डॉक्टर साहब ! क्या सोच रहे हैं ? हमारे बेटे को आपकी बेटी पसंद है ,हम भी ,आपके घर आ ही जायेंगे और अब आपकी बेटी तो हमारी हो ही गयी है, बलवंत सिंह जी बोले।
अभी तो आपने उसे देखा भी नहीं ,उसे बिन देखे ही आपने, अपना निर्णय सुना दिया।
गर्वित ने आपकी बेटी की तस्वीर हमें दिखाई थी ,आपकी बेटी बहुत ही प्यारी है ,दमयंती जी और उनके चारों पतियों ने, डॉक्टर अनंत का बेहतरीन स्वागत किया था। वे उनकी रस्मों और उनके पतियों के विषय में जानना चाहते थे किन्तु अपने आपको रोक लिया। इनकी ये रस्म तो ऐसी है ,जिसके विषय में शायद इनके गांव के लोग भी नहीं जानते होंगे। रस्म है ,भी.... या फिर ज़बरन ही बना दी गयी है।
न जाने, मन में कितने सवाल लिए उन्होंने हवेली के लोगों से अपने घर वापस जाने की अनुमति मांगी -अच्छा जी ,अब मैं चलता हूँ , चलते समय डॉक्टर साहब ने भी औपचारिकता वश कहा - कि अब आप सब भी हमारे घर आइयेगा, हमें भी, अपनी सेवा करने का मौका दीजिएगा।
अब हम आपकी बेटी को, देखने के साथ-साथ उसको अपना भी लेंगे,आप तो बस विवाह की तैयारी कीजिये दमयंती जी ने इठलाते हुए कहा।
लगभग पंद्रह दिनों के पश्चात, गर्वित और रूही की अंगूठी की रस्म हो रही थी। उन सभी के प्रसन्नता भरे चेहरे देखकर, रूही मन ही मन कड़वाहट से भर गई थी और सोच रही थी -उनके चेहरे देखकर क्या कोई कह सकता है कि इन सभी के अंदर इतनी क्रूरता भरी है।उसकी नजरों के सामने एक -एककर गर्वित के अ लावा अन्य तीनों के चेहरे भी घूम गए ,उसे वो रात्रि स्मरण हो रही थी ,जब वे चारों उस पर टूट पड़े थे और वो अपने आपको बचाने की नाक़ामयाब कोशिश कर रही थी। इन लोगों ने मुझे मार दिया और देखो ! आज ये ही लोग, दुबारा मुझसे विवाह करने के लिए, मेरे घर के दरवाज़े पर खड़े हैं। अब मेरी रूह ही, इनसे बदला लेगी। तभी पारो ने रूही का चेहरा लाल होते देखा तभी वो उसके पास पहुंची कान में बोली -संभालो !अपने आपको ,सबकी नजरें तुम पर ही हैं।
अब तो रूही के अंदर भी कुछ न कुछ चल ही रहा था, एक बदला, एक षड्यंत्र, आक्रोश, किंतु वह अब अपने चेहरे पर मुस्कान दिखला रही थी। आज पूरा परिवार, उसके सामने खड़ा था। वे सभी प्रसन्न थे, दमयंती को तो जैसे अपनी बेटी ही मिल गई है ,वो रूही से इस तरह का व्यवहार कर रही थी।
अंगूठी की रस्म हो जाने के पश्चात, तब दमयंती रूही के करीब आकर कहती है -अब आपकी बेटी हमारी हो गई है,ये हमारे घर की लक्ष्मी है, हमारे घर की अमानत कुछ दिनों तक ही आपके पास है ,हम शीघ्र ही इसे विवाह करके ले जाएंगे।
जब दमयंती ही ने यह बात कही तो डॉक्टर अनंत बोले -मेरी तो एक ही बेटी है, मेरी बेटी अब किसी के घर नहीं जाएगी बल्कि आपका बेटा ही मेरे यहां आएगा।
डॉ अनंत की बात सुनकर सभी खामोश हो गए, और एक दूसरे की तरफ देखने लगे।
गर्वित को लग रहा था, कहीं इनकी जिद के कारण ,यह रिश्ता ही न टूट जाए, तब वह डॉक्टर अनंत से कहता है -अंकल ! यह बात आपके और हमारे बीच है, हम बैठकर आपस में बात करते हैं , पापा को और मम्मी को बताने की और कोई आवश्यकता नहीं है।
नहीं,तुम्हारे घर वालों को भी तो पता चलना चाहिए कि तुम उनके घर में कुछ दिन और हो फिर तो तुम्हें यहीं आना होगा।
