Mysterious nights [part 147]

आज गर्वित ने, दमयंती जी से कुछ ऐसा पूछ लिया ,जो उनके किसी भी बेटे ने आज तक सोचा भी नहीं होगा पूछना तो दूर की बात है और आज गर्वित उनके सामने बैठा, उनसे प्रश्न कर रहा था।

  दमयन्ती जी ,ने अपने बेटे की तरफ देखा उन्हें लगा -शायद ,बेटा सच में ही, उस लड़की से प्यार करने लगा है और यदि ये उसके प्यार में पड़ गया तो उस लड़की के साथ, किसी अन्य को बर्दाश्त नहीं कर पायेगा। एक तो वो [शिखा ]पहले ही, तेजस से विवाह करके जब इस घर में आई थी,वो भी 'तेजस' के लिए ही जीना चाहती थी।  हमने उसे रस्मों के बहाने रोका किन्तु उसने हमारी रस्मों को स्वीकार नहीं किया। मैं जानती थी -मैं, ये जो कुछ भी कर रही हूँ, सब गलत हो रहा है किन्तु मैं भी क्या करती ,जब मेरी सास सुनयना देवी ही, ये नियम बनाकर चली गयीं ,अपने आप एक पति के साथ रहीं किन्तु मेरे बच्चों के लिए ये रस्मों का बीज बो गयीं ,उनको स्मरण कर दमयंती का मुँह जैसे कसैला हो गया। उनकी ये रस्म, जैसे इस हवेली के लिए 'श्राप' बन गयी हैं ,सोचते हुए उन्होंने हवेली की तरफ देखा। 


 उनके चेहरे को देखकर गर्वित ने पूछा -मम्मी !आप क्या सोच रहीं हैं ?आपने मेरी बात का कोई जबाब नहीं दिया।

तभी गाड़ी ने हवेली में प्रवेश किया ,तब वो बोलीं - अभी तो आए हैं,रास्ते की थकान  है, थोड़ा आराम करूंगी ,तब बात करेंगे ,कहकर वो गाड़ी से उतरकर आगे बढ़ गयीं।    

बलवंत सिंह जी अकड़ते हुए बोले -देखा ! उन लोगों की क्या योजना थी ?कि हमारा बेटा, उनके घर का, घर जमाई बनकर ही रहेगा। लड़कीवाले होकर भी, उनकी अकड़ और सोच तो देखो !

गर्वित के परिवारवालों के चले जाने पर रूही अपने मौसा जी से बोली - मौसाजी !आप सही जा रहे हैं, आपने लड़की के पिता होने का अच्छा अभिनय किया। 

अभिनय क्या करना ?वो तो मैं लड़की का पिता हूँ, ही..... और अब मेरी सच में यही इच्छा हो रही है ,उनके तो चार बेटे हैं ,एक यहाँ आकर रह जायेगा तो उनका क्या जायेगा ?  

वैसे एक बात समझ नहीं आई ,इनमें तुम्हारी क्या योजना है ?मुझे तो कुछ भी समझ नहीं आ रहा है , जब वो लोग विदा कराने के लिए खड़े होंगे, तो हम कैसे उनसे इंकार कर सकते हैं ?कि हम अपनी बेटी को विदा नहीं कर रहे हैं ,यह रीत तो सदियों से भी चली आ रही है , जब लड़की का विवाह होता है तो लड़केवाले उसे विदा करा कर, अपने घर ही ले जाते हैं। क्या मैं विदा होकर अपने घर से विवाह करके , डॉक्टर साहब के साथ नहीं आ गई ,तारा जी ने उन्हें समझाया।  

यह बात तो मौसी जी, हम भी जानते हैं किंतु इसे, उस घर की लाडली और प्यारी बहु बनना है ,न...  उसके लिए तो हमें कुछ ना कुछ प्रयास तो करने ही होंगे। तब वह रूही से बोली -चलो ! देख लेते हैं, तुम्हारी ससुराल वाले तुम्हारे लिए क्या लेकर आए हैं ?

