रूही और गर्वित को पारो ने,विवाह में बहस छिड़ती देखकर वहां से भगा दिया। जब उन दोनों के भागने की जानकारी ठाकुर परिवार और डॉक्टर अनंत को मिली ,तब वे लोग एकदम शांत हो गए। तब हरिराम जी ने गर्वित को फोन किया। पहले तो गर्वित ने फोन ही नहीं उठाया ,जब लगातार उनका फोन आता रहा ,तब उसने उन्हें बताया - हम आपको घर पर ही मिलेंगे ! आप लोग घर पहुंचिए !
एक विजयी मुस्कान के साथ सभी मुस्कुराये और बोले -अब हम सभी चलते हैं ,हमारे यहाँ रुकने का अब कोई औचित्य नहीं रह गया है। मन ही मन सभी गर्वित की बात से प्रसन्न थे, उन्हें लग रहा था- कि डॉक्टर के सामने, उसने ,हमारा सर गर्व से ऊंचा कर दिया। डॉक्टर की बेटी, हमारे बेटे के लिए ,अपना घर त्यागने को तैयार हो गई ,अब तो अवश्य ही हमारी रस्मों का सम्मान करेगी।
गर्वित !हम लोग कहां जा रहे हैं ? रूही ने गर्वित से प्रश्न किया।
कहां जाएंगे ? तुम्हारी ससुराल ही जा रहे हैं, यानी कि अपने घर अब वही घर तुम्हारा भी होगा।
जिस तरह मैं तुम्हारे लिए अपना घर छोड़ कर आ गई, क्या तुम भी मुझे, अपने घर परिवार में इस तरह सम्मान दिलवा सकोगे। मेरे मान- सम्मान में कोई कमी तो नहीं होगी। मैं चाहती हूं, मैं, तुम्हारे नाम की तरह तुम्हारे प्यार पर भी, गर्व कर सकूं। मेरा साथ कभी मत छोड़ना ! मैं तुमसे बहुत प्रेम करने लगी हूं। मैं बस तुम्हारी और तुम्हारी बनकर रहना चाहती हूं। शिखा के इतना कहते ही , गर्वित को फिर से अपने घर परिवार की रस्मों के विषय में, स्मरण हो आया और सोचने लगा -यदि इसने, वो बात नहीं मानी तो क्या होगा ? क्या यह भी शिखा की तरह इन रस्मों को अपनाएगी या नहीं।
क्या सोच रहे हो ?कहते हुए रूही ने , गर्वित के कंधे से अपना सिर रख दिया और पूछा -मैंने तो तुम्हें अपने प्रेम का सबूत दे दिया, अपने पिता की इच्छा के विरुद्ध मैं, तुम्हारे साथ, तुम्हारे घर चलने को तैयार हूं। तुम अपने प्यार का सबूत किस तरह दे सकते हो ?
तब वह बोला -मैं हमेशा तुम्हारे साथ रहूंगा,मुझ पर विश्वास रखो !
फिर स्वयं ही कहने लगी -मुझे कभी धोखा मत देना,एक पत्नी के लिए ससुराल में उसके पति का साथ ही बहुत है। तब वह बोली -हम सीधे ससुराल नहीं जाते हैं , क्यों न, हम किसी होटल में ठहर जाएं ?
गर्वित को भी यह विचार पसंद आया और बोला - तुम सही कह रही हो, किसी होटल में ही चलते हैं ?
दूसरी तरफ गर्वित के परिवार वाले, मन ही मन खुश हो रहे थे आखिर हमारे बेटे के प्यार की जीत हुई। उसने, हमारे परिवार का मान सम्मान बनाए रखा। वे लोग प्रसन्न होते हुए ,अपने घर पहुंच गए। बहुत देर तक, जब बेटा -बहु घर नहीं पहुंचे तब उन्हें चिंता सताने लगी। आपस में बोले - वे लोग तो, बहुत देर से निकले हुए थे। तब भी वह, हमसे पहले नहीं पहुंचा तब बलवंत सिंह जी ने गर्वित को फोन किया - गर्वित !तुम कहां हो ?
