किसी भी अनजान फोन पर, कैसे मधुलिका विश्वास कर ले ? दिमाग उसे समझाना चाहता था, किंतु दिल है कि परेशान होना चाहता था, हो भी रहा था, मन विचलित था, मन में अनेक विचार आ जा रहे थे, लेकिन किससे पूछे ? और क्या करें कुछ समझ नहीं आ रहा था। अभी वह ''अंधेरे में ही हाथ -पैर मार रही थी। '' कहीं कुछ तो सुराग मिले ? आखिर वह लड़की कौन हो सकती है ? अंतर्वेदना में, समय न जाने कब पर लगाकर उड़ गया। उसे इस बात का तब पता चला, जब उसका बेटा , स्कूल से आ गया। तब उसे एहसास हुआ, उसके ससुर और उसका बेटा भूखे होंगे।
'' गृहस्थ जीवन इतना आसान भी नहीं है , अपनी उलझनों में उलझ कर भी , उस ग्रहणी को दूसरों के लिए सोचना पड़ता है। अपने विचारों को त्याग कर, आगे बढ़ जाना पड़ता है। कई बार डगमगा जाती है , फिर स्वयं ही उठना और संभलना पड़ता है। '' इसी प्रकार मधुलिका भी, अपने बेटे को देखकर तुरंत ही रसोई घर की तरफ दौड़ी। बेटे और ससुर के लिए भोजन बनाया ।
लगभग 2 घंटे पश्चात, कुमार अपने घर पहुंच गया था। कुमार को देखते ही, आज न जाने क्यों ?मधुलिका को प्रसन्नता नहीं हुई ,उसके आ जाने पर, उसे सुकून तो मिला 'चलो आ गए। '' वह उसके चेहरे को पढ़ने का प्रयास कर रही थी। क्या ये मुझे धोखा दे सकता है ? वह उसे ऐसे देख रही थी, जैसे कोई अजनबी उसके घर में प्रवेश कर गया है। मन में सोचा, क्या यह ऐसा कर सकता है ? अपने आप से ही पूछ रही थी , उसके चेहरे को देखकर लगा, नहीं, यह कोई गलत नंबर होगा। ये भला ऐसा क्यों करने लगा ?मेरा पति है, शादीशुदा है, एक बच्चे का बाप है, फिर भी उस फोन को स्मरण करके, उसे फिर से शंका भरी दृष्टि से देखने लगती है।
कुमार भी, अपने में व्यस्त मधुलिका के ख़्यालों में, अपने घर पहुंच गया ,सोच रहा था -जब भी मौका मिलेगा ,उसे फोन करके पूछूंगा ',मेरे बिना मन लग रहा है ,सोचकर ही उसके चेहरे पर मुस्कुराहट आई किन्तु मधुलिका को अपनी तरफ देखते हुए सम्भल गया।
तब अचानक ही मधुलिका बोली - आप आ गए , मैंने आपके लिए भी, भोजन बना दिया है ,परोस देती हूँ।
कुमार को लगा, ये आज कैसा व्यवहार कर रही है ?मुझे आये हुए आधा घंटा हो गया ,इसने मुझे आते हुए देखा था ,आकर मैंने कपड़े भी बदल लिए और अब पूछ रही है -आ गए ,आप !
तुम ठीक तो हो ,कुमार ने उससे पूछा।
हाँ ,हाँ मुझे क्या हुआ है ? मैं बिल्कुल ठीक हूँ ,कहते हुए उसने भोजन परोस दिया। कुमार देख और सोच रहा था ,आज ये मुझसे कुछ भी नहीं बोली -वरना मेरे आने पर ,न जाने, कितनी शिकायतें करती थी ?आपके बेटे ने मुझे कैसे तंग किया ? पापा जी, की दवाई ख़त्म हो गयी। शाम को खाने में क्या बनेगा ?सब्ज़ी ख़त्म हो गयी, शाम को लौटते हुए ले आना। इस तरह के अनेक प्रश्न करती और आज चुपचाप भोजन परोसकर शांत बैठी है। उसने भी सोच लिया ,शांत है, तो ठीक ही है ,क्यों छेड़ना ?
