एक विशाल 'आध्यात्मिक आश्रम 'है ,जिसे लोग '' सत्संग घर''भी कहते हैं , उसमें बहुत से, मानव रूपी आत्माएं सकारात्मक ऊर्जा और शांति की तलाश में आती हैं , कोई एक दूसरे से ज्यादा बात नहीं करता है, जैसे अपने में ही मगन रहते हैं ।इन्हें यहाँ न परिवार ,न समाज की चिंता सताती है। किसी से मिलते भी हैं, तो अपने प्रभु का नाम स्मरण करते हुए किसी का स्वागत करते हैं। यहाँ का वातावरण शांत और भक्तिपूर्ण है ? सबके हृदय में भक्तिभाव है। सबको उस परमात्मा को पाने की लालसा है।
ये सभी शांति और आत्मज्ञान खोज में यहाँ आये हैं ,मन में कुछ प्रश्न उमड़ते हैं किन्तु उन्हें शांति पूर्वक शांत किया जाता है। पहली बात तो ये वहां का वातावरण देखकर ,सभी प्रश्न समाप्त हो जाते हैं। मन धीरे -धीरे शांत होने लगता है। इसी शांति की खोज में एक दो नहीं ,लाखों की तादाद में भक्तजन आते हैं। सम्मानित समाज के बड़े से बड़े पदाधिकारी भी वहां आकर गुरु का आशीर्वाद पाना चाहते हैं। उन्हें इस सत्संग से कोई मतलब नहीं ,वो तो दर्शनाभिलाषी हैं ,समाज में रहकर समाज के लोगों का कल्याण चाहते हैं इसीलिए गुरुदेव से आशीर्वाद चाहते हैं।
आज का सत्संगशाम को 4:00 बजे से होगा। गुरु जी के आने से पहले, सभी भक्तजन, उनकी गद्दी , उनके आसपास के वातावरण को साफ- सुथरा करने में व्यस्त है।हर एक चीज बड़े ही क़रीने से सजाई जा रही है ,हर एक वस्तु को बड़े भक्तिभाव से संभालकर रखा जा रहा है। अन्य भक्त जनों के बैठने के स्थान को भी स्वच्छ किया जा रहा है। वातावरण कितना सुंदर लग रहा है ? मन यहीं रमण करना चाहता है।
इस दिन दुनिया में रखा ही क्या है ? जीवन जंजाल बना है ,बस ऐसे गुरु मिल जाएँ जो जीवन सँवार दें !
सही कह रहीं हैं बहन जी !जीवन का कोई उद्देश्य नजर नहीं आ रहा ,बस जिंन्दगी यूँ ही बीत रही है ,कोई अपना नजर नहीं आता।
अरे !चलो जी ,गुरूजी आ गए ,कहकर दोनों यथास्थान बैठ जाती हैं।
कुछ समय पश्चात, गुरुजी आते हैं और सिंहासन पर बैठ जाते हैं ,सभी बड़े प्रेम से और बड़े आदर के साथ अपने स्थान पर खड़े होकर उसे सम्मान देते हैं। उनके चेहरे की तेज़ को देखकर ह्रदय भक्तिभाव से भर उठा,कुछ ने अपने हाथ जोड़ दिए। गुरु जी की भाव भंगिमा कितनी अच्छी है ? इनको देखते ही, रहने का मन करता है, एक भक्त ने कहा। तभी दूसरे ने उसे रोक दिया और बोला -शांत रहिए ! आवाज मत करिए ! गुरुजी अभी बोलेंगे। वहां पर इतनी शांति थी, यदि सुईं भी गिर जाए तो उसकी भी आवाज आ जाए। तभी सुंदर शब्दों में, गुरुजी की वाणी उभरी सब उनकी तरफ देखने लगे, कुछ लोग हाथ जोड़कर बैठ गए कुछ भावुक होकर ,आंखें मुद कर बैठ गए। तभी गुरु जी ने पूछा -हम ''सत्संग'' क्यों करते हैं ?सभी ने हैरानी से उन्हें देखा ,देख क्या रहे हैं ?बताइये ! हम सत्संग में क्यों आते हैं ?एकाएक इस तरह का प्रश्न किया, सभी उनकी तरफ देखने लगे। हम सभी लोग सत्संग करते हैं, लेकिन हमारे इस सत्संग का क्या उद्देश्य होना चाहिए अथवा क्या उद्देश्य है ?
संत जनों का साथ एक भक्तजन ने हाथ खड़े करके कहा।
गुरु जी ने उसकी तरफ देखा और मुस्कुराए और बोले -संतजन कौन लोग होते हैं ? क्या यहां बैठे हुए ,सभी लोग संत जन हैं ?