जैसे ही उसने शगुन के सामान से कपड़े हटाए ! पारो तो जैसे चौंक ही गई और आश्चर्य से बोली -इतनी महंगाई और आज के जमाने में, वही राजा- महाराजाओं वाली शानो- शौकत ! बहुत अच्छा लग रहा है। जेवर, साड़ियां सभी बहुत ही महंगे हैं ,कहते हुए उन्हें उठाकर पहनकर देखने लगी। 

 उन्हें देखकर तो जैसे, रूही पर कुछ फर्क नहीं पड़ा, एक अनजान लड़की को रिझाने के लिए, ये आभूषण , ये जेवर इनकी कोई भी कीमत हो सकती है लेकिन रूही पर इसका कोई फर्क नहीं पड़ा और बोली -ये सब  उस घर की, दी गई सोने की जंजीरें हैं , जिनमें  मुझे वे लोग, जकड़ लेना चाहते हैं। भले ही ये बेशकीमती हैं, कितने कीमती हैं ,मुझे पता है, इनके बदले मुझे, कितनी बड़ी कीमत चुकानी पड़ी थी  ?क्या ये नहीं जानती। ये सब छोडो ! नहीं, मैं गलत बोल गयी हूं अब उन्हें इस रिश्ते की कितनी बड़ी कीमत चुकानी पड़ेगी ?यह तो अब समय ही बताएगा।

रूही की ससुराल से आए सभी जेवर पारो पहन- पहनकर देख रही थी, उसे बहुत अच्छा भी लग रहा था अपने को रानी- महारानी की तरह समझने लगी उन ज़ेवरों को पहनकर उसके करीब आई और बोली -यार ! इतने सारे जेवर हैं, इतने सुंदर आभूषण हैं , इनके लिए तो कोई भी कितनी भी कीमत चुका सकता है ?

तेरा दिमाग तो ठीक है, रूही ने पूछा। देखा ! इन आभूषणों ने, तेरी मति को भी भ्रमित कर दिया है , मैं मानती हूं, ये आभूषण कीमती हैं किंतु क्या इनकी कीमत हमसे ज्यादा है, हमारे स्वाभिमान से ज्यादा है, मुझे ऐसे जेवर नहीं चाहिए, तुझे रखना है तो तू, रख ले ! और यदि उस घर की बहू बन गई तो इससे भी ज्यादा मिलेंगे चिढ़ते हुए रूही ने कहा -और चार पतियों की पत्नी बनकर रहना होगा।

 वैसे इन ज़ेवरों  के लिए, चार पतियों  की पत्नी बनकर रहना, कोई बुरी बात भी नहीं है , पारो हँसते हुए बोली - ये तो और भी अच्छी बात है ,एक पति के साथ तीन पति मुफ़्त !मुफ़्त ! सौदा बुरा तो नहीं है। 

तू सही कह रही है , यदि शान से रहना है, तो इसमें कोई बुराई भी नहीं है ,ऐसा ही कुछ उस दमयंती ने भी सोचा होगा। तभी तो आज वो तेरे लिए उदाहरण बन गयी है।  रूही, पारो  की तरफ ध्यान से देख रही थी उसे लग रहा था, शायद इन आभूषणों  का असर इसके दिमाग पर हो गया है। 

तभी तो तेरी सास भी, इसीलिए चार पतियों के साथ रह रही होगी , जो कुछ भी धन -संपत्ति है, सब उसी का तो है, उसने भी इसी लालच में, विवाह किया होगा। 

हां, उसने मुझे बताया था -कि वह एक लालची महिला थी और धीरे-धीरे उसने सभी को अपना लिया था उसे कोई आपत्ति नहीं थी। 

फिर तुझे क्यों आपत्ति हो रही थी ? पारो ने पूछा। 

सबकी अपनी अपनी सोच है, मैं विवाह करना चाहती थी, एक सुंदर प्यारा सा परिवार चाहती थी , और एक ऐसा जीवनसाथी जो मेरे सुख-दुख में हमेशा मेरे साथ रहे हम एक दूसरे का साथ कभी ना छोड़े ! मेरे लिए तेजस ऐसा ही पति था किंतु किस्मत की मार ऐसी पड़ी , वह मेरी जिंदगी से ही चला गया। 

उनके परिवार की ये रस्में तो तब भी होती, जब वह जिंदा होता , तब तू चार की नहीं पांच की पत्नी होती। 

नहीं, मेरा' तेजस' ऐसा नहीं था , वह उन सब का विरोध करता। 

यह तू सोच रही है, किंतु क्या उसने तुम्हें कभी इस रस्म के बारे में बताया था और जब वह इस दुनिया से चला गया, उसके घर जाकर तुझे पता चला, कि उनके यहां कोई ऐसी भी कोई रस्म होती है। 

यह सब तू, मेरे सामने क्यों दोहरा रही है ? मैं सब जानती हूं मुझे सब स्मरण है, अब मेरी याददाश्त वापस आ चुकी है।

 तब तुमने क्या निर्णय लिया ?

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

Post a Comment (0)
Previous Post Next Post