Khoobsurat [part 107]

कुमार को,मधुलिका के प्रश्नों और उसके देखने के अंदाज से ,उसे लगता है ,अवश्य ही, इसके मन में कुछ तो चल रहा है।तब वह उसे समझाते हुए ,उससे पूछता है - हमारे विवाह के साढ़े तीन वर्षों में ,तुमने मेरे व्यवहार में या फिर मेरी जिम्मेदारियों के प्रति क्या तुमने, मुझे लापरवाह पाया। क्या मैं, तुम्हारी किसी बात की अवहेलना करता हूँ ?फिर तुम आज ये सब मुझसे किस तरह के सवाल पूछ रही हो ? क्या तुम्हें कोई संदेह है ?तो बताओ !


कुमार की बातें सुनकर ,मधुलिका सोचने पर मजबूर हो गयी , ये बात तो कुमार सही कह रहा है। आज तक इसने मुझे किसी भी चीज की कमी नहीं होने दी और अपने पिता तो क्या, अपने बेटे होने का फ़र्ज भी बख़ूबी निभाता आ रहा है ?हम सभी की जरूरतों का ख्याल रखता है। ये गलत कैसे हो सकता है ?अभी भी अपने बेटे के लिए मैंने, इसे फोन किया और ये आ गया यदि किसी लड़की के साथ होता तो बहाने बना सकता था। अवश्य ही किसी लड़की ने मेरे साथ मजाक किया होगा। किन्तु उसे मेरा नंबर कैसे मिला ?उसकी कुमार से क्या दुश्मनी हो सकती है? मैंने तो अब शिल्पा को भी फोन करके देख लिया ,यदि वो दुश्मनी निभाती,वो तो स्वयं ही मुसीबत में फंसी है। 

अब क्या सोच रही हो ?तुम्हें अपने पति पर विश्वास नहीं ,क्या तुमसे किसी ने कुछ कहा है ?देखो,मधु  !कहते हुए कुमार ने मधुलिका का हाथ अपने हाथों में लिया और बोला -जब कोई ख़ुशी से अपने घर में रह रहा हो ,तो हमारी ख़ुशी में ,खुश होने वालों की संख्या कम ही मिलेगी। ऐसे में जलने वाले ,घर तोड़ने वाले बहतु मिल जायेंगे किन्तु हमें एक दूसरे पर विश्वास बनाये रखना है ,तभी हमारी ये गृहस्थी की गाड़ी आगे बढ़ेगी। इस सबका, हमारे बच्चे पर भी असर होगा ,जो ठीक नहीं है। कहते हुए उसे अपने करीब खींच लिया और मधुलिका भी ,सहजता से उसके करीब होती चली गयी। अब मधुलिका को ,कुमार की बातों में सच्चाई नजर आ रही थी ,वह अब सब कुछ भूल चुकी थी और उसकी बाँहों में सिमटती चली गयी।  

मन ही मन कुमार सोच रहा था ,अब मुझे और सतर्क रहना होगा ,अभी तो मैंने इसे अपनी बातों से बहला - फुसलाकर समझा लिया। न जाने, कैसे इसे मुझ पर शक हो गया था ? चलो !शीघ्र ही समझ भी गयी। अगले दिन जब शिल्पा उठी ,नई ताज़गी के साथ, अपने घर के कामों में व्यस्त हो गयी। कुमार भी काम पर चला गया। दिन में ,अचानक कुमार को ,शिल्पा का विचार आया,वैसे बेचारी के साथ बुरा हुआ किन्तु यदि उसने ही अपने पति [रंजन] की हत्या की होगी तो...विश्वास न होते हुए भी ,मन ही मन बुदबुदाया -कलयुग है , कुछ भी हो सकता है ,आजकल लड़कियां भी कम नहीं ,मधु भी तो मुझे, किस तरह घूर रही थी ?