पापा मैं , रूही को लेकर होटल में आ गया हूं। बलवंत सिंह जी ने यह बात दमयंती को बतायी , तब दमयंती घबराई और बोली -क्या तुम जानते नहीं हो ? कि नई बहू के साथ यहां की कुछ रस्में भी हैं , इस तरह बहु को होटल में ले जाना उचित नहीं था। तुम्हें सीधे घर आना चाहिए था, मन ही मन में घबरा रही थी कहीं गर्वित को उससे लगाव तो नहीं हो गया।
विवाह के पश्चात, सब हनीमून मनाने, बाहर ही जाते हैं, मैं कोई नई रस्म निभा रहा हूं। यह तो अच्छा है कि मैंने आप लोगों को बताया है,' कि मैं कहां पर हूं ? 'हम लोग तो वहां से बिना बताए ही चले आए, गर्वित ने एहसान दिखाया। मन ही मन गर्वित भी नहीं चाहता था, कि उसके परिवार की कोई भी ऐसी रस्म हो, जिसमें उसके अन्य भाई भी शामिल हों। वह कुछ दिन के लिए वो रूही के साथ, अकेले में रहना चाहता था।
तुम सीधे-सीधे घर चले आओ ! क्या तुम इस हवेली का विनाश देखना चाहते हो ? बड़ों का आशीर्वाद लिए बगैर तुम कैसे होटल में रह सकते हो ? दमयंती जी ने आदेश दिया, उनकी बात सुनकर गर्वित को गुस्सा तो आया किंतु घर जाने के लिए तैयार होने लगा। उधर उसने, रूही की तरफ देखा जो भोजन करके बड़े सुकून से उस होटल के कमरे में सो रही थी। गर्वित ने उसे जगाना उचित नहीं समझा और कुछ देर के लिए स्वयं भी उसके बराबर में लेट कर सो गया। जब वह उठा तो उसने देखा, रूही नहा- धोकर तैयार थी।
उसे देखकर गर्वित बोला -अच्छा हुआ, तुम तैयार हो गई मैं भी तैयार होकर आता हूं, हम वापस घर चलते हैं।
क्यों? अभी तो हमें कुछ दिन और यहां रहना है ? रूही ने जवाब दिया। नहीं, रह सकते हैं , मम्मी ने कहा है -बड़ों के आशीर्वाद के बगैर हम लोग यहां नहीं रह सकते।
बड़ों का आशीर्वाद तो हमें, उस समय मिल ही गया था, जब हमने मंडप में फेरे लिए थे, उसके पश्चात सबके पैर छुए थे रूही ने जवाब दिया।
तुम सही कह रही हो, ये बात तो मेरे दिमाग़ में आई ही नहीं ,पर अब क्या करूं ? मम्मी का आदेश है।
करना क्या है ?हम पति -पत्नी हैं ,हमें कोई नियम नहीं तोडा ,अपनी मस्ती में आराम से जायेंगे।
गर्वित को लगा, ये सही तो कह रही है ,तब बोला - इस साड़ी में तुम बड़ी प्यारी लग रही हो, चलो आओ ! 'सुहागरात 'मनाते हैं। उसका इशारा समझ कर रूही बोली -मैं कोई भागे थोड़ी ही जा रही हूं, अभी रात बाकी है, चलो कहीं घूमने चलते हैं।
गर्वित दुविधा में फंस गया, मां का कहा माने या फिर बीवी की सुने। वह उसे लेकर घर से दूर रहना चाहता था और मां उसे हवेली में बुला रही थी। वह जानता था कि हवेली में किस तरह की रस्में होंगी। उसने मन ही मन निश्चय किया कि मैं रूही को घर लेकर तो जाऊंगा किंतु अब वे रस्में नहीं होंगी। रूही मेरी है, मन ही मन गौरव, सुमित और पुनीत के विषय में सोचने लगा और सोचकर ही उसे गुस्सा आने लगा। न जाने उसे क्या सूझा, उसने पीछे से जाकर रूही को अपनी बाहों में भर लिया और बोला - मैं, तुम्हें किसी के साथ नहीं बांट सकता।
यह तुम क्या कर रहे हो ? किसके साथ नहीं बांट सकते ?अनजान बनते हुए रूही ने पूछा।
आओ ! हम दोनों एक हो जाते हैं। रूही ने आहिस्ता से और बड़े प्रेम से, गर्वित को अपने से अलग किया और बोली - तुम इतने परेशान और बेचैन क्यों हो ?क्या तुम मुझसे कुछ कहना चाहते हो ? क्या तुम्हारे मन में कोई और भी सोच है ?