संत का अर्थ है - सत्य का ज्ञानी ! जिसे अध्यात्म का ज्ञान हो।
क्या समाज में रहने वाले अन्य लोग ज्ञानी नहीं होते ?गुरूजी ने फिर से प्रश्न किया।
ज्ञान तो विस्तृत है ,किन्तु वह ज्ञान सामाजिक होता है ,एक अर्थशास्त्री ,राजनीति शास्त्र ,वेद -पुराण पढ़ने वाले ,रसायन शास्त्र और वनस्पतियों का ज्ञान रखने वाले ,भाषाओँ का ज्ञान रखने वाले या फिर अस्त्र -शस्त्रों का ज्ञान रखने वाले भी ज्ञानीजन की श्रेणी में ही आते हैं किन्तु अध्यात्म से संबंधित ज्ञान रखने वाले ,आत्मज्ञान रखने वाले ,संसार में रहकर भी संसार से अनुरक्ति रखने वाले ,संतजन की श्रेणी में ही आते हैं। वे ह्रदय से कोमल ,सत्य का आचरण करने वाले ,निस्वार्थ भाव से समाज का सही मार्ग दर्शन करने वाले होते हैं ,उनका जीवन ईश्वर को समर्पित होता है। मेरे अनुसार वही ''संतजन'' हैं।
तो क्या ''साधु'' संतजन की श्रेणी में आ सकते हैं या नहीं।
साधु जो साधना में लीन रहता है किन्तु संतों की साधना पूर्ण हो चुकी होती है ,वे अपने ज्ञान से इस संसार के लोगों का सही मार्गदर्शन करते हैं। संत शब्द संस्कृत में' सत ' यानि सत्य को जानने वाला होता है , जो परम् ज्ञान को प्राप्त हो।ऐसे संतजनों का साथ ''सत्संग '' कहलाता है।
हम सभी संत जनों में कुछ महिलाएं हैं, तो कुछ पुरुष भी हैं, जो इस सत्संग का लाभ उठाना चाहते हैं। सबसे पहले तो हमें लगता है कि' सत्संग' में कुछ लोग, इसीलिए आते हैं ताकि उन्हें सत्संग में ज्ञान ही नहीं, शांति और परम आनंद की प्राप्ति हो। कुछ लोगों का उद्देश्य' शांति ' और 'आनंद प्राप्ति'' ही है।कुछ पल या घंटे आकर अपने व्यस्त जीवन में से सुकून पाना चाहते हैं इसीलिए आ जाते हैं। जब ज्ञान उन्हें प्राप्त होगा, जब उनके मन में शांति भी होगी,' मोह -माया' से दूर होंगे।
किंतु उसे'' सत्संग'' की आवश्यकता क्यों पड़ी ? ज्ञान तो उसे किताबों में भी मिल सकता है। कुछ लोग सच्चे ज्ञान को प्राप्त करने के लिए गुरु को धारण करते हैं किंतु कुछ लोग, मन की शांति के लिए सत्संग में आते हैं, कुछ देर यहां, ज्ञान प्राप्त करते हैं किंतु जैसे ही समाज में प्रवेश करते हैं, उनका मन वैसे ही पहले की तरह विचलित हो जाता है। समाज के चक्रों में फंसकर रह जाता है। क्या यहां सत्संग घर में कोई ऐसी विशेष बात है, जो तुम्हें 'परम शांति' देती है। यह तो एक सामान्य सी बात है, सभी लोग जानते हैं -कि मोह -माया को त्यागो ! छल -कपट न करो ! किसी से ईर्ष्या मत रखो ! पराई स्त्री ,पराये धन पर नजर मत डालो ! यह सब जानने के बावजूद भी, फिर भी लोग'' सत्संगघरों'' में ही क्यों आते हैं ? क्या यहां पर, गुरुजी कुछ अलग से ज्ञान देते हैं, वही बातें समझा देते हैं, जीवन से कट कर, कुछ घंटे के लिए या पलों के लिए, आदमी अपने आप को, और अपने जीवन की समस्याओं को भूल जाता है, इसीलिए वह सत्संग का लाभ उठाने के लिए यहां आता है।
यहां से जाने की पश्चात क्या वह' सत्य' का साथ देता है, धर्म के मार्ग पर चलता है, 'झूठ बोलना छोड़ देता है,' जीवन में या मन में आई, विकृतियों को, मिटा देता है। यह सत्संग का मार्ग इतना सरल भी नहीं है , कुछ पल के लिए आये ज्ञान सुना, तुमने उसे, अपने अंदर ग्रहण किया लेकिन में व्यवहार में शामिल नहीं किया, अपनी सोच में शामिल नहीं किया तब क्या उस सत्संग का लाभ है ?
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