दो दिन बीत चुके थे ,यामिनी मन ही मन मुस्कुरा रही थी ,खिड़की के समीप खड़ी होकर बाहर का नजारा देख रही थी ,अपने ही ख्यालों में खोयी थी। ये प्यार भी न कैसी चीज है ? मरते को भी जिंदा कर दे ! उदास मन में भी जीवन की उमंगे जगा देता है और इंसान को कितना स्वार्थी बना देता है ? यामिनी ने, आज एक नई पेंटिंग की रचना की थी। जिसमें वह स्वयं उसके साथ कुमार और उनका बच्चा था। अभी यह पेंटिंग पूरी नहीं होगी, अगर पूरी हो भी गई तो अभी कुमार को मैं नहीं दिखाऊंगी। एक बच्चे के कारण कुमार किस तरह मुझे छोड़ कर चला गया ? इसी  तरह, एक बच्चे के लिए ही कुमार मेरे पास लौट भी आएगा। मन ही मन सोच रही थी और मुस्कुरा रही थी, अब तक तो शायद उसके घर में झगड़े  बढ़ गए होंगे। होंगे भी क्यों नहीं ? जब यामिनी ने, तीली लगाई है। किंतु उधर से, एक बार भी फोन नहीं आया, वह तो यह सोचे बैठी थी ,-' कुमार का, उसके लिए फोन आएगा और वह, अपने घर- परिवार से दुखी, बीवी के झगड़ों से परेशान मुझे फोन करेगा और मैं फिर उसे अपने पास बुला लूंगी।उसे अपना प्रेम और सांत्वना दूंगी। विचारों में खोई हुई वो रसोई में कॉफी बनाने चली गयी।  

इस तरह दो दिन और बीत गए, किंतु कुमार का कोई फोन नहीं आया। तब यामिनी ने, स्वयं ही कुमार को फोन किया ,-कुमार के फोन उठाते ही बोली -हेेलो ! कैसे हैं ? वहां जाकर तो आप हमें भूल ही जाते हैं,कभी फोन करके हालचाल भी नहीं पूछते और जब पास भी रहते हैं तो कितना प्यार जतलाते हैं किंतु दूर जाते ही जैसे भूल जाते हैं , अब कब आ रहे हो ?

 मुस्कुराते हुए कुमार बोला -जब तुम बुलाओ ! बंदा हाजिर हो जाएगा , हम तो तुम्हारे गुलाम हैं और बताओ ! तुम्हारी कलाकारी कैसी चल रही है ?

कलाकार तो हम हैं ही, कलाकारी में भी पारंगत है, लेकिन कहीं ना कहीं, कोई ना कोई कमी रह ही जाती है वह अपनी जिंदगी की कलाकारी के विषय में बात कर रही थी और मन ही मन खुश भी हो रही थी।  

तुम्हारी कलाकारी में, क्या कमी हो सकती है ? तुम तो खुद ही ,ईश्वर की तराशी हुई कलाकृति हो।

तुमसे बस, मक्खन लगवा लो ! हर बार मैं ही, इंडिया आती हूं , एक बार तुम भी मेरे पास आओ न.... 

हां हां क्यों नहीं ? लेकिन पता तो चले, कि तुम कहां पर हो ?तभी तो आऊं ,तुम तो हमेशा सैर -सपाटे पर रहती हो। 

 मैं तुम्हारे लिए टिकट भिजवा दूंगी, बस चले आना, तुम्हारे सभी कागज तैयार हो जायेंगे तो चले आना। 

 इन चीजों में कम से कम एक महीना तो लग ही जाएगा किंतु उसके पश्चात कोई रोक-टोक नहीं होगी।मन ही मन कुमार प्रसन्न था इस बहाने विदेश घूमना भी हो जायगा और मौज -मस्ती भी। यहाँ कुमार ने मधुलिका का वापस से विश्वास जीत लिया था और वो पहले की तरह ही अपने परिवार में व्यस्त हो गयी थी। इधर यामिनी कुमार को अपने पास बुलाने का यत्न कर रही थी।  

शिल्पा का गायब होना और उसके पति का क़त्ल ,इस बात को लगभग दो वर्ष बीत चुके थे। पुलिस छानबीन कर तो रही थी किन्तु उसे कोई पक्के सुबूत अभी नहीं मिले थे।एक दिन इंस्पेक्टर तेवतिया ,करुणा जी के घर आये। 

उन्हें देखते ही कल्याणी जी बोलीं - इंस्पेक्टर साहब !मेरी बेटी को गायब हुए  2 वर्ष बीत  चुके हैं, पुलिस भी उसे ढूंढ नहीं पाई, कोई नहीं जानता,अब वह जिंदा भी है या मर गई।

आपकी बेटी को ढूंढने की ,हम अपनी तरफ से पूरी कोशिश कर रहे हैं ,किन्तु कुछ पता नहीं चल पा रहा है। हमें तो लगता है ,उसके छुपने में कोई उसकी सहायता कर  रहा है। 

ऐसे में तो अपने भी दुश्मन बन जाते हैं ,तब उसकी सहायता कौन रहा होगा ?कल्याणी जी ने भड़कते हुए पूछा ।


laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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