पारो, रूही की ससुराल में से आए, सभी आभूषणों को देखकर अचंभित हो रही थी, उसे आश्चर्य था, आज के समय में भी इतने आभूषण और गहने, इन लोगों का रहन-सहन कितना ऊंचा है? तब वह शिखा से कहती है -इतने गहनों के लिए तो कोई भी, कुछ भी करने के लिए तैयार हो जाए। इसमें क्या बुराई है ?तुम उस हवेली की इकलौती बहु बनोगी।
पारो की बातें सुनकर रूही को बुरा लगा और बोली -सबकी अपनी-अपनी सोच होती है ? वह समझ नहीं पा रही थी कि पारो सच में अपने विचार रख रही है या फिर उससे मजाक कर रही है।
रूही और गर्वित का विवाह होता है,जब दोनों भोजन करने के लिए साथ बैठते हैं ,तब गर्वित ,अपनी योजनानुसार रूही से पूछता है -अब तुमने क्या सोचा है ?
किस विषय में ?
अभी मेरे घरवाले, तुम्हारे घरवालों से, तुम्हारी विदाई कराने के लिए आएंगे,तुम्हारे पापा के विचारों में कोई परिवर्तन हुआ या नहीं।
उनके विचारों में क्या परिवर्तन होना था ?मेरे पापा ने ,तो तुम्हें पहले ही बता दिया था-' कि तुम्हें उनका घर जमाई बनना है, फिर तुम ऐसी बातें क्यों कर रहे हो ?
किंतु मेरे घर वाले नहीं मानेंगे, गर्वित ने अपनी विवशता जाहिर की,तब वह बोला -देखो !मैं तुमसे बहुत प्रेम करता हूँ ,मैं तुम्हारे प्यार के लिए कुछ भी कर सकता हैं ,किन्तु तुम्हें, अपने घरवालों को समझाना चहिये था। क्या तुम, मुझसे प्रेम नहीं करतीं ,क्या हमारे प्यार के लिए तुम इतना भी नहीं कर सकतीं।
यही बात अगर मैं, तुम्हारे लिए बोलूं ,तब....
मैं तो तैयार हूँ ,गर्वित झट से बोला किन्तु हमारे परिवार की कुछ रस्में हैं, नए दुल्हा -दुल्हन को उन रस्मों को निभाना पड़ता है।यदि मजबूरी न होती तो मैं ,तुमसे कुछ नहीं कहता। रूही मन ही मन सोच रही थी- मैं उन रस्मों को जानती हूं।
क्या उन रस्मों के पश्चात हम वापस घर आ सकते हैं? उसने जानबूझकर प्रश्न किया।
हां हां क्यों नहीं? खुश होते हुए गर्वित ने जवाब दिया।
तुमने उन रस्मों के लिए अपने माता-पिता को समझाया, क्यों नहीं ? पुरानी रस्में हैं , उन्हें आज के समय में कौन मानता है ? शिखा ने गर्वित के मन की बात जाननी चाही, कि वह क्या सोच रहा है ?
मैं जानता हूं, कि रस्में पुरानी हैं लेकिन अगर वे रस्में हमारे घर में नहीं होंगी, तो एक तरह से देखा जाए तो ये हमारे परिवार को श्राप ही लगेगा,कई बार मजबूरी भी बन जाती है।
तुम कहना क्या चाहते हो?कुछ भी न समझते हुए रूही ने प्रश्न किया।
मैं यह कहना चाहता हूं कि मेरे, परिवार में मेरी दादी ने, इन रस्मों को बनाया था और यदि वह रस्म नहीं होती है तो फिर हवेली का सर्वनाश निश्चित है। मन ही मन रूही ने सोचा, अब यदि मैं तुम्हारे हवेली में गई, वैसे ही तुम्हारा सर्वनाश् निश्चित है।
कभी-कभी हमारे बड़े भी ऐसी गलतियां कर जाते हैं, जिनसे निकलना, उबरना संभव नहीं होता, और परिवार के लिए दुखदाई तो होता ही है। रूही ने गर्वित की आंखों में झांकते हुए कहा।
उधर गर्वित के परिवार वाले, लड़की को विदा कराने की बात कर रहे थे किंतु डॉक्टर साहब बोले -मैं अपनी बेटी को कैसे विदा कर सकता हूं ?ये मेरी इकलौती बेटी है , मैंने तो पहले ही कहा था आपके बेटे से भी बता दिया था कि वह घर जमाई बनकर रहेगा।
वाह !जी आप भी कैसी बातें कर रहे हैं ? यह तो सदियों पुरानी रीत चली आई है ,हमेशा से ही पिता ने अपनी पुत्री को विदा कर उसकी ससुराल भेजा है। आप ये कौन सी अनहोनी रीत चलाना चाहते हैं ?हम क्या बहु को लिए बग़ैर ख़ाली हाथ लौट जाने के लिए आये हैं। हमारे घर में बहु के स्वागत की तैयारियां हो रही होंगी। हम घर पहुंचकर उन्हें क्या जबाब देंगे ?
