बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है या फिर उसको चुप करा दिया जाता है।
गर्वित और रूही हवेली के द्वार पर खड़े थे, ढ़ोल- नगाड़े बज रहे थे, हवेली दुल्हन की तरह सजी हुई थी , ढोल -नगाड़ों की आवाज के साथ वे आगे बढ़ रहे थे और हवेली की चौखट पर खड़े होकर अपने स्वागत की प्रतीक्षा कर रहे थे। कुछ ही देर में, वहां पर एक लड़की आती है और उन दोनों का स्वागत करती है। इसे हवेली में कभी नहीं देखा मन ही मन रूही सोच रही थी। अवश्य ही कोई गांव की कोई नई लड़की होगी अपने काम के लिए ये लोग बुला ही लेते हैं। वह उनका स्वागत करती है, कुछ देर पश्चात, दमयंती जी आती हैं और उन दोनों से गृह प्रवेश के लिए कहती हैं।
उन सभी लोगों में से कोई नहीं जानता कि यह रूही का दूसरी बार 'गृह प्रवेश 'हो रहा है। इससे पहले वह शिखा के रूप में इस घर में प्रवेश कर चुकी थी। पहले जो तेजस की पत्नी ,विधवा शिखा थी , वह अपनी मौत को गले लगा चुकी थी किंतु अब ये रूही है ,डॉक्टर अनंत की बेटी ! भले ही इसके दो रूप रहे हैं किन्तु इसके एक जीवन ने तो जैसे सच्चाई का साथ देते हुए अपने को मिटा दिया किन्तु अब रूही के रूप में दूसरा जन्म हुआ है। इसके साथ अब क्या होगा ? यह तो समय ही बताएगा।
घर में प्रवेश करते ही ,रूही ने अपनी सास के पांव छुए ,उसके इस व्यवहार को देखकर दमयंती भावविभोर हो उठी और बोली -खुश रहो ! बेटा !अपने अन्य बड़ों से भी आशीर्वाद ले लो !
रूही उस घर को देख रही थी ,कहीं कोई बदलाव नहीं था ,जैसा घर पहले था ,अभी भी वैसा ही है ,लोग भी वही हैं। वो उन सबको देख रही थी और सोच रही थी -ये लोग ,कितने अच्छे और सच्चे लग रहे हैं ?इनको देखकर कोई कह भी नहीं सकता कि इनके चेहरे इतने घिनौने हैं ,मेरा क़त्ल करके भी खुश हैं किन्तु इस समय रूही के चेहरे पर भी न कोई क्रोध अथवा घृणा थी और न ही कोई ड़र..... उसने एक -एक करअपने सभी हत्यारों को देखा और हल्का सा मुस्कुराई।
दमयंती बेहद खुश थी, बेटा एक होनहार और सुंदर बहू ढूंढ कर लाया है। बहुत से मेहमान आ गए थे, गांव वाले भी आ गए थे, सभी भोजन कर रहे थे। अगले दिन मुंह दिखाई की रस्म हो रही थी , गांव की महिलाएं भी आई थीं , कंगना खुलने की रस्म भी की जा रही थी। घर में अच्छी चहल-पहल हो रही थी, हवेली बहुत दिनों पश्चात ऐसे झिलमिलाई है ,हवेली की रौनक देखते ही बन रही थी। उन सभी लोगों के व्यवहार और उसे हवेली की चमक -धमक को देखकर रूही सोचने लगी -शिखा के साथ जो कुछ भी हुआ क्या वह एक सपना था ,उसका विश्वास डगमगाने लगा , मेरा' प्रतिशोध', बेमानी तो नहीं।नहीं ,ये भी सच है और वो भी सच था। मेरे साथ जो कुछ भी हुआ था ,उसमें सच्चाई थी , तभी तो रूही का जन्म हुआ।
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