इंस्पेक्टर तेवतिया ,कल्याणी जी से मिलने आते हैं ,और उनसे बताते हैं ,हमें लगता है - कोई तो है, जिसने उस लड़की की सहायता की है, और उसे हमसे छुपाया गया था , ऐसा उसका कौन सा दोस्त या रिश्तेदार हो सकता है,हम यह बात आपसे जानना चाहते हैं ?और जब मामला थोड़ा ठंडा हो गया तो... कहते हुए वो शांत हो गये।
इंस्पेक्टर आपको, ऐसा क्यों लगता हैं ?किस बिनाह पर आप ये कह रहे हैं, कि कोई उसकी सहायता कर रहा है।
कुछ नहीं,इंस्पेक्टर ने कल्याणी जी को सारी बात बतानी उचित नहीं समझी,बोले -हमें कुछ ऐसा लगा है जैसे, शिल्पा जी को एयरपोर्ट पर देखा गया है।
एयरपोर्ट पर... ऐसा कैसे हो सकता है ?चौंककर वो बोलीं।
क्यों ?ऐसा क्यों नहीं हो सकता,इंस्पेक्टर ने उनके शब्दों को पकड़ा ,आपको क्या लगता है ? वो कहां गई होगी ? क्या आपने, उसे देखा ?या उसने, आपको फोन किया।
मुझे फोन करती तो क्या मैं उसे अपने पास नहीं बुला लेती फिर जिसने भी उसका अपहरण किया होगा वो उसको फोन क्यों करने देगा ?
आप यह बात, बार -बार मत कहिये !कि उसका अपहरण हुआ है ,उसका अपहरण नहीं हुआ है , हमें लगता है ,वो देश छोडकर ही भाग गयी है।
आप ऐसा क्यों कह रहे हैं ?इस बात का आपके पास क्या सबूत है ? कल्याणी जी ने पूछा।
एयरपोर्ट पर उसके जैसी लड़की को देखा गया है ,उसने अपना नाम और हुलिया बदल लिया होगा।
यदि आपको कोई शक था तो आपने उसे तभी क्यों नहीं पकड़ा ?
हम देखते तो,वहीं पकड़ लेते किंतु उसकी परछाई को देखा है,मेरे कहने का मतलब है -एयरपोर्ट के सी.सी.टी.वी में उसी के जैसी लड़की लग रही थी, जो एयरपोर्ट पर दिखलाई दी। थोड़ा समय तो लग सकता है, लेकिन हम कातिल को और आपकी बेटी को दोनों को, ढूंढ लेंगे इंस्पेक्टर ने विश्वास से कहा।
ठीक है, इंस्पेक्टर साहब ! ढूंढिए ! हम भी परेशान हैं, आखिर हमारी बेटी कहां चली गई ? आज तक उसका न ही कोई फोन आया है और न ही, उसका कोई अता पता है , कल्याणी जी ने जवाब दिया और आप है कि'' खाली हाथ ''इधर चले आते हैं।
इंस्पेक्टर ने कल्याणी जी की तरफ देखा और बोला -हम यहाँ आपको अपनी तहक़ीकात के विषय में बताने नहीं आते ,बल्कि आपको सांत्वना देने चले आते हैं ,हम हत्यारे के करीब ही हैं।तब इंस्पेक्टर उनके घर के नौकरों से कुछ बातचीत करता है, और चुपचाप वहां से निकल जाता है।
इंस्पेक्टर के चले जाने के पश्चात, कल्याणी जी बेचैन सी होकर इधर-उधर टहलने लगीं। पता नहीं, इस लड़की ने कुछ कांड तो नहीं कर दिया है। एक बेटी है, उसने ही हमारे जीवन को दूभर बना दिया है। बहुत दिन हो गए, आज तो रुका ही नहीं जा रहा है सोचते हुए ,एक नंबर पर फोन लगाती हैं। हेेलो ! उधर से आवाज आई।
कीर्ति ! तू कैसी है ?
मैं ठीक हूं, दीदी ! उधर से जवाब आया, क्या आप कुछ परेशान हो? कुछ हुआ है, क्या ?