किन्तु मैंने तो आप लोगों से पहले ही कह दिया था -'रूही ,मेरी इकलौती बेटी है ,उसके बिना हम कैसे रहेंगे ?अब तो जैसे डॉक्टर अनंत सच में ही रूही के पिता बन गए थे। उनके मन में रूही के घर से जाने की बात दिमाग़ में आते ही बेचैन से हो गए। दोनों ही अपने-अपने जिद पर अड़ गए थे। उधर लड़का और लड़की भोजन कर रहे थे , पारो भी उनके साथ थी।
पारो ,बाहर देखकर आई ,कि वहां का वातावरण काफ़ी तनावपूर्ण हो गया है , तब पारो ने रूही और गर्वित के समीप आकर दोनों से पूछा -क्या तुम दोनों एक दूसरे से प्रेम करते हो ? रूही के विषय में तो पारो पहले से ही जानती थी, किंतु गर्वित के विचार जानना चाहती थी , गर्वित बोला - मैं भी, इससे बहुत प्यार करता हूं।
तुम दोनों को क्या सही लगता है ? क्या तुम्हें, इनके परिवार की रस्में निभानी चाहिए या नहीं पारो ने रूही से पूछा।
मैं इनके परिवार की रस्में निभाना तो चाहती हूं, अपनी ससुराल भी जाना तो चाहती हूं, किंतु मैं पापा के विचारों की अवहेलना भी नहीं कर सकती, वो, मुझसे बहुत प्यार करते हैं। यदि मैं अपनी ससुराल चली गई तो उन्हें दुख होगा।
यह बात तो है , मौसा जी चाहते हैं,' कि तुम उनकी नजरों के सामने रहो ! किंतु यदि तुमने निर्णय कर ही लिया है, तो मैं तुम्हारे साथ हूं कहते हुए पारो ने,रूही की तरफ आंख मारी और बोली -अभी मौका है, बाहर गाड़ी खड़ी है, इससे पहले की कोई बात बढे, तुम दोनों चुपचाप यहां से निकल जाओ !
तुम कहना क्या चाहती हो ? गर्वित ने, पारो से जानना चाहा।
इसमें कहना क्या है ? तुम ससुराल जाना चाहती हो, तुम घर- जमाई बन कर रहना नहीं चाहते, या अभी अपने परिवार की रस्में निभाना चाहते हो किसी न किसी एक का दिल तो दुखेगा ही, मौसा जी को मैं संभाल लूंगी। तुम दोनों, अपनी ससुराल के लिए रवाना हो जाओ ! यही मौका है, यहाँ से भाग जाओ !
रूही मन ही मन सोच रही थी ,क्या पारो की यही योजना है ?इस योजना के विषय में तो इसने मुझे कुछ नहीं बताया। क्या सोच रहे हो ?निकलो यहां से ! पारो की बात सुनकर दोनों को यह बात अच्छी लगी, और दोनों पीछे के रास्ते से निकलकर गाड़ी में बैठ गए। अंदर बातें नहीं हो रही थी, बल्कि बहस छिड़ रही थी , लड़की विदा होगी और अपनी ससुराल जाएगी। दूसरी तरफ वे लोग कह रहे थे -'हम अपनी लड़की को विदा नहीं करेंगे बल्कि आपके बेटे को ही घर- जमाई बनाकर रखेंगे।
तभी पारो दौड़ते हुए ,उस स्थान पर आई और बोली -वे दोनों न जाने कहां चले गए हैं ?आप लोग यहां लड़ते रहिये ! दूल्हा- दुल्हन न जाने कहाँ गायब हो गए हैं ? उसकी बात सुनकर सब चौंक गए। उधर गर्वित को यह सब करना अच्छा लग रहा था, उसे अच्छा लग रहा था कि यह मुझे इतना प्यार करती है कि अपने पिता का कहना न मानकर यह मेरे लिए अपना घर छोड़ कर आ गई। तभी हरिराम जी ने गर्वित को फोन लगाया और पूछा - तुम लोग कहां पर हो ?