उसने ये भी जानना नहीं चाहा कि मधुलिका ने भी भोजन किया है या नहीं जबकि आज जैसे मधुलिका उसका टैस्ट ले रही थी ,वो देखना चाहती थी कि क्या कुमार मुझसे भी खाने के लिए पूछेगा या नहीं ?कोई और दिन होता तो वो शायद इस बात पर ध्यान ही नहीं देती किन्तु आज तो जैसे वो कुमार की परीक्षा लेकर अपने बेचैन मन को संतुष्ट कर देना चाहती थी, किन्तु कुमार ने ऐसा कुछ भी नहीं किया ,यह देखकर मधुलिका की आँखों में आँसू आ गए किन्तु वो उन्हें छुपा गयी।
शाम के समय, अचानक ही फिर से मधुलिका को शिल्पा का स्मरण हो आया।
मधुलिका ने, फिर से शिल्पा के घर फोन किया अबकी बार कल्याणी जी ने ,उसका फोन उठा ही लिया था। उधर से' हेेलो' की आवाज आते ही शिल्पा तुरंत बोली -आंटी जी, नमस्ते ! क्या बात है ?सब ठीक तो है, मैंने सुबह आपको फोन किया था, आपने फोन नहीं उठाया। मैंने शिल्पा को भी फोन किया था, शिल्पा ने भी फोन नहीं उठाया।
तुम कौन बोल रही हो ? मधुलिका को ने पहचानते हुए कल्याणी जी ने, उससे पूछा।
आंटी जी !क्या आपने मुझे पहचाना नहीं।
मैं तुम्हें कैसे पहचानूँगी ? जब तक तुम मुझे अपना परिचय नहीं दोगी,मैं कोई अन्तर्यामी तो नहीं हूँ।
सॉरी !आंटीजी ! मैं शिल्पा की सहेली' मधुलिका' बोल रही हूं। अच्छा,उसके साथ कॉलिज में जो थी , तुम्हारा तो विवाह हो गया था,कुछ याद करते हुए उन्होंने पूछा - कहो ,कैसे याद किया ?
मधुलिका को लगा ,शायद ये मेरे और कुमार के विषय में जानती तो नहीं हैं ,उसकी आवाज की खनक थोड़ी कम हुई और बोली - बहुत दिन हो गए थे, इसलिए सोचा शिल्पा से बात कर लेती हूं किंतु उसने फोन ही नहीं उठाया। तब आपको फोन किया, बहुत पहले उसने, इस घर का नंबर दिया था।
बहुत जल्दी याद आ गया,उन्होंने उस पर व्यंग्य किया। तुम उसकी कैसी सहेली हो ? जो तुम्हें उसके विषय में कुछ भी मालूम नहीं है ,कल्याणी जी ने उसे उलाहना दिया।
शर्मिंदा होते हुए मधुलिका बोली -आंटी जी ,ससुराल में काम से ही फुरसत नही मिलती,आप तो जानती ही हैं। शिल्पा का तो विवाह हो गया होगा, अब वह कहां है ?
निराश स्वर में, गहरी स्वांस लेते हुए कल्याणी जी बोलीं -अब न जाने, वह कहां होगी ?
घबराकर मधुलिका ने पूछा - क्यों क्या हुआ ?
क्या तुम अखबार नहीं पढ़ती हो ? क्या तुम उसके विषय में कुछ भी नहीं जानती हो ? तुम्हारी उससे कब बात हुई थी ?
बहुत दिन हो गए ,जब से आंटी इस घर -गृहस्थी में फंसी हूं ,सब कुछ भूल गई हूं ,आप ही बता दीजिए ! क्या हुआ है ?
कैसी दोस्त हो ? जो आज तक तुमने, उसकी सुध ही नहीं ली, उसका विवाह हो गया और वह खुशी-खुशी अपने घर भी चली गई थी उदास स्वर में कल्याणी जी बोली। किंतु न जाने मेरी बेटी को किसकी नजर लग गई ? उसका घर बर्बाद हो गया।
ऐसा क्या हुआ ? और मुझे पता भी नहीं चला आश्चर्य से मधुलिका ने पूछा।
किसी ने उसके पति की हत्या कर दी और तब से मधुलिका भी गायब है ,न जाने, मेरी बच्ची कहां है ? कहते हुए वे रोने लगीं।
इस बात को कितने दिन हो गए ? आश्चर्य से मधुलिका ने पूछा।
उसको गए हुए लगभग 2 वर्ष हो चुके हैं।
क्या आपने पुलिस में रिपोर्ट नहीं की थी, पुलिस उसे ढूंढती।
पुलिस कुछ भी नहीं कर पा रही है , अब तो लगता भी नहीं ,वह कुछ कर भी पाएगी निराशा से उन्होंने जवाब दिया। मधुलिका के पास उनको सांत्वना देने की सिवा अब कोई शब्द नहीं रह गया था ,न ही वह अब उसके बारे में कुछ पूछ पा रही थी। अच्छा, आंटी जी! अभी मैं फोन रखती हूं, उसकी कोई खबर मिले तो मुझे बताना।
शाम को जब, कुमार घर पर आया, तो मधुलिका थोड़ा शांत थी, अब वह उस फोन के विषय में सोचना भूल कर, शिल्पा के विषय में सोच रही थी।
कुमार ने, इससे पहले मधुलिका को खामोश कभी नहीं देखा था , वह डर गया कहीं इसे कुछ पता तो नहीं चल गया है। तब कुमार ने मधुलिका से पूछा - क्या बात है ?तुम इतनी खामोश क्यों हो? क्या कुछ हुआ है ?
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