पारो और रूही गाड़ी में बैठकर, अब वापस अपने घर आ रही थीं , रूही अपने माता-पिता से मिलकर बहुत प्रसन्न हुई थी, किंतु उसे इस बात का भी दुख था, कि उसके माता-पिता को पता ही नहीं कि उनकी बेटी अब कहां है ? वो लोग, अपनी बेटी से मिलने के लिए तरस रहे हैं। वो चुपचाप बैठी यही सब सोच रही थी -''जिंदगी भी न जाने क्या -क्या खेल खिला रही है ? किस्मत में न जाने क्या -क्या लिखा है ?जिन माता-पिता ने मुझे पैदा किया है, वे जानते ही नहीं, कि मुझ पर क्या बीत रही है या मेरे साथ क्या हुआ है ? बल्कि अपनी बेटी पर उसकी ससुराल वालों की तरफ से लगाए ,इल्ज़ाम की शर्मिंदगी को ढो रहे हैं किन्तु आज भी उन्हें अपनी बेटी की प्रतीक्षा है। मुझे उनके, अपनी बेटी के कारण झुके हुए सिर को सम्मान दिलवाना है और उन ज़ालिमों के चेहरों से झूठ का नक़ाब उतार फेंकना है।
आज , जिन माता-पिता को ईश्वर ने कोई औलाद नहीं दी, वे ही मेरे अपने माता-पिता होने का फर्ज निभा रहे हैं और मेरा सहयोग भी कर रहे हैं।
तभी पारो ने पूछा -क्या सोच रही हो ?अब तो तुम अपने माता-पिता से मिलकर संतुष्ट हो।
हां, उनसे मिलकर संतुष्ट तो हुई हूं किंतु अब मुझे लगता है, मुझे शीघ्र ही विवाह कर लेना चाहिए।
क्या ? आश्चर्य से पारो ने पूछा- यह तू क्या कह रही है ? मैं सही कह रही हूं अब मुझे गर्वित से शीघ्र से शीघ्र विवाह कर लेना चाहिए। तुम लोग तो मेरे साथ हो ही और अब उनका आशीर्वाद भी मुझे मिल गया है। मैं अब तैयार हूं, जैसे मन ही मन रूही ने कुछ फैसला कर लिया था।
गर्वित ! तुम विवाह के लिए कब तैयार हो रहे हो ?तुमने अपने घरवालों से बात की, रूही ने गर्वित से पूछा।
क्या तुम्हारे माता-पिता, तुम्हारा विवाह करके, हमारे घर भेजने के लिए तैयार हो गए हैं ?
यह कैसा प्रश्न है ? तुम यह कैसी बातें कर रहे हो ?पापा ने तो शुरू में ही कह दिया था -कि तुम्हें' घर जमाई' बनना है फिर तुम यह कैसी बातें उठा रहे हो ? क्या तुम मुझसे प्यार नहीं करते हो ? उनकी बात भी तो अपनी जगह सही है, उनकी मैं ही तो इकलौती औलाद हूं, तुम्हारे तो और भाई भी तो है, जो उनके साथ रह सकते हैं। जब एक लड़की अपना घर छोड़कर, अपनी ससुराल में आकर रह सकती है तो क्या उसके लिए उसका पति अपना घर नहीं छोड़ सकता ?
मैं तुम्हारे लिए कुछ भी करने को तैयार हूं , हम ठाकुर परिवार से हैं ,हमारे यहां बहुएं आती हैं, बेटे'' घर जमाई'' बनकर नहीं जाते , तुम अपने माता-पिता को समझाओ !
उस दिन तो तय हुआ था, कि कुछ दिन तुम यहां आकर रहोगे, क्या तुम यह बात भूल गए ?
मैं कुछ भी, भूला नहीं हूं, किंतु इसके लिए घर वालों को तो मनाना ही पड़ेगा।
तो क्या तुमने अब तक अपने घरवालों से बात ही नहीं की है ?नाराज होते हुए रूही ने पूछा।
घरवालों से मैंने बात की है ,उनके विचार जानकर ही तो मैं ये बातें कर रहा हूँ , हां, यह हो सकता है कि तुम अपनी ससुराल चली आओ और फिर धीरे-धीरे हम यहां भी आने लगेंगे। थोड़ा माता-पिता भी बात को समझेंगे। कुछ दिन यहां रहेंगे कुछ दिन वहां ,शुरुआत तो यहीं से होगी कि तुम विदा होकर हमारी हवेली में आओगी ,उसके पश्चात मैं कोई भी बहाना बनाकर वापस यहाँ आ जाऊंगा।
क्या सच ? तुम मुझसे, कितना प्यार करते हो ?रूही ने मुस्कुराकर गर्वित की तरफ देखा किंतु अब क्या करना है ?
करना क्या है? बस विवाह करना है, तुम अपने घरवालों को, मेरे घर भेजो !हमारे यहां लड़की वाले ही, लड़के वालों के घर जाते हैं।
अब तुम भी न जाने ,यह कैसी बातें लेकर बैठ गए हो ? क्या थोड़े से कायदे कानून हमारे प्यार के लिए बदले नहीं जा सकते ?रूही उसके कंधे से लगकर बोली।
जो नियम है, सो नियम है ,डॉक्टर साहब को तो हमारे घर आना ही होगा।
ठीक है, मैं पापा से बात करके देखती हूं ?मुझे तो यह सब मालूम नहीं है ,मेरा तो पहली बार ही विवाह हो रहा है ,कहते हुए रूही हंसने लगी।
अच्छा जी ,मेरे क्या कई विवाह हुए हैं ?गर्वित ने पूछा।
मैं क्या जानू ?हो सकता है ,मुझसे पहले भी तुम्हारी ज़िंदगी में कोई आई हो।
रूही की बात सुनकर गर्वित गंभीर हो गया और बोला -हमारे घर में तो एक ही आएगी ,रूही वही समझ रही थी ,जो गर्वित ने कहा था।
डॉक्टर अनंत ने जब यह सब सुना, तो बोले -उनकी यह बात सही है, लड़के वाले के यहां पर लड़की वाले ही जाते हैं और मैं तुम्हारे लिए उनके घर जाने को तैयार हूं।मैं भी तो देखूं ,उस हवेली में ऐसा क्या है ?
उस हवेली में ,मासूमों की सिसकियाँ हैं ,गरीबों की आह है ,अपनों की बद्दुआ है,ख़ामोशी है ,इतनी आलिशान हवेली होने के बावजूद भी ,एक ड़र उसके अंदर बसा हुआ है, रूही ने जबाब दिया।
वो अब तुम्हारी होने वाली होने वाली ससुराल है ,ऐसे तो मत कहो !तारा जी ने कहा।
डॉ अनंत ने पहली बार उस हवेली में प्रवेश किया, बड़ी शानदार हवेली थी। बाहर से कुछ पुरानी हो गई थी किंतु उनके रहन-सहन से पता चल रहा था कि वे कोई जानी-मानी हस्ती है, डॉक्टर साहब, उन लोगों को देखकर आश्चर्य से यह सोच रहे थे ऐसी शानदार हवेली में रहने वाले लोगों की सोच इतनी छोटी कैसे हो सकती है। वे लड़की के पिता थे, इसीलिए उनका शानदार स्वागत हुआ था बातचीत के दौरान, उन लोगों ने डॉक्टर साहब को, एहसास कराया कि उनका समाज में कितना बड़ा रुतबा है , लोग उन्हें कितना मानते हैं ? कई शहरों में उनके व्यापार हैं जो उनके बच्चों ने संभाले हुए हैं ,उनके बच्चों को किसी के आगे, आज हाथ फैलाने की आवश्यकता नहीं, इतनी संपत्ति है, कि वह बैठकर खा सकते हैं।
इतनी संपत्ति और उस हवेली की शानो -शौकत देखकर कोई भी पिता, अपनी बेटी को भाग्यशाली समझेगा, परिवार के लोग मिलजुल कर कार्य भी कर रहे थे ,लेकिन उन्हें यह सोचकर आश्चर्य हो रहा था, कि इन लोगों ने, अपने घर की बहू को जीते जी मार दिया। इनके चेहरे और व्यवहार को देखकर ऐसा नहीं लग रहा था, वे ऐसा भी कर सकते हैं लेकिन उन्होंने किया है इसका जीता जागता सबूत , उनके घर में मौजूद है। कितने इज्जतदार बनते हैं किंतु उनके मन की कलुषता न जाने, कितने लोगों के जीवन को बर्बाद कर चुकी है।
तभी उन्हें अपने आप पर ही हंसी आई,मैं भी न जाने क्या -क्या सोचने लगा हूँ ?ये कोई कार्टून या बच्चों की फ़िल्म नहीं, जिसमें बुरे चरित्र को दिखाने के लिए उसके चेहरे को अजीब या राक्षस जैसा बनाया जाता है या फिर उसके सींग लगा दिए जाते हैं,ताकि उसका चरित्र ,व्यवहार से ही नहीं ,वरन बच्चे उसे, उसकी सूरत से भी पहचान सकें। तब वो, उन सभी के चेहरे इस तरह देखने लगे शायद किसी को तो पहचान सकें किन्तु ये इंसान तो ऐसे हैं ,जिनके चेहरों पर एक नहीं कई मुखौटे लगे हैं,इन मुखोटों के पीछे के सही और सच्चे इंसान को पहचानना आसान ही नहीं ,नामुमकिन है।