हरिराम जी ने गर्वित को अपने पास बुलाया और उससे पूछा - मैं यह क्या सुन रहा हूं ?क्या तुमने इन लोगों से ऐसा कोई वायदा किया है।
नहीं ,मैंने तो कुछ भी नहीं कहा ,डरते हुए गर्वित ने अपना बचाव किया।
तब इनसे किसने कह दिया - कि तुम उनके' घर जमाई' बनकर रहोगे।
तब गर्वित बोला -इन्हें, जैसे भी यह गलतफ़हमी हुई है, किन्तु आप परेशान मत होइए ! अभी उन्हें इसी गलतफहमी में रहने दीजिए, रूही मुझसे बहुत प्रेम करती है, एक बार विवाह हो जाएगा तो वह मेरे बिना नहीं रह पाएगी और हमारी हवेली में ही प्रवेश करेगी। गर्वित ने अपने परिवार के लोगों को शांत करने का प्रयास किया।
वे लोग , जब घर वापस लौट रहे थे तब, दमयंती जी बोली -मुझे तो यह लगता है कि यह डॉक्टर विवाह में अवश्य ही कुछ अड़चन पैदा करेगा।
मैं जानता हूं ,उस डॉक्टर को अपने ऊपर बहुत घमंड है किंतु उसकी बेटी मुझसे बहुत प्रेम करती है और वह अपने पिता का घर छोड़कर मेरे लिए हमारी हवेली में ही आएगी किंतु अब थोड़ा सा हमें, अपनी रस्मों को, संभाल कर करना होगा। ये लोग शहर में रहते हैं और सभी कायदे कानून जानते हैं, लड़की की बिना इच्छा के, अब ये रस्में पूर्ण होना संभव नहीं है। शिखा के घर वाले, गांव के थे। जानते तो, वे भी थे किंतु हमने उन्हें अपनी रस्मों का पता ही नहीं लगने दिया कि हमारे घर की क्या रस्में हैं ?
इसी तरह इसके परिवार वालों को भी पता नहीं चलेगा , कि हमारे घर में किस तरह की रस्में चल रही हैं ? एक बार यह लड़की हमारे घर आ गई तो डॉक्टर से इसको मिलने ही नहीं देंगे।
नहीं, मम्मी ऐसे नहीं चलेगा, वह पढ़ी-लिखी लड़की है, शहर में रहती है, कुछ भी अड़चन पैदा कर सकती है प्यार से ही उसे समझाना होगा।
क्या मैं पढ़ी -लिखी नहीं थी ,उसकी बात सुनकर दमयंती एकदम तुनककर बोली -मैं तो विदेश में रहकर पढ़ी हूँ।
तब आपने यह सब सहन क्यों किया ? यदि आप तभी इस रस्म का विरोध करतीं तो शायद ये रस्म वहीं समाप्त हो जाती ,आगे ये सभी दिक्क्तें न आतीं।
गर्वित भी आँखें तरेरते हुए ,अपनी माँ से बोला।
ऐसे में दमयंती उससे कैसे कहे? कि मेरी सास ने मुझे सम्पत्ति का लालच दिया था कि जो भी सम्पत्ति मिलेगी, मेरे बेटों को ही मिलेगी, किसी दूसरी महिला के आ जाने से इस हवेली के हिस्से हो जायेंगे किन्तु आज क्या ?मेरी उस गलती की सजा क्या मेरी संतान, जीवनभर भुगतेगी ? अपने आपसे ही प्रश्न कर रही थी। चलो !मैं तो नासमझ थी, तब क्या उन्होंने [सुनयना ]तो इसे, उस तांत्रिक से मिलकर इसे पीढ़ी दर पीढ़ी की रस्म बनाकर ,इस हवेली के लिए शाप बना दिया। सुनयना देवी के विषय में सोचकर दमयंती का ह्रदय घृणा से भर गया। इन्हीं सोच -विचारों के मध्य उनकी गाड़ी ने हवेली में प्रवेश किया।
मम्मी क्या सोच रही हो ?अब उतरोगी भी ,या यहीं गाड़ी में बैठे रहने का इरादा है ,गौरव की आवाज़ ने जैसे उन्हें सोते से जगाया हो।
हम्म्म्म कहते हुए उन्होंने मुस्कुराने का प्रयास किया और गाड़ी से उतर गयीं।
गाड़ी से उतरने के पश्चात गर्वित अचानक अपनी माँ से बोला -मम्मी !ये कैसी रस्में हैं ?मेरी तो कुछ समझ नहीं आ रहा। मैंने अपने दोस्तों के घर में भी देखा है ,और अन्य कई जगहों पर देखा है ,जिस लड़की का जिस लड़के के साथ विवाह होता है ,वो उसी के साथ जीवनभर रहती है, फिर हमारे घर में ही ऐसी रस्म क्यों ?