नहीं, कुछ भी तो नहीं,बस वैसे ही उसके विषय में जानने की इच्छा होने लगी।
वो ,अब तो पहले से बहुत चमक गई है, बहुत खूबसूरत लगती है, आपने जिस उद्देश्य से उसे यहां भेजा था, वह उद्देश्य उसका पूर्ण हुआ।
अब वो कैसी है ? खूब मजे में है, मौज मस्ती करती है ,आप उससे बात करना चाहेंगीं। ख़ुशी की ये बात है उसका कोई दोस्त भी है, लगता है ,यहां आकर उसने कोई दोस्त बना लिया है।
उससे कहना जरा संभल कर रहे, वैसे तो उसे देखने की बहुत इच्छा होती है किंतु हमारे रिश्ते के लिए यही ठीक है, कि वह, हमसे दूर ही रहे। बस तुम अब उसका ख्याल रखना यह समझो ! अब तुम ही उसकी मां हो।
सर ! कल्याणी देवी ने, कोई' इंटरनेशनल कॉल' किया है और वह किसी के विषय में बात कर रही हैं , इंस्पेक्टर तेवतिया से रामगोपाल बोला।
मुझे लगता था, अवश्य ही विदेश में कोई इनका रिश्तेदार हो सकता है जो इनकी हेल्प कर रहा है। मेरा शक सही था, इनकी कोई बात रिकॉर्ड हुई है या नहीं।
हां, सर !यह कहते हुए उसने वह रिकॉर्डिंग सुना दी। उस रिकॉर्डिंग को सुनकर इंस्पेक्टर तेवतिया बोले -यह किसके विषय में बात कर रही है।
बात करने का तरीका ही इनका ऐसा है जैसे 'कोड वर्ड' में बात कर रही हों। हो सकता है, अपनी बेटी के विषय में ही बात कर रही हों । यदि हमने उन्हें यह बताया, कि हम उनके फोन की रिकॉर्डिंग कर रहे हैं किसको, कब फोन करती हैं तो शायद वो सतर्क हो जाएंगी, अभी हमें ,उन्हें कुछ नहीं बताना है।
सर !यह तो पूछ ही सकते हैं कि कोई आपका विदेश में तो नहीं रहता है।
वह झूठ भी तो बोल सकती है, मुझे तो लगता है, वह अपनी बेटी के विषय में जानती है। देखते हैं, किसी दिन टहलते हुए फिर उसके घर जायेंगे और इस विषय पर बात होगी।
लगभग 1 महीने के पश्चात, कुमार मधुलिका से बोला -मैंने एक बाहर का आर्डर ले लिया है, मुझे अब बाहर जाना होगा, बाहर यानी विदेश में जाना होगा।
यह तो बड़ी अच्छी बात है, आपका काम बढ़ रहा है, काम बढ़ेगा तो आमदनी भी बढ़ेगी । क्या मैं भी, आपके साथ चलूं ?किसी बालक की तरह हट करते हुए मधुलिका ने पूछा
यह तुम कैसी बातें कर रही हो ? मैं कोई मोहल्ले- पड़ोस में नहीं जा रहा हूं ,विदेश जा रहा हूं, कितना किराया लगता है ? तुम्हें मालूम भी है।काम हो जाये और आगे काम बढ़ेगा ,तब चलेंगे।
मैं भी जानती हूं, आप विदेश जा रहे हैं, किंतु मैं भी तो घूमना चाहती हूं।इस बहाने मेरा भी घूमना हो जायेगा।
हां-हाँ क्यों नहीं ? जब काम बढ़ेगा तो आमदनी बढ़ेगी, आमदनी बढ़ेगी तो फिर हम दोनों ही ''दूसरे हनीमून'' पर चलेंगे मुस्कुराते हुए कुमार ने जवाब दिया। उसकी बात सुनकर मधुलिका शरमा गई और बोली- ठीक है, अभी आप चले जाइए ! किंतु मेरी भी इच्छा थी कि मैं भी विदेश जाऊँ।
तुम अपने देश में ही नहीं घूमी हो, पहले यहीं पर घूम लो ! मन ही मन सोचा-बड़ी आई विदेश में घूमने वाली और यह सोचकर वह चुपचाप अपना बैग लगाने चला गया।
एक दूसरा देश ,जहाँ न किसी के देखने की फ़िक्र ,एक बड़े से आलिशान होटल में, मैं और वो !समुन्द्र का किनारा होगा वो और मैं हाथों में हाथ डाले एक दूजे में समा जायेंगे। सोचकर ही कितनी ख़ुशी का एहसास हो रहा था। अचानक ही जैसे यामिनी उसकी ज़िंदगी में बहार बनकर आ गयी थी और उससे प्यार भी करने लगी थी किन्तु कुमार ने भी कभी यह जानने का प्रयास नहीं किया उसके परिवार में और कौन -कौन हैं ?अभी तक उसने विवाह किया या नहीं। नहीं किया तो, क्यों नहीं किया ?उसे तो ''आम खाने से मतलब ,पेड़ क्यों गिनना ?'